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एक कलाकार की स्मृति का बिकना

19/06/2019

हिंदी सिनेमा के शोमैन राज कपूर की सुनहरी स्मृतियों से जुड़ा आरके स्टूडियो आखिरकार बिक ही गया। यहां भविष्य में बनने वाली इमारतों की बुनियाद में संगीत की वे धुनें और स्मृतियां दμन हो जाएंगी, जिनके कान में पड़ते और स्मृति में उतरते ही लोग थिरकने लगते थे। वर्ष 1948 में बने इस स्टूडियो को गोदरेज प्रोपर्टीज ने महज 60 करोड़ में खरीद लिया है। हिंदी सिनेमा की अनेक क्लासिक व कल्ट फिल्मों का गवाह व आर्दश रहा आरके स्टूडियो का बिकना कलाप्रेमियों के मन को नहीं भा रहा है। राजकपूर के मंझले पुत्र और मशहूर अभिनेता ऋषि कपूर ने स्वयं यह जानकारी देते हुए कहा है कि ‘हमारे पिता का सपना अब परिवार के लिए सफेद हाथी बन गया है। इससे हमारी यादें जरूर जुड़ी हंै, लेकिन परिवार में झगड़े का कारण बने, इसके पहले ही हमने इसे बेचने का फैसला ले लिया है।

यह स्टूडियो मुंबई के चेंबूर इलाके में दो एकड़ में फैला हुआ है। राज कपूर की मृत्यु के बाद 1988 में उनके बड़े बेटे रणधीर कपूर ने स्टूडियो की जिम्मेदारी ली थी, लेकिन सितंबर 2017 में आग लग जाने के कारण स्टूडियो को भारी क्षति पहुंची और इसका अस्तित्व संकट में पड़ गया। बॉलीवुड की यादों से जुड़ी तमाम बहुमूल्य धरोहरें आग से राख हो गईं। कई भवन और उनमें रखे उपकरण, पोशाकें और आभूषण भी नष्ट हो गए।

अब भी वक्त है कि महाराष्ट्र सरकार इस भूमि का अधिग्रहण कर ले। इससे विश्व में हॉलीवुड के बाद सबसे अधिक लोकप्रिय हिंदी फिल्मों और उसके पहले शो मैन राजकपूर की स्मृति को बचाया जा सकेगा।

राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर‘ में जिस मुखौटे को पहनकर अद्भुत अभिनय किया था, वह भी जल गया। इस अग्निकांड के बाद से ही स्टूडियो में शूूटिंग बंद हो गई। गोया, आमदनी का जरिया खत्म हो जाने के कारण राजकपूर की संतानें इसे बेचने को विवश हुईं। यह धरोहर न बिके, इस नाते दो ही विकल्प शेष रह गए थे। एक तो महाराष्ट्र सरकार इस संपत्ति का अधिग्रहण करके इसे फिल्मों का संग्रहालय बना देती। दूसरे, कपूर परिवार के लोग ही अपने निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए उन विश्वनाथ डी. कराड़ से प्रेरणा लेते, जिन्होंने अपने बूते पुणे में राजकपूर की स्मृति में शानदार संग्रहालय बनाया हुआ है।

राजकपूर ने फिल्मों के जरिए भारतीय कला और संस्कृति के साथ सामाजिक मूल्यों की स्थापना में भी अहम योगदान किया है। प्रेम और अहिंसा का संदेश देने वाली, उन्हीं की फिल्में रही हैं, जिन्होंने हिंदी का प्रचार-प्रसार रूस, चीन, जापान के साथ अनेक देशोंं में किया। उनके महत्व को समझने के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार लेने उनके दिल्ली आने के समय को याद किया जा सकता है। तब राष्ट्रपति भवन पहुंचे राजकपूर को राष्ट्रपति ने मंच से उतरकर सम्मानित किया था। ऐसे व्यक्तित्व के धनी शोमैन के बहाने हिंदी फिल्मों से जुड़े इतिहास और पुरातत्वीय धरोहर का आवासीय कॉलोनी में बदलना कला और संस्कृति के हित में कतई नहीं है।

राजकपूर ने 71 साल पहले 1948 में आरके स्टूडियो की नींव रखी थी। इस स्टूडियो के बैनर तले बनाई गई पहली फिल्म ‘आग‘ μलॉप रही, किंतु दूसरी फिल्म ‘बरसात‘ को बड़ी सफलता मिली थी। इसका नामाकरण राज कपूर के नाम पर ही किया गया था। स्टूडियो का लोगो ‘बरसात‘ में राजकपूर और नरगिस के गीत गाने के एक दृश्य का प्रतिदर्श है। कालांतर में इस स्टूडियो में राजकपूर ने ‘आवारा‘, ‘श्री-420‘, ‘जिस देश में गंगा बहती हैं‘, ‘आ अब लौट चलें‘, ‘संगम‘, ‘मेरा नाम जोकर‘, ‘बॉबी‘, और ‘राम तेरी गंगा मैली‘ फिल्मों का निर्माण किया।

स्टूडियो में बनी ‘प्रेमग्रंथ‘ आखिरी फिल्म थी। अन्य निर्माता भी इस स्टूडियो में फिल्में बनाते रहे हैं। हालांकि महत्वाकांक्षी, विराट व लंबी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर‘के निर्माण में इस स्टूडियो को गिरवी भी रखना पड़ा था। बाद में कर्ज से उबरने के लिए राज कपूर ने ऋशि कपूर और डिंपल कपाड़िया को लेकर ‘बॉबी‘ फिल्म बनाई। यह फिल्म सुपरहिट रही और राजकपूर कर्ज से मुक्त हुए। राज कपूर के तीनों बेटे रणधीर, ऋषि और राजीव के अलावा दोनों बेटियों रीमा जैन व ऋतु नंदा एक स्वर में इस बेशकीमती संपत्ति को बेचने पर सहमत हैं। जमीन बिकने के बाद इसमें आवासीय और व्यावसायिक परिसर विकसित होंगे, जो इस परिसर की उस पहचान को लील जाएंगे, जिसे कला प्रेमी एक मंदिर मानते हैं। मुंबई के गेटवे आॅफ इंडिया, ताज होटल, मुंबादेवी मंदिर, विनायक मंदिर, वानखेड़े स्टेडियम और चौपाटी की तरह आरके स्टूडियो भी एक पर्यटन स्थल है।


 
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