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अमेरिकी पत्रिका 'टाइम' का यू-टर्न

31/05/2019

मनोज ज्वाला
रेन्द्र मोदी को 'इण्डियाज डिवाइडर इन चीफ' घोषित करने वाली अमेरिकी पत्रिका 'टाइम' की आवरण कथा का 'अनावरण' हो जाने के बाद उसका जो नया संस्करण आया है उसने उसकी नीति और नीयत पर सवाल खड़ा कर दिया है। अपने पिछले अंक में मोदी जी को 'इण्डियाज डिवाइडर इन चीफ', अर्थात 'भारत का विभाजनकारी प्रधान'  घोषित करने वाली 'टाइम' ने अब अपने ताजा अंक में यू-टर्न लेते हुए जो कथा प्रकाशित की है उसका शीर्षक है 'मोदी हैज यूनाइटेड इण्डिया, लाइक नो प्राइम मिनिस्टर इन डिकेड्स'। अर्थात, मोदी ने भारत को ऐसा एकात्म / एकताबद्ध किया है, जैसा पिछले कई दशकों में किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया।
एक ही मोदी को एक ही महीने के भीतर पहले 'भारत का विभाजनकारी प्रधान' और बाद में 'एकात्मकारी प्रधान' कहने-लिखने की इस धृष्ठता व शिष्टता का कारण 'टाइम' का दृष्टि-दोष नहीं है, बल्कि भारत-विरोधी वैश्विक शक्तियों की एक सोची-समझी साजिश लगती है, जिसके तहत 'टाइम' पत्रिका से लेकर 'न्यूजवीक' अखबार और 'सीएनएन' व 'बीबीसी' नामक समाचार चैनल तक सभी मीडिया प्रतिष्ठान भारत व भारतीय राजनेताओं की छवि को चर्च-मिशनरियों की योजना के अनुसार बनाते-बिगाड़ते रहते हैं।
मालूम हो कि अमेरिकी मीडिया एवं अमेरिकी सरकार के बीच वैदेशिक मामलों को लेकर परस्पर तालमेल बड़ा ही घनिष्ठ हुआ करता है, जबकि सरकार की वैदेशिक नीतियों के निर्माण में वैश्विक चर्च-मिशनरियों की भूमिका महत्वपूर्ण हुआ करती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति की सर्वोच्च सलाहकार समिति- 'प्रेसिडेण्ट्स एडवाइजरी काउंसिल ऑन फेथ बेस्ड नेबरहुड पार्टनरशिप' में दर्जनाधिक सदस्य वर्ल्ड विजन, क्रिश्चियन कम्युनिटी डेवलपमेण्ट एसोसिएशन, रैण्ड कॉरपोरेशन व पॉलिसी इंस्टिच्यूट फॉर रिलीजन एण्ड स्टेट आदि उन अन्तरराष्ट्रीय चर्च-मिशनरी संगठनों के लोग हुआ करते हैं, जिनकी प्राथमिकता में सनातन धर्म का उन्मूलन, हिन्दू-समाज का विघटन व भारत राष्ट्र का विखण्डन प्रमुखता से शामिल होता है। यहां उल्लेखनीय है कि रैण्ड कॉरपोरेशन व फोर्ड फाउण्डेशन आदि चर्च-मिशनरी संस्थायें सन 2000 से ही नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध मीडिया के माध्यम से अभियान चला रखी हैं। ऐसे में जाहिर है, यूएसए के वैदेशिक नीति-निर्धारण-क्रियान्वयन और मीडिया के प्रकाशन-विश्लेषण का आवरण ओढ़कर ये चर्च मिशनरियां ही अपनी योजनाओं को क्रियान्वित कर रही होती हैं। अमेरिकी मीडिया की वैदेशिक मामलों से सम्बन्धित किसी भी रिपोर्ट या कथा का आप अनावरण करेंगे तो उसका कथ्य-कथानक व लेखक चाहे जो भी हो, उसके पीछे आपको यही सच दिखाई पड़ेगा। इन अमेरिकी पत्र-पत्रिकाओं में चीन, सऊदी अरब, पाकिस्तान, जैसे तानाशाही शासन-प्रणाली वाले देशों के प्रति तो संवेदना, सहानुभूति व सदभाव खूब मिलते हैं; किन्तु भारत के प्रति घृणा, दुर्भावना व दुष्प्रचार ही दिखते हैं।
यहां एक उदाहरण उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में जब सेनाधिकारी जनरल मुशर्रफ ने तख्ता पलट कर जबरन सत्ता हथिया ली थी, तब अमेरिकी साप्ताहिक 'न्यूजवीक' ने मुशर्रफ की तीखी आलोचना के साथ उस घटना की विस्तृत रिपोर्ट छापी थी। उसमें यह दर्शाया गया था कि किस तरह से पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही के कारण जनता के लोकतांत्रिक व मौलिक अधिकारों का हनन होता रहा है। उसी अखबार के अगले ही अंक में उसी मुशर्रफ को 'जेण्टल जनरल' के विशेषण से विभूषित कर पाकिस्तान के बेहतर भविष्य की स्वर्णिम तस्वीर खींच दी गई थी। जाहिर है, ऐसा उसी हिसाब-किताब के अनुसार