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मोदी का ही सहारा

17/02/2020

मोदी का ही सहारा

गुंजन कुमार

बाइस साल से दिल्ली की सत्ता से बाहर भाजपा इस बार कोई गलती नहीं करना चाहती। पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी को थामने के लिए किसी स्थानीय चेहरे को आगे नहीं किया जा रहा है। इस बार विधानसभा चुनाव भी पार्टी मोदी के नेतृत्व में लड़ रही है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी सेना सजा रहे हैं। तरकश में वादों के तीर सबके पास हैं। मगर सेनापति के मामले में कुछ दल उलझे हुए हैं। आम आदमी पार्टी (आप) को अपने वर्तमान सेनापति अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व पर भरोसा है। भाजपा स्थानीय सेनापति के बजाए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उतरने में ही अपना विजय देखती है। क्योंकि पिछले चुनाव में पार्टी ने केजरीवाल के सामने ईमानदार एवं सख्त रही आईपीएस अधिकारी किरण बेदी को चेहरा बनाकर मैदान में उतारा था। किरण बेदी भी अन्ना आंदोलन में सक्रिय रहीं थीं। इसके बावजूद पार्टी केजरीवाल के सामने बीस साबित नहीं हो पाई।
पार्टी को तीन सीट से ही संतोष करना पड़ा। तीसरी पार्टी, कांग्रेस में सेनापति को लेकर सबसे ज्यादा उलझन है। इसलिए वह बिना उसके चुनाव मैदान में उतर रही है। ग्यारह फरवरी को पता चल जाएगा कि इस बार किस दल ने बाजी मारी।मगर यहां बात भाजपा की। लोकसभा चुनाव 2019 में यहां शानदार प्रदर्शन से पार्टी का मनोबल काफी ऊंचा है। उक्त चुनाव में पार्टी ने सभी सातों सीट ली थी। वोट प्रतिशत भी 56 से ज्यादा रहा। यह वोट प्रतिशत लोकसभा चुनाव 2014 की तुलना में काफी ज्यादा था। दो चुनाव के दौरान 10 फीसदी से ज्यादा का वोट शेयर बढ़ना किसी भी पार्टी के लिए अच्छे संकेत हैं। भाजपा का पिछले लोकसभा चुनाव में 2014 की तुलना में वोट शेयर 46 फीसदी से बढ़कर 56 फीसदी हो गया था।
इसलिए पार्टी नेताओं को उम्मीद है कि वह इस बार वैसा ही प्रदर्शन करने वाले हैं। लेकिन भाजपा नेताओं को यह भी समझ लेना चाहिए कि 2015 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर 2014 की तुलना में 46 फीसदी से घटकर 32 फीसदी पर आ गया था। वहीं आप का वोट शेयर 32 फीसदी से बढ़कर 2015 के चुनाव में 54 फीसदी से ज्यादा पर पहुंच गया था। इसलिए पार्टी नेता यदि इन आंकड़ों की खुशफहमी में रहेंगे तो उन्हें नुकसान हो सकता है।शायद इसी लिए पार्टी नेता इस बार राजधानीवासियों से ट्रिपल इंजन वाली सरकार बनाने के लिए कह रहे हैं। यानी केंद्र और निगम के बाद विधानसभा में भी उन्हें ही जिताएं। ताकि दिल्ली में विकास रμतार पकड़ सकें। इसके बावजूद भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती केजरीवाल के सामने स्थानीय चेहरा न होना है। आप इसे मुद्दा भी बना रही है। वह कभी तंज कसती है कि भाजपा के सात मुख्यमंत्रियों में प्रतियोगिता चल रही है।
इसके इतर एक सच्चाई यह भी है कि पार्टी यहां जब भी किसी चेहरा को सामने रखकर चुनाव लड़ी है, उसे हार ही मिली है। 2013 में डॉ हर्षवर्धन चेहरा थे तो 2015 में किरण बेदी। इसके पहले भी ऐसे उदाहरण हैं। इन सबसे बड़ा कारण पार्टी के प्रदेश नेताओं में गुटबाजी का होना बताया जाता है। जब भी किसी को चेहरा बनाया जाता है तो प्रदेश के अन्य बड़े नेता चुनाव में अंदरखाने निष्क्रिय हो जाते हैं। शायद यही वजह है कि इस बार पार्टी ने किसी का चेहरा सामने नहीं रखा है। वह सामूहिक नेतृत्व में मोदी की छवि को आगे रखकर चुनाव मैदान में है। एक तरह से कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि दिल्ली चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर लड़ा जा रहा है। पार्टी को प्रधानमंत्री की करिश्माई छवि पर पूरा भरोसा है। दिल्ली के सभी इलाकों में प्रधानमंत्री के चेहरे वाले होर्डिंग्स लगे हुए हैं। इसमें दिल्ली के लिए किए गए कार्यों का उल्लेख है।
पार्टी दिल्ली में 1800 के करीब अनाधिकृत कॉलोनियों के लोगों को केंद्र सरकार द्वारा मालिकाना हक देने को प्रमुखता दे रही है। ऐसे भी दिल्ली में अनाधिकृत कॉलोनियों का मामला हर चुनाव में छाया रहता है। कहा जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने का एक प्रमुख कारण अनाधिकृत कॉलोनियों को प्रोविजनल सर्टिफिकेट बांटना भी रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन कॉलोनियों में रहने वाले करीब 40 लाख लोगों की वर्षों पुरानी मांग को पूरा किया है। पार्टी अब मानकर चल रही है कि इसका लाभ उसे जरूर मिलेगा। यदि ऐसा होता है तो भाजपा को 22 साल बाद दिल्ली की सत्ता पर बैठने से केजरीवाल नहीं रोक सकेंगे। इसके अलावा भाजपा ‘जहां झुग्गी वहीं मकान’ योजना को भी दिल्ली में प्रमुखता से उठा रही है। पार्टी के प्रचार में इसे भी लोगों को समझाया जा रहा है। झुग्गी में रहने वाले मतदाता पहले कांग्रेस के वोटर माने जाते थे।
अब वे आप के पाले में चले गए हैं। इसलिए पार्टी आप के उस वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास कर रही है। इसमें पार्टी कितना सफल हो पाती है, यह तो चुनाव नतीजा आने के बाद ही पता चल पाएगा। इसके अलावा कई अन्य स्थानीय मुद्दों को भाजपा उठा रही है। जिसमें आम आदमी पार्टी के वादों का पूरा न होना। दिल्लीवासियों को गंदा पेयजल उपलब्ध होना आदि है। भाजपा के चुनाव प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, ‘आम आदमी पार्टी ने 2015 में दर्जनों वादे किए थे। इसमें से एक भी वादा उनकी सरकार ने पूरा नहीं किया। दिल्ली वालों को गंदा पानी पिलाया जा रहा है। लोग बीमार हो रहे हैं।’ इन स्थानीय मुद्दों के अलावा भाजपा राष्ट्रीय मुद्दों को भी लोगों के सामने रख रही है। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण सीएए और राम मंदिर का मुद्दा है। दिल्ली में पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए वहां के अल्पसंख्यक भी बहुत अधिक संख्या में रहते हैं। पार्टी को इसका भी लाभ होने की उम्मीद है।
खुद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सीएए पर मोर्चा संभाले हुए हैं। पिछले दिनों ही अमित शाह ने दिल्ली में हुए हिंसक प्रदर्शन में कांग्रेस और आप के शामिल होने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि दिल्ली सीएए के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान दंगा भड़काने में केजरीवाल, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा शामिल थीं। पार्टी ने भी स्पष्ट कहा है कि वह दिल्ली विधानसभा चुनाव में नागरिकता संशोधन कानून को अहम मुद्दा बनाएगी। दिल्ली चुनाव की घोषणा के कुछ दिनों पहले ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सीएए के सपोर्ट में लोगों से एक नंबर पर मिस्ड कॉल करने की अपील की थी। पार्टी का कहना है कि उस नंबर पर अब तक करीब 53 लाख लोगों ने मिस्ड कॉल किया है। इन आंकड़ों से भी पार्टी उत्साहित हैं। इसलिए भी पार्टी ने चुनाव के दौरान सीएए के समर्थन में आक्रमक प्रचार करने की रणनीति बनाई है। दिल्ली में सीएए के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए हैं।

