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जल संरक्षण का कारगर मिशन...

02/07/2019

जल संरक्षण का कारगर मिशन


गाजियाबाद शहर की सीमा पर रईसपुर गांव है। नगरीकरण में उदरस्थ हुए गांवों की कतार में यह आखिरी पायदान पर लड़खड़ाने को मजबूर है। दो साल पहले यहां तीन ऐसे तालाबों को फिर से खोदा गया था, जिसे सही मायनों में एक ही कहना चाहिए। यहां जमीन कुछ ऐसे ही धंस गई, जैसै आजकल दिल्ली जैसे महानगरों में मकान ऊपर की ओर उठते हैं। फिर बीते साल इतनी बारिश भी नहीं हुई कि ये लबालब भर सकें। खैर! अब ये तालाब लहलहाने तो नहीं लगे हैं, पर सूखे गड्ढ को देख कर कोई इनके लड़खड़ाने की बात में आपत्ति भी नहीं करता है। कमोबेश ऐसी ही दशा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इसी जिले के सौ से ज्यादा तालाब हैं। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के आदेश पर प्रभात कुमार और मिनिस्टी एस. जैसे अधिकारियों ने इन्हें 2017 में दोबारा खुदवाना शुरू किया था। कार्य पूरा तो नहीं हो सका, पर विकास का एक ऐसा झरोखा जरूर खोल गया, जिससे दंतकथाओं का वह सरोवर दिखता हो, जिन्हें खोदने का श्रेय दैत्यों या राक्षसों को जाता है। उत्तर प्रदेश के इस मामले का गहरा संबंध पंजाब से है।

गाजियाबाद प्रशासन को भी याद रखना चाहिए कि 1986 में अलवर में श्रमदान से ही जोहड़ उगाने और अरवारी नदी कोपुनर्जीवित करने का काम हुआ। सुखना लेक की दोबारा खुदाई और स्मृति उपवन का निर्माण हुआ।

दरअसल पटियाला के रोहर जागीर गांव में भूमाफियाओं ने तालाब पर कब्जा कर अट्टालिका खड़ी कर दी। अवैध कब्जे के इस मामले को कलेक्टर ने वाजिब मान कर कीमत वसूलने का फरमान जारी किया। फलत: यह मुकदमा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। वर्ष 2011 में जगपाल सिंह की इसी अपील का निर्णय जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की अदालत ने सुनाया था। इसमें देशभर के जलस्रोतों को अतिक्रमण मुक्त करने का आदेश दिया गया। इसकी तामिल होने की दशा में भूमाफियाओं को जोर का झटका लगता है। इसकी वजह से गाजियाबाद के सुशील राघव ने जिले भर के जलस्रोतों को बचाने की नीयत से उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। बहरहाल यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में लंबित है। इसी बीच एनजीटी में बेहतर प्रदर्शन के मंसूबे से मंडलायुक्त और जिलाधिकारी ने 200 से ज्यादा तालाबों को पुन: जीवित करने का प्रयास किया।

वर्तमान जिलाधिकारी रितु माहेश्वरी के हलफनामे में वर्णित तथ्यों के अवलोकन से भी यही स्पष्ट होता है। यहां अतिक्रमण के 450 मामलों में प्रशासन ने एफआईआर दर्ज किया है। अवैध कब्जा करने वालों से 18 करोड़ रुपये का जुर्माना भी वसूला गया है। किश्तों में गाजियाबाद के ही 1021 तालाबों और 73 झीलों के बारे में जानकारी सामने आती है। सूखे गड्ढÞों को तालाब नहीं कहते हैं। इसी एक वजह से इन कोशिशों को असफल ही माना जाता है। जल बिरादरी इससे संतुष्ट नहीं है। पिछले साल एडवोकेट विक्रांत ने जलपुरुष राजेन्द्र सिंह और प्रोफेसर जगदीश चौधरी जैसे पानीदार नेताओं के समक्ष गंगा सद्भावना यात्रा के दौरान इन सूखे तालाबों का जिक्र छेड़ कर चौंका दिया था। हाल ही में प्रोफेसर चौधरी ने इनके पुनरुद्धार के अभियान को मिशन 111 का नाम दिया है।

यह श्रम के सम्मान की ऐसी कोशिश है, जो लोक को गांव की सेवा के लिए तैयार करने पर आधारित है। यह जल संरक्षण की वही पंचायती विधि है, जिसकी पैरवी महात्मा गांधी समेत अनेक देशप्रेमी नेताओं ने की है। इन हालातों का निर्माण करने वाले सरकारी व गैरसरकारी संस्थान लंबे अर्से से इस भदेस व्यवस्था को नष्ट करने में लगे हंै। गाजियाबाद प्रशासन को भी याद रखना चाहिए कि 1986 में अलवर में श्रमदान से ही जोहड़ उगाने और अरवारी नदी को पुनर्जीवित करने का काम हुआ। सुखना लेक की दोबारा खुदाई और स्मृति उपवन का निर्माण हुआ। स्थानीय लोगों ने इन कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। सामूहिक प्रयासों के कारण ही इन जलस्रोतों से सुसज्जित उपवनों के साथ लोग आज भी अपनत्व का भाव रखते हैं। गाजियाबाद क्षेत्र में भी केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह की पहल से कुछ जल स्रोतों के पुनरुद्धार का काम चल रहा है। जल संकट की समस्या से बचने के लिए आपसी भाईचारा, प्रेम और सौहार्द वाली संस्कृति की ही जरूरत है।


 
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