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मुसलमान वोट बैंक क्यों बने?

19/06/2019

मुसलमान वोट बैंक क्यों बने?


By
 बनवारी

देश में अब जो नई राजनैतिक परिस्थितियां उभरी हैं, उनमें मुसलमानों की सुरक्षा अलगाव में नहीं, समरसता में ही हो सकती है। आम मुसलमानों को देश की मुख्य धारा में आने और हिन्दू समाज से समरसता बनाने में शायद ही कोई कठिनाई हो।

इस बार के चुनाव परिणामों ने सबसे बड़ी चुनौती देश के मुसलमानों के सामने खड़ी की है। अब तक उन्हें वोट बैंक की तरह उपयोग किया जाता रहा है। अपने आपको सेक्युलर दिखाने वाले सभी दल उनमें असुरक्षा पैदा करते हुए अपने आपको उनका सबसे बड़ा हितैषी दिखाते रहे। अपने आपको सेक्युलर कहने वाले दल और नेता मुख्यत: हिन्दू समुदाय के हैं और उसी से बल प्राप्त करते हैं। पर वे मुसलमानों को यह भय दिखाते रहते हैं कि हिन्दू बहुसंख्यक हैं। उनमें कुछ मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक शक्तियां सक्रिय हैं।
उनकी शक्ति बढ़ी तो मुसलमानों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए लोकतंत्र में उन्हें वोट देने की जो शक्ति मिली हुई है, उसका इस्तेमाल करके वह उसी पार्टी को जिताएं, जो उन्हें सुरक्षा देने का आश्वासन देती हो। यह काम लंबे समय तक कांग्रेस ने किया। लेकिन आपात स्थिति के दौरान संजय गांधी के नसबंदी अभियान के दौरान मुसलमानों को अनुभव हुआ कि उन्हें सबसे बड़ा खतरा तो अपने आपको सेक्युलर बताने वाली कांग्रेस पार्टी से है। इसलिए उत्तर भारत में उन्होंने 1977 के चुनाव से कांग्रेस से किनारा कर लिया। उनके वोट पर अपना अधिकार जताने वाली नई पार्टियां उभर आईं। देश भर में कांग्रेस, समाजवादी या मार्क्सवादी आंदोलन से निकले अनेक नेताओं ने नई क्षेत्रीय पार्टियां खड़ी कर दीं। सबकी राजनीति का प्रधान स्वर यही रहा है कि वे देश की सांप्रदायिक ताकतों से लड़ रही हैं। इसलिए अकेली वे मुस्लिम वोटों की सबसे बड़ी हकदार है।
अपने लगभग संगठित वोट के बल पर मुसलमानों में यह भ्रम फैला रहा है कि एक वोट बैंक के रूप में वे देश की राजनीति को नियंत्रित कर सकते है। यही उनकी सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है। वे अपने वोटों की संख्या के बल पर अपने आपको सेक्युलर मानने वाली सभी पार्टियों को अपने सांप्रदायिक हितों की आसानी से रक्षा करवा सकते हैं। भारत में मुसलमानों की संख्या अब कोई 14 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है। वे संख्या में बहुत अधिक नहीं है तो बहुत कम भी नहीं है। अपने दम पर वे शायद कोई डेढ़ दर्जन सांसद जिता सकते होंगे। लेकिन सेक्युलर पार्टियों से मिलकर वे सत्ता के स्वरूप का निर्धारण कर सकते हैं।
इस विश्वास के चलते उन्होंने अपनी कोई अलग राष्ट्रीय पार्टी बनाने में रुचि नहीं ली। देश का बंटवारा करने में सफल रही मुस्लिम लीग भारत विभाजन के बाद भी भारत में बनी रही। पुरानी मुस्लिम लीगके भारतीय संस्करण के रूप में उसकी नींव 10 मार्च 1948 को मद्रास में डाली गई थी। पड़ोस के केरल राज्य में अधिक मुस्लिम आबादी होने के कारण वे वहां की राजनीति में अपनी जड़ें जमाने में सफल रही। उसका थोड़ा बहुत विस्तार पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, असम, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भी हुआ। पर वे संसद में अपनी नाम मात्र उपस्थिति से अधिक नहीं बढ़ पाई। सभी जगह उसे कांग्रेस का सहयोग और समर्थन मिला। कांग्रेस के सहयोग से कुछ महीने की छोटी सी अवधि के लिए वह केरल में अपना मुख्यमंत्री तक बनवाने में सफल रही। हैदराबाद में मुसलमानों की अधिक उपस्थिति ने अखिल भारतीय मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन को जन्म दिया। उसके नेता ओवैसी उसका महाराष्ट्र में विस्तार करने की कोशिश करते रहे हैं। इस बार प्रकाश अंबेडकर से गठजोड़ के जरिए वे तेलंगाना की अपनी सीट के अलावा महाराष्ट्र से भी एक सीट जिताने में सफल हुए हैं। असम में बदरुद्दीन अजमल का सर्वभारतीय संयुक्त गणतांत्रिक मोर्चा मुसलमानों के वोट के आधार पर संसद तक पहुंच बनाए रख पाया है।