एक तरह से कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि दिल्ली चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर लड़ा जा रहा है। पार्टी को अपने प्रधानमंत्री के करिश्माई छवि पर पूरा भरोसा है। दिल्ली के सभी इलाकों में प्रधानमंत्री के चेहरे वाले होर्डिंग्स लगे हुए हैं।

अभी भी हो रहे हैं। पार्टी को लग रहा है कि यदि वह जनता को सीएए समझाने में और राजधानी में उसके खिलाफ हुए हिंसा को लोग समझ गए तो वह लोकसभा चुनाव के वोट शेयर को बांधे रख सकती है। इसके अलावा पार्टी इस बार यह रणनीति भी बना रही है कि वह कांग्रेस में अच्छा प्रदर्शन करे। उसके पुराने वोट बैंक, जो आप में चला गया था, वह फिर से कांग्रेस के पास आ जाए। इसका लाभ भी भाजपा को होगी। कहने का अर्थ यह है कि पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव त्रिशंकु करना चाहती है। ताकि विपक्षी वोट में बंटवारा हो। इससे पार्टी को लाभ मिलेगा। लेकिन यदि दिल्ली चुनाव भाजपा बनाम आप हुई तो इसका सीधा लाभ केजरीवाल को होने वाला है। इन सबके इतर एक सच्चाई यह भी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी का वोट शेयर बहुत ज्यादा घटा है। पार्टी को भी इसकी चिंता सता रही है। पार्टी के एक पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि लोकसभा चुनाव में हमें मोदी जी के नाम और काम पर एक तरफा वोट पड़ता है जबकि राज्यों में ऐसा नहीं हो पा रहा है।
यह हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों से भी साफ होता है। हरियाणा और झारखंड विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव के मुकाबले पार्टी के वोट शेयर 22 प्रतिशत से भी ज्यादा खिसका है। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भाजपा का कैडर वोट खिसका नहीं है। पार्टी को हमेशा 32 फीसदी के करीब वोट मिलते रहे हैं। पार्टी को बस अपने कैडर वोट में कुछ और वोट शेयर को जोड़ना है।


 
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