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क्या कर रहे हैं विपक्षी एकता के सूत्रधार

04/07/2019

क्या कर रहे हैं विपक्षी एकता के सूत्रधार

बद्रीनाथ वर्मा

केवल अपने अहं की तुष्टि के लिए विपक्षी एकता के नाम पर दिल्ली से लेकर कोलकाता तक उछलकूद मचाने वाले टीडीपी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू को उनके ही सूबे की जनता ने ऐसी चपत लगाई कि वे कहीं के न रहे। माया मिली न राम मुहावरे की रचना शायद इन जैसे लोगों को ही ध्यान में रखकर हुई होगी। सांसदों ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया, बड़े जतन से बनाई गई प्रजा वेदिका ध्वस्त कर दी गई। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या वह फिर से खड़े हो पाएंगे?

 हां तो तमन्ना थी राष्ट्रीय क्षितिज पर छा जाने की, और अब अस्तित्व पर ही बन आई है। बात हो रही है तेलगुदेशम पार्टी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू की। अभी हाल-हाल तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर विपक्ष को एकजुट कर पीएम मोदी की सत्ता की राह रोकने के प्रयास में सरकारी हवाई जहाज से कोलकाता से लेकर दिल्ली तक चक्कर काटते थे। लेकिन इस चक्कर ने उन्हें ऐसा घनचक्कर बनाया कि वे अब न तो घर के रहे, न घाट के। अपनी इस हालत के लिए नायडू स्वयं ही जिम्मेदार हैं। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इस कदर जोर मारा कि उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा।


आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य के दर्जे को लेकर एनडीए से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी राजनीति का एकमात्र एजेंडा मोदी विरोध सेट कर लिया। इसी एजेंडे पर वे अन्य विपक्षी दलों को भी एकजुट करने में लग गये। ममता बनर्जी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक और राहुल गांधी से लेकर फारूक अब्दुल्ला तक को एक मंच पर लाकर पीएम मोदी को जबरदस्त चुनौती देने की उनकी मंशा पूरी तरह से विफल हो गई। दरअसल, विपक्ष एक मंच पर नहीं आ पाया तो इसके कारण कई थे। जैसे विपक्ष में कई दल ऐसे थे जो राज्यों में एक दूसरे के विरोधी थे। दिलचस्प बात यह है कि नायडू दिल्ली में भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहे थे। और इधर जगनमोहन रेड्डी ने उनकी सियासी जमीन पर कब्जा कर ली। सवाल है कि आखिर नायडू इतनी उछलकूद क्यों कर रहे थे? चुनाव से पहले तक खुद को भविष्य का ‘किंग मेकर’ मानकर चल रहे चंद्रबाबू जिस तरह से दिल्ली- कोलकाता एक किये हुए थे, उन्हें उम्मीद थी कि लोकसभा के त्रिशंकु होने की स्थिति में देवेगौड़ा की तरह लॉटरी उनके हाथ भी लग सकती है। यानी वह भी प्रधानमंत्री उम्मीदवारों की लाइन में थे इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन चुनाव परिणामों ने उनके ख्वाबों पर तुषारापात कर दिया। तो क्या यह मान लिया जाय कि उन्हें इस बात का तनिक भी गुमान नहीं था कि उनकी इस उछलकूद में उनके खुद की सियासी जमीन उनके पैरों के नीचे से खिसक रही है? हमेशा से कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाली तेलगूदेशम पार्टी का आंध्र प्रदेश चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करना सूबे की जनता को रास नहीं आ रहा था। यह एक अकल्पनीय गठजोड़ था। अस्तित्व के संकट ने चंद्रबाबू नायडू को यह कहने को मजबूर किया कि कांग्रेस और टीडीपी वैचारिक रूप से एक ही पाले में हैं। नायडू के लिए इस प्रयोग का नतीजा बेहद निराशाजनक रहा।

चंद्रबाबू जिस तरह से दिल्ली-कोलकाता एक किये हुए थे, उन्हें उम्मीद थी कि लोकसभा के त्रिशंकु होने की स्थिति में देवेगौड़ा की तरह लॉटरी उनके हाथ भी लग सकती है।