लेकिन अधिकांशत: मुसलमानों ने आॅल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड आदि के जरिये ही अपने राजनैतिक हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश की है। उन्हें वोट बैंक के रूप में कांग्रेस और कम्युनिस्टों के अलावा मायावती, मुलायम, देवगौड़ा, द्रविड़ नेता और ममता बनर्जी जैसे बहुत से लोग इस्तेमाल करते रहे हैं। पहली बार 2014 के चुनाव में उनको इस वोट बैंक की सीमाएं दिखाई दी थीं। उनके वोट के बिना भी भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत पाकर सत्ता में पहुंच गई थी। उसके बाद राज्यों से कांग्रेस सरकारें उखड़ना शुरू हुईं। अपनी सफलता से उत्साहित भाजपा नेताओं ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दे डाला। इस सबके बावजूद मुस्लिम नेताओं को आशा थी कि सत्ता में भाजपा का आरोहण एक अपवाद है। वाजपेयी सरकार की तरह मोदी सरकार भी पांच साल में विदा हो जाएगी। लेकिन इस बार के चुनाव ने उनकी यह आशा भी समाप्त कर दी। उनके वोट बैंक पर बिना निगाह गड़ाए भाजपा और बड़ी शक्ति के साथ सत्ता में पहुंच गई। इसने मुसलमानों में दो तरह की प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं।
एक प्रतिक्रिया आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना मोहम्मद वली रहमानी की मुसलमानों के नाम लिखी खुली चिट्ठी में देखी जा सकती है। अपनी इस चिट्ठी में उन्होंने चुनाव परिणामों के बाद मुसलमानों में छाई निराशा और असुरक्षा को रेखांकित करते हुए चिंता व्यक्त की है। उन्होंने मुसलमानों को ढांढस अवश्य बंधाया है कि संकट के अन्य दौरों की तरह यह दौर भी गुजर जाएगा। पर इसके लिए मुसलमानों को अपने ईमान पर दृढ़ बने रहना चाहिए। उनकी चिट्ठी का आशय यह है कि मुसलमान एकजुट रहे और अपने अलग रास्ते पर बने रहे। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड 1973 में इंदिरा गांधी के शासन के दौरान बना था और अब तक मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ाने में ही अपनी भूमिका निभाता रहा है। शाहबानो मामले में सारी मुहिम उसी ने चलाई थी। उस समय केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा देने वाले आरिफ मोहम्मद खान ने बोर्ड को भंग करने की मांग तक कर डाली थी। ताहिर महमूद भी यही मांग कर चुके हैं। अयोध्या मामले में भी आपसी सहमति से कोई समझौता किए जाने की सबसे बड़ी बाधा बोर्ड ही है। दूसरी प्रतिक्रिया कर्नाटक के कांग्रेस के नेता रोशन बेग की है।
उन्होंने कांग्रेस में रहते हुए भी कांग्रेस के नेताओं द्वारा मुसलमानों को आगे न आने देने का आरोप लगाते हुए यह कहा है कि मुसलमानों को एक राजनैतिक धारा का बंधुआ बने रहने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें अपने विकल्प खुले रखने चाहिए और नई उभरती परिस्थितियों के अनुरूप अपने राजनैतिक निर्णय लेने चाहिए। उनके इस वक्तव्य का संकेत स्पष्ट है कि वह भारतीय जनता पार्टी को अछूत समझे जाने के विरुद्ध हैं और मुसलमानों से उसके साथ सहयोग का विकल्प खुला रखने का आग्रह कर रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर पर ऐसी प्रतिक्रिया और भी अनेक मुस्लिम नेता दे रहे होंगे। लेकिन अभी उसे मुसलमानों के बीच से कोई बड़ी स्वीकृति नहीं मिली है। इन नई परिस्थितियों की झलक पश्चिम बंगाल में जो कुछ हो रहा है, उसमें देखी जा सकती है। उसके अलावा केरल की घटनाएं भी उसकी भरपूर झलक देती हैं। पश्चिम बंगाल में नेहरूकाल की सेक्युलर राजनीति को इस आक्रामकता के साथ आगे बढ़ाया गया कि बंगाल के हिन्दुओं ने उससे अपने आपको आहत अनुभव किया और उनकी प्रतिक्रिया इतनी तीव्र थी कि कुछ ही वर्षों में राज्य की राजनीति में भाजपा शून्य से शिखर तक पहुंच गई। इस बार के चुनाव में ममता की तृणमूल कांग्रेस को 43 प्रतिशत वोट मिले हैं और भाजपा को 40 प्रतिशत। अधिकांश लोग मानते हैं कि पश्चिम बंगाल त्रिपुरा के रास्ते पर ही जा रहा है और राज्य में अगली सरकार भाजपा की बनेगी।

अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो की नीति के अंतर्गत मुसलमानों में असुरक्षा और अलगाव बढ़ाया। नेहरू शासन ने यही नीति बनाए रखी।
केरल में मुस्लिम लीग और कांग्रेस साथ-साथ रहे हैं और कांग्रेस सदा सेक्युलर राजनीति का दम भरती रही है। लेकिन इस बार वह केरल की जनता के दबाव में शबरीमला आंदोलन के समय भाजपा के साथ खड़ी थी। मार्क्सवादियों को हराने के लिए इसी कारण भाजपा का अधिकांश वोट भी उसे मिला। यह देश की बदलती राजनीति की झलक हैं। भाजपा पर यह दोष मढ़ा जा सकता है कि वह मुसलमानों को टिकट नहीं देती। इस बार मुस्लिम बहुल संसदीय क्षेत्रों में उसने छह मुसलमानों को टिकट दिए थे पर उनमें से कोई जीत नहीं पाया। लेकिन इस बार की संसद में कुल मिलाकर 27 मुस्लिम सांसद पहुंचे हैं। वे गिनी-चुनी पार्टियों से ही आए हैं। तृणमूल से पांच सांसद चुने गए हैं, कांग्रेस से चार, सपा, बसपा, नेशनल कांफ्रेंस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग से तीन-तीन। इसके अलावा ओवैसी की पार्टी से दो, शरद पवार की एनसीपी, सीपीएम, एलएनजेपी और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी से एक-एक सांसद चुना गया है।
बीजू जनता दल, द्रमुक, तेलंगाना राष्ट्र समिति, जनता दल सेक्युलर आदि बहुत सारे दलों से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं चुना गया। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से छह-छह मुस्लिम सांसद चुने गए हैं, केरल और जम्मूकश्मीर से तीन-तीन, असम और बिहार से दो-दो तथा पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना और लक्षद्वीप से एक-एक। इस तरह दस राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश से ही यह गिनती के सांसद चुने गए हैं। ऐसी स्थिति में देश की मुख्य धारा से अलग- थलग बने रहने में कितनी सुरक्षा हैं, यह मुसलमानों को सोचना है। ब्रिटिश शासन से पहले लंबे मुस्लिम शासन के बावजूद देश के हिन्दू और मुसलमानों के रहन-सहन और सामाजिक रीति-रिवाजों में अधिक अंतर नहीं था। अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो की नीति के अंतर्गत उनमें असुरक्षा और अलगाव बढ़ाया।

नेहरू शासन ने यही नीति बनाए रखी। आज दोनों समुदाय एक-दूसरे से काफी दूर चले गए हैं। अब तक राजनैतिक प्रतिष्ठान उन्हें केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करता रहा। देश में अब जो नई राजनैतिक परिस्थितियां उभरी हैं, उनमें मुसलमानों की सुरक्षा अलगाव में नहीं समरसता में ही हो सकती है। आम मुसलमानों को देश की मुख्य धारा में आने में और हिन्दू समाज से समरसता बनाने में शायद ही कोई कठिनाई हो। लेकिन मुस्लिम नेतृत्व को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा।


 
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