किया गया, जिसके मुताबिक विदेशों में प्रसारित होने वाले अमेरिकी पत्र-पत्रिकाओं के वैदेशिक दृष्टिकोण तय होते हैं। कम्युनिस्ट चीन, जहां मानवाधिकार भी बहाल नहीं है तथा एक दलीय तानाशाही कायम है और प्रेस पर प्रतिबंध है; उसके विरुद्ध या चीनी आकाओं के खिलाफ किसी 'टाइम' या 'न्यूजवीक' में कभी कोई नकारात्मक समाचार या विश्लेषण आज तक प्रकाशित नहीं हुआ है। कारण यह है कि चर्च मिशनरियां इस्लामी पाकिस्तान  की ही तरह 'बौद्ध-चीन' को भी सनातनधर्मी भारत के विरुद्ध अपना हितैषी मानती रही हैं। धर्मान्तरण व विखण्डन की दृष्टि से भारत उनकी प्राथमिकताओं में सबसे पहले है और अमेरिकी विदेश नीति के मूल में भी यही सूक्ष्म आवधारणा कायम है। आपको याद होगा कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता देंग शियाओ पिंग के आदेश पर वर्षों पूर्व एक बार हजारों निहत्थे चीनी छात्रों को सेना की टैंक से उड़ा दिया गया था, किन्तु किसी 'टाइम' या 'वीक ने मानवाधिकारों का हनन करने वाली उस तानाशाही पर आज तक भी कुछ नहीं लिखा। जबकि, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने जब पोखरण में परमाणु-विस्फोट किया था, तब इसी 'टाइम' ने हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक अत्यन्त खतरनाक छवि गढ़कर दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दी थी। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सन 2004 में कांग्रेस के मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री नियुक्त हुए, तब इन चर्च-मिशनरी संगठनों की एक समाचारसेवी संस्था मिशन नेटवर्क न्यूज (एमएनएन) ने उस खबर को 'धर्मान्तरण का अच्छा अवसर' शीर्षक से विश्लेषित किया था।
दरअसल, भारत की राष्ट्रीयता (जो सनातन धर्म अर्थात हिन्दुत्व है) का राजनीतिक उभार जो है, सो अमेरिकी मीडिया का दृष्टिकोण तय करनेवाले अमेरिकी शासन के विदेश विभाग और उसकी नीतियों को निर्धारित करनेवाली चर्च-मिशनरी संस्थाओं के पेट में उसी तरह से मरोड़ पैदा कर देता है, जिस तरह से अधिकतर भारतीय मीडिया प्रतिष्ठानों व बौद्धिक संस्थानों के वामपंथी पत्रकारों-बुद्धिबाजों को दक्षिणपंथ का उभार फूटी आंखों भी नहीं सुहाता। अमेरिकी शासन-मिशन व मीडिया का यह गठजोड़ ही भारत का विभाजन चाहता है। इसलिए ये लोग भारत के असली विभाजनकारी कांग्रेसी विभाजनवादी राजनेताओं, जिनकी नीतियों के कारण सचमुच ही भारत का विभाजन हुआ और जिनकी साम्प्रदायिक तुष्टिकरणवादी फिरकापरस्त राजनीति अब पुनर्विभाजन की पृष्ठभूमि निर्मित करती दिख रही है, उन्हें ये मीडिया प्रतिष्ठान 'डिवाइडर' का विशेषण जान-बूझकर नहीं देते, बल्कि उनके उन कारनामों के पक्ष में ही वातावरण बनाते रहते हैं ; किन्तु नरेन्द्र मोदी के 'सबका साथ-सबका विकास' व दंगा-फसाद से मुक्त शासन एवं अलगाववादी आतंकवाद पर नियंत्रण तथा आतंकपीड़ित विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं के पुनर्वास कार्यक्रमों में इस धूर्त्त गठजोड़ को ऐन चुनाव के वक्त विभाजन का दृश्य दिखाई पड़ गया और उल्टे नरेन्द्र मोदी ही 'इण्डियाज डिवाइडर इन चीफ' प्रतीत होने लगे, तो इसकी धूर्त्त मंशा को आप समझ सकते हैं, जो नि:संदेह भारत की राष्ट्रवादी राजनीति के उभार को दिग्भ्रमित कर अवरुद्ध करना और विघटनकारी साम्प्रदायिक तुष्टिकरणवादी राजनीति को बढ़ावा देनेवाली ही थी। अब जब भारत की राष्ट्रीयता के उफान से नरेन्द्र मोदी का परचम फिर लहरा उठा तब 'टाइम' को अपनी छवि सुधारने के लिए एक रणनीति के तहत अब यह रुख अपनाना पड़ा है। 'टाइम' की इस नई कथा से अब हमारे देश के इन बुद्धिबाजों की हालत अकथनीय हो गई है। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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