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भारत- रूस संबंध में नया जोश

14/10/2019

भारत- रूस संबंध में नया जोश


भारत और रूस सम्बन्ध एक ऐसे द्विपक्षीय संबंध की कहानी है,जो अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतो के चश्मे से नहीं आंकी जा सकती। प्रधानमंत्री बनने के बाद जब नरेंद्र मोदी पहली बार रूस गए थे, तब उन्होंने कहा था कि दोनों की मित्रता किसी बच्चे से भी समझी जा सकती है। दो महाशक्तियों के बीच पूरे शीत युद्ध के दौरान भारत, रूस के साथ रहा,तो कश्मीर पर रूस ने भारत को मदद की। अफगानिस्तान में रूस की दखल के सवाल पर भारत भी रूस के संग खड़ा रहा। तब पूरी दुनिया रूस के विरुद्ध थी। अब मोदी की ताजा रूस यात्रा एक नए युग का आगाज है।

भारत और रूस सुदूर पूरब की राजधानी कहे जाने वाले व्लादिवोस्तोक और चेन्नई के बीच एक समुद्री लिंक निर्माण के लिए सहमत हुए हैं। यह लिंक चीन की महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड परियोजना का जवाब है।

राष्ट्रपति पुतिन के कार्यकाल में रूस आर्थिक मंदी से उबरने की जुगत में है, सैनिक विस्तार की अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को भी पाना चाहता है। रूस के सामने चुनौती दो तरह की है- अपने प्रतिकूल परस्थिति में रूस चीन के साथ इतना उलझ गया कि उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व खतरे में आ गया। रूस चीन की दीवार को लांघना चाहता है, लेकिन उसकी दूसरी समस्या अमेरिका है। अमेरिका 2014 में रूस के यूक्रेन अतिक्रमण के उपरांत उसे हर तरीके से कमजोर करने पर तुला हुआ है। भारत की भी समस्या बहुत हद तक इसी तरह की है। भारत चीन की नीतियों से तंग है। दूसरी तरफ अमेरिका पर ज्यादा विश्वास भी घातक बनता जा रहा है। पिछले दिनों अमेरिका ने कश्मीर से लेकर ईरान तक के मसलो पर भारत की नीतियों के विरुद्ध टिप्पणी की। ऐसे में भारत और रूस के पास कई समान सोच और समीकरण हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रपति पुतिन की मुलाकात रूस के व्लादिवोस्तोक में हुई। यह रूस का महत्वपूर्ण शहर है जो सामरिक रूप से अत्यंत अहम है लेकिन विकास की धारा में पीछे छूट गया है। व्लादिवोस्तोक यूरेशिया और पैसिफिक का संगम है। यह आर्कटिक और उत्तरी सागर रास्ते के लिए नए अवसर खोल सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस क्षेत्र के विकास के लिए एक अरब डॉलर की लाइन आॅफ क्रेडिट (विशेष शर्तों वाले ऋण) देने की घोषणा की है। यह क्षेत्र चीन, मंगोलिया,उत्तर कोरिया के साथ भू सीमा और जापान और अमेरिका के साथ समुद्री सीमा साझा करता है। अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इस क्षेत्र में चीन और अमेरिका में होड़ लगी रहती है। ऐसे में अपने भू- रणनीतिक महत्व को देखते हुए भारत ने 1992 में व्लादिवोस्तोक में वाणिज्य दूतावास खोला था। ऐसा करने वाला वह दुनिया का पहला देश है।

भारत और रूस सुदूर पूरब की राजधानी कहे जाने वाले व्लादिवोस्तोक और चेन्नई के बीच एक समुद्री लिंक निर्माण के लिए सहमत हुए हैं। यह व्लादिवोस्तोक-चेन्नई समुद्र लिंक चीन की महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड परियोजना का जवाब है। सुरक्षा के चश्मे से देखा जाए तो भारत की यह नीति चीन की मशहूर रणनीति स्ट्रिंग आॅफ पर्ल को तोड़ने में भी सफल साबित होगी। इस रणनीति के तहत चीन विभिन्न देशों के द्वीपों पर मौजूदगी बनाकर हिंद महासागर पर पकड़ बनाना चाहता है। व्लादिवोस्तोक से चेन्नई आने वाले जहाज जापान के सागर पर दक्षिण की ओर तैरते हुए कोरियाई प्रायद्वीप, ताइवान और दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस, सिंगापुर और मलक्का जलडमरूमध्य के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करेंगे और फिर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से होते हुए चेन्नई आएंगे।

समुद्री व्यापार, सामरिक और सुरक्षा के लिहाज से भारत के लिए यह शहर अहम साबित हो सकता है। रक्षा क्षेत्र में रूसी उपकरणों के स्पेयर पार्ट्स को लेकर भी दोनों देशों के बीच करार हुआ है। रक्षा जैसे क्षेत्र में रूसी उपकरणों के स्पेयर पार्ट्स भारत में दोनों देशों के जॉइंट वेंचर द्वारा बनाने के लिए समझौता उद्योग को बढ़ावा देगा। भारत के विदेशमंत्री जयशंकर ने कहा कि रूस पैसेफिक महासागर में एक मुख्य शक्ति है,जिसकी रुचि हिंद मसागर में भी है। उसी तरह भारत हिन्द महासागर के केंद्र में है। पैसेफिक सागर में भारत की इच्छा एक मजबूत शक्ति बनने की है। भारत को अमेरिका और रूस के बीच एक संपर्क बनाने की जरूरत है। भारत इस प्रयास को फ्रांस और जर्मनी के माध्यम से कर भी रहा है। पूर्व में जापान भारत की मदद के लिए आतुर है। अगर यूरेशिया और पैसेफिक के अतर्द्वंद खत्म होते हैं, तो इसका सीधा लाभ भारत को मिलेगा, साथ ही चीन के चौमुखी विस्तार पर भी अंकुश लगेगा।


 
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