क्या नायडू इस तथ्य से अनभिज्ञ थे कि यह महामिलावट जनता बर्दास्त नहीं कर पायेगी? इतने अनुभवी राजनीतिक दिग्गज से इस तरह की अपरिपक्वता की उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर वे ऐसा क्यों कर रहे थे? कहीं वह अपने ससुर एन टी रामाराव का नया संस्करण तो नहीं बनना चाह रहे थे? गौरतलब है कि 1989 में जनता दल, असम गण परिषद, तेलुगुदेसम पार्टी और द्रमुक ने मिलकर वीपी सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा का गठन किया। एनटी रामाराव इस मोर्चे के संयोजक बने। इस मोर्चे ने भाजपा और दो वाम दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए गठबंधन किया। राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स दलालीकांड को लेकर उभरे जनरोष में यह गठबंधन कामयाब रहा था। लेकिन नायडू अगर मोदी सरकार के खिलाफ भी उसी तरह के जनरोष की कल्पना कर रहे थे तो यह निहायत ही बचकाना था। चुनाव परिणामों से भी यह साबित हो गया। अगर ऐसा नहीं था तो फिर उनके इस उछलकूद का मतलब क्या था। भाजपा व मोदी विरोध के नाम पर वह इस जमीनी हकीकत को कैसे भूल गये कि मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई जनहित की योजनाओं का सीधा लाभ जरूरतमंदों को मिलना ऐसा क्रांतिकारी कदम था जिसकी काट विपक्ष के पास नहीं थी। केवल मोदी विरोध के नाम पर विपक्षी एकजुटता जनता को नागवार गुजर रहा था।

उल्टा पड़ गया दांव 
राज्य के बंटवारे के बाद अमरावती को नई राजधानी के रूप में गढ़ने के लिए नायडू ने इसे सिंगापुर की तरह विकसित करने का संकल्प लिया था। जाहिर है, इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए उन्हें हजारों करोड़ रुपये की जरूरत थी और जब उन्हें लगा कि केंद्र सरकार राशि मुहैया नहीं करा रही, तो उन्होंने विशेष राज्य के मुद्दे को बहाना बनाते हुए प्रधानमंत्री मोदी से राजनीतिक किनारा कर लिया। उन्हें लगा कि सरकार से समर्थन को जनता शहादत मानेगी और उन्हें दोबारा आंध्र की गद्दी सौंप देगी। लेकिन न तो ऐसा होना था और न ही हुआ। उनका यह दांव पूरी तरह से उल्टा पड़ गया। उल्लेखनीय है कि देश में जब-जब केंद्र में कोई कमजोर सरकार होती है, तो क्षेत्रीय पार्टियां अपनी पूरी ऊर्जा के साथ अपने हित में मनमाने फैसले करा पाने के लिए एकजुट हो जाती हैं। राज्य में सत्ता और केंद्र में गठबंधन सुख को तमिलनाडु और जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं ने बखूबी साधा है।

नेताओं के मिलने से नहीं बल्कि जनता के दबाव व नेता के प्रति आकर्षण व विश्वास से गठबंधन बनता है। अगर वे अपने ससुर एनटीआर को नजीर मानकर ऐसा कर रहे थे तो उन्हें यह पता होना चाहिए कि उस वक्त विश्वनाथ प्रताप सिंह की लोकप्रियता चरम पर थी। बोफोर्स के खुलासे के बाद वह हीरो की तरह उभरे थे। क्या नायडू जैसे नेता भी इसे समझने में नाकाम रहे? अगर हां, तो क्यों और अगर नहीं तो फिर क्या वजह रही? यूं तो चंद्रबाबू नायडू की इस कवायद के पीछे कई वजहें थी, मगर उनमें से सबसे बड़ी वजह अपने वजूद की थी। अपने सूबे आंध्र प्रदेश में अपनी सरकार को बनाए रखने के लिए वह वाईएसआर कांग्रेस के साथ एक जबर्दस्त सियासी संग्राम लड़ रहे थे। बहरहाल, 2014 के चुनाव में चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इसका न केवल उन्हें बल्कि भाजपा को भी फायदा मिला था। राज्य की 25 लोकसभा की सीटों में से चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलगुदेशम को 15 और 175 सदस्यीय राज्य विधानसभा में 126 सीटों पर विजय मिली थी। इसी तरह भाजपा को लोकसभा की दो और विधानसभा की चार सीटों पर जीत मिली थी। इसी के साथ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 30 साल बाद केंद्र में पहली बार कोई गैरकांग्रेसी पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। पीएम मोदी ने अपनी सरकार में सभी घटक दलों को शामिल किया। नायडू की पार्टी भी मंत्रिपरिषद का हिस्सा बनी।

