लेख

Blog single photo

संसद में सरकार के समक्ष चुनौतियां

16/06/2019

रमेश ठाकुर 
रेन्द्र मोदी सरकार पार्ट-2 के पहले संसद सत्र का श्रीगणेश सोमवार को हो जाएगा। लोकसभा चुनाव के दौरान घोषणापत्र के जरिए किए वायदों को पूरा करने की चुनौती सरकार के समक्ष होगी। साथ ही इसी साल तीन विधानसभाओं में चुनाव भी होने हैं। उन्हें भी ध्यान में रखकर केंद्र सरकार अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगी। सत्र 25 जुलाई तक चलेगा। दरअसल, सरकार का पहला सत्र पिछले कुछ सत्रों के मुकाबले खास माना जा रहा है। खास इसलिए है कि इस सत्र में लोकसभा स्पीकर का चुनाव होगा और पांच जुलाई को बजट पेश किया जाएगा। लोकसभा स्पीकर किसे चुना जाएगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। कइयों के नाम सामने आ रहे हैं। कयास लगने शुरू हो गए हैं कि शायद इस बार भी किसी महिला सांसद को ही स्पीकर बनाया जाए। इस कड़ी में सुल्तानपुर से निर्वाचित हुईं मेनका गांधी का नाम सबसे आगे चल रहा है। लेकिन खबरें ऐसी भी आ रही हैं कि मेनका गांधी शायद स्पीकर बनना स्वीकार न करें। सरकार में मंत्री नहीं बनाए जाने को लेकर फिलहाल अभी उन्होंने अपने गुस्से की चुप्पी को नहीं तोड़ी है। लेकिन सूत्र बताते हैं कि उन्हें बड़ा ओहदा देने का आश्वासन दिया गया है। सच्चाई क्या है सामने आने का वक्त आ गया है।
17वीं लोकसभा में कई ऐसे चेहरे हैं जो पहली बार संसद सत्र में शामिल होंगे। इनमें युवाओं की संख्या भी अच्छी है। सत्र के पहले और दूसरे दिन देशभर से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए सदस्यों को सदन की सदस्यता की शपथ दिलाई जाएगी। प्रोटेम स्पीकर वीरेन्द्र कुमार नवनिर्वाचित सांसदों को शपथ दिलाएंगे। इसके बाद पूरे देश की नजरें मोदी सरकार पार्ट के पहले बजट पर रहेंगी। जिसे पांच जुलाई को पेश किया जाएगा। पूर्णकालिक महिला वित्तमंत्री के रूप में निर्मला सीतारमण पर सभी की निगाहें टिकी होंगी। आजादी के बाद अब तक बजट पुरूष वित्त मंत्री द्वारा ही पेश किया जाता रहा है। इसलिए उनके मुकाबले क्या कुछ अलग बजट पेश करेंगी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, यह देखने वाली बात होगी। 20 जून को संसद के संयुक्त सत्र को राष्ट्रपति संबोधित करेंगे। उनका भाषण भी इस बार कुछ खास होगा। संसदीय परंपरा के तौर पर सालों से बने प्रोटोकॉल में कुछ बदलाव की भी संभावनाएं जताई जा रही हैं। 
एक ऐसा मसला है जो इस सत्र में गरमा सकता है। आर्थिक सर्वेक्षण को लेकर हंगामा होने के आसार हैं। इस मसले पर पक्ष-विपक्ष के बीच टकराव हो सकता है। मोदी सरकार आर्थिक सर्वेक्षण को लेकर आगामी चार जुलाई को लोकसभा में अपना विजन पेश करेगी, जिसमें अगड़ी जातियों को दस फीसद दिए जाने वाले आरक्षण का मसौदा शामिल होगा। विपक्षी दल अपने स्तर से तसल्ली करना चाहेंगे कि आखिर सरकार ने किस मानक और आधार पर आर्थिक आरक्षण का प्रावधान किया है। अगर उनके मन मुताबिक रिपोर्ट पेश नहीं हुई तो उन्हें बिफरने में समय नहीं लगेगा। हालांकि इस मुद्दे पर सरकार पूरी तैयारी के साथ सर्वेक्षