युगवार्ता

Blog single photo

कहीं उल्लंघन तो नहीं त्रिपुरा विलय समझौते का

30/10/2019

कहीं उल्लंघन तो नहीं त्रिपुरा विलय समझौते का

अरविंद कुमार राय

राज्य में त्रिपुरेश्वरी मंदिर और चौदह देवता मंदिर में उच्च न्यायालय के फैसले के बाद वर्षों से चली आ रही बलि प्रथा पर रोक लग गई है, जिसका राज्य में विरोध देखा जा रहा है।

बलि प्रथा को लेकर त्रिपुरा हाईकोर्ट के निर्णय के मद्देनजर धार्मिक आजादी पर पाबंदी का हवाला देते हुए लोग सवाल उठा रहे हैं। नवरात्र के दौरान न्यायालय के फैसले के चलते राज्य के प्रमुख मंदिरों में बलि नहीं हुई। इसको लेकर श्रद्धालु बेहद मायूस दिखे। न्यायालय के इस फैसले पर त्रिपुरा कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व महाराजा प्रद्युत किशोर देवबर्मन ने कोर्ट से पुन: विचार करने की बात कहते हुए कहा कि इस आदेश को वे न्यायालय में चुनौती देंगे।
हाल ही में न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने फैसले में सभी धार्मिक स्थलों पर पशु व पक्षी की बलि पर रोक लगाने का आदेश जारी किया था। प्रद्युत किशोर देवबर्मन का कहना है कि देश की आजादी के बाद 15 अक्टूबर, 1949 को तत्कालीन महारानी कंचन प्रभा देवी और गवर्नर जनरल आफ इंडिया के बीच त्रिपुरा के भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर किया था। उसमें यह शर्त थी कि जब तक त्रिपुरा राज्य रहेगा तब तक राजपरिवार के अधीन दो प्रमुख धार्मिक स्थल त्रिपुरेश्वरी मंदिर और चौदह देवता मंदिर में सभी विधि-विधान पूर्ववत सरकारी खर्चे पर चलते रहेंगे। इसमें बलि प्रथा का भी जिक्र है।
ऐसे में न्यायालय के फैसले से समझौते के औचित्य पर सवालिया निशान खड़े हो गये हैं। हालांकि देवबर्मन का मानना है कि वे पशु व पक्षी की बलि के समर्थक नहीं हैं, लेकिन समझौते के अनुसार इसको जारी रखा जाना चाहिए। ज्ञात हो कि दोनों मंदिर वर्तमान में सरकार के अंतर्गत संचालित हैं। प्रद्युत किशोर देवबर्मन का कहना है कि अगर न्यायालय बलि प्रथा पर रोक लगाने की बात कहता है, तो मुसलमानों के बकरीद पर होने वाली बलि पर भी रोक लगाने का निर्णय देना चाहिए। यह एकतरफा नहीं होना चाहिए। बकरीद के समय भी बड़े पैमाने पर बलि दी जाती है। उसकी तुलना में हिंदुओं के धार्मिक स्थलों पर बेहद कम बलि दी जाती है।
2018 में सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी सुभाष भट्टाचार्य ने त्रिपुरा हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर बलि प्रथा पर रोक लगाने की मांग की थी। इस मामले में त्रिपुरा सरकार के मुख्य सचिव, गोमती जिलाधिकारी, त्रिपुरेश्वरी मंदिर, त्रिपुरेश्वरी मंदिर परिचालन समिति, उदयपुर महकमाधिकारी, त्रिपुरेश्वरी मंदिर परिचालन कमेटी के सदस्य सचिव एवं केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सचिव को पक्षकार बनाया गया था। इस मामले में गत 19 सितम्बर तक सुनवाई हुई। सभी पक्षों की बातों को सुनने के बाद न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए बलि प्रथा पर रोक लगा दी। साथ ही राज्य सरकार को संजीदगी के साथ इसका पालन करने संबंधित निर्देश भी जारी किया। इसके मद्देनजर नवरात्र के दौरान राज्य में पूरी तरह से बलि प्रथा पर रोक लगा दी गई।
इस मामले में राज्य सरकार ने भी इस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती देने के लिए आवश्यक कदम उठाने की बात कही है। न्यायालय के निर्णय के बाद राज्य के सभी धार्मिक स्थलों पर लागू करने का सरकार ने निर्देश जारी किया है। उल्लेखनीय है कि नवरात्र के मौके पर शक्ति की देवी को प्रसन्न करने के लिए देश के अनेक राज्यों में बलि देने का विधान है। इस मामले में अगर असम की बात करें, तो यहां पर महानवमी के दिन कई ऐसे मंदिर व देवालय हैं, जहां पर बड़ी संख्या में बलि दी जाती है।
लोग इसे अपनी परंपरा के साथ जोड़कर देखते हैं। वहीं ऐतिहासिक विश्व प्रसिद्ध जाग्रत शक्तिपीठ कामाख्या मंदिर में भी बलि विधान जारी है। यहां पर भी कई संगठनों ने बलि प्रथा पर रोक लगाने की आवाज उठाई थी, लेकिन इस पर रोक नहीं लग पाई। माना जा रहा है कि त्रिपुरा के संबंध में आए इस आदेश को देश के अन्य हिस्सों में भी एक उदाहरण के रूप में लेते हुए आवाज उठाई जा सकती है।


 
Top