मोदी सरकार की गलती पर टिका भविष्य

सितंबर 2018 में दिल्ली में आयोजित भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दावा किया था कि 2019 की जीत के बाद पार्टी 50 वर्षों तक शासन करेगी। उस वक्त उनका यह बड़बोलापन माना गया। लेकिन मोदी सरकार को जिस तरह देश की जनता ने पहले से भी अधिक बहुमत के साथ सत्ता की चाबी सौंपी है, उससे शाह की बात सच होती प्रतीत हो रही है। वहीं, दूसरी तरफ चंद्रबाबू नायडू क्या पूरे विपक्ष को ही सांप सूंघ गया है। उनकी उम्मीदों से परे देश की जनता का यह जनादेश साफ संकेत है कि हाल फिलहाल तक पीएम को चुनौती देने की ताकत किसी भी दल में नहीं बची है। वजूद के संकट से गुजर रहे विपक्ष के सवाल पर देश के मूर्धन्य पत्रकार रामबहादुर राय का कहना है कि विपक्ष को जीवनदान उसी सूरत में मिल सकता है जब मोदी सरकार कोई बड़ी गलती कर दे, जिससे जनरोष पैदा हो जाये। जैसे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शाहबानो व बोफोर्स प्रकरण में कर दी थी। रिकॉर्ड बहुमत से जीत कर आये राजीव गांधी महज तीन साल में ही अलोकप्रिय हो गये थे। इसी तरह गठबंधन के सवाल पर राय साहब का मत है कि नेताओं के गलबहिया कर लेने से गठबंधन नहीं बन जाता। इसके लिए नेता का आकर्षण व उसकी विश्वसनीयता जरूरी होती है। वी पी सिंह के नेतृत्व में गठित जनमोर्चा व दो धुर विरोधी दलों वाममोर्चा व भाजपा का उसका समर्थन किया जाना जनदबाव का ही नतीजा था। ऐसे में सारा दारोमदार सरकार की गल्तियों पर टिका हुआ है। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक विपक्ष के दुर्दिन खत्म नहीं होने वाले।


लेकिन आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न दिये जाने को मुद्दा बनाकर नायडू की पार्टी एनडीए सरकार से अलग हो गई और मोदी विरोध का झंडा उठा लिया। मोदी को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए चंद्रबाबू नायडू ने हर वह जतन किया, जो वह कर सकते थे। लेकिन देश की जनता की तो बात ही क्या कहें खुद आंध्र प्रदेश की जनता को भी उनका यह बेसुरा राग नहीं सुहाया। नतीजा चुनावों में उनकी पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। लोकसभा की महज तीन और विधानसभा की केवल 23 सीटों पर सिमट गई नायडू की पार्टी का हाल देखकर तो यही अंदाजा लगता है कि विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास वह खुद के अस्तित्व की रक्षा के लिए कर रहे थे। विशेष राज्य के दर्जा का शिगूफा छोड़ देश भर में सक्रिय रहकर वह सूबे की जनता की सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर रहे थे। उन्हें लगा कि खुद को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत क र जनता की भावनाओं का दोहन कर वे आंध्र की गद्दी पर काबिज होने में कामयाब हो जायेंगे। लेकिन उनकी यह चाल बुरी तरह से फेल हो गई। बहरहाल, राज्य की सत्ता गंवाने और लोकसभा चुनाव में भारी हार के बाद अब पार्टी भी टूट गई है। उधर, नायडू विदेश में परिवार के साथ छुट्टियां मना रहे थे इधर, उनकी पार्टी के चार राज्यसभा सदस्यों ने उन्हें टाटा बाय-बाय करते हुए बीजेपी का दामन थाम लिया। दिलचस्प बात यह है कि जिन चार सांसदों ने पार्टी छोड़ी है, वे सभी नायडू के भरोसे के थे। सांसदों का साथ छोड़ना नायडू की मुश्किलों की शुरुआत भर है।

गलत निर्णय 
 नेताओं के मिलने से नहीं बल्कि जनता के दबाव व नेता के प्रति आकर्षण व विश्वास से गठबंधन बनता है। अगर वे अपने ससुर एनटी रामाराव को नजीर मानकर ऐसा कर रहे थे तो उन्हें यह पता होना चाहिए था कि उस वक्त विश्वनाथ प्रताप सिंह की लोकप्रियता चरम पर थी। बोफोर्स के खुलासे के बाद वह हीरो की तरह उभरे थे। गठबंधन जनदबाव का नतीजा था। क्या नायडू इसे समझने में नाकाम रहे? 
 चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करना सूबे की जनता को रास नहीं आ रहा था। यह एक अकल्पनीय गठजोड़ था। अस्तित्व के संकट ने चंद्रबाबू नायडू को यह कहने को मजबूर किया कि कांग्रेस और टीडीपी वैचारिक रूप से एक ही पाले में हैं। नायडू के लिए इस प्रयोग का नतीजा बेहद निराशाजनक रहा। क्या नायडू इस तथ्य से अनभिज्ञ थे कि यह महामिलावट जनता बर्दास्त नहीं कर पायेगी? 
 चुनाव से पहले तक खुद को भविष्य का ‘किंग मेकर’ मानकर चल रहे चंद्रबाबू जिस तरह से दिल्ली-कोलकाता एक किये हुए थे, उन्हें उम्मीद थी कि लोकसभा के त्रिशंकु होने की स्थिति में देवेगौड़ा की तरह लॉटरी उनके हाथ भी लग सकती है। यानी वह भी प्रधानमंत्री उम्मीदवारों की लाइन में थे इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन चुनाव परिणामों ने उनके ख्वाबों पर तुषारापात कर दिया।

आगे उनकी मुश्किलों में और अधिक इजाफा होने वाला है। मुश्किलों में इजाफे का एक उदाहरण यह भी है कि उनकी लाख मिन्नतों के बावजूद नियम कायदों को दरकिनार कर 8 करोड़ की लागत से बनवाई गई उनके अमरावती स्थित घर से सटी इमारत प्रजा वेदिका को जगन मोहन रेड्डी सरकार ने जमींदोज कर दिया है। मुख्यमंत्री के रूप में नायडू इसी इमारत में जनता दरबार लगाते थे व अफसरों तथा कार्यकर्ताओं से मिलते थे। उन्होंने राज्य सरकार से विपक्ष के नेता के तौर पर इस इमारत की मांग की थी लेकिन गैरकानूनी रूप से बनाये गये इस इमारत को रेड्डी ने ढहा दिया। सियासी पंडितों का मानना है कि उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होने वाली। राज्य की रेड्डी सरकार लगातार उनके फैसलों की समीक्षा कर रही है और कई अहम निर्णयों को रद्द किया गया है। खबरें यहां तक हैं कि कुछ फैसलों को लेकर आने वाले दिनों में नायडू को कटघरे में भी खड़ा किया जा सकता है। बहरहाल, नायडू ने जोखिम भरा दांव चला था, नतीजों ने इसकी तस्दीक कर दी है। चुनाव से पहले वह कांग्रेस के साथ हो गए। जबकि आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को राज्य के विभाजन के लिए जिम्मेदार माना जाता है। गलत वक्त पर लिए गए फैसलों के कारण नायडू प्रदेश में ही नहीं पार्टी के भीतर भी अलोकप्रिय हो गए। नायडू हालांकि ऐसी परिस्थितियों से पहले भी दो-चार हो चुके हैं। 2004 और 2009 में भी उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। चार दशकों से भी लंबे अपने राजनीतिक जीवन में एन चंद्रबाबू नायडू ने कई जोखिम उठाए और अनेक चुनौतियों का सामना किया, मगर मौजूदा चुनौती उन सबसे अलहदा है। यह उनके पूरे राजनीतिक करियर को बना भी सकता है और मिटा भी सकती है। प्रश्न यह है कि क्या वह फिर से खड़े हो पाएंगे?


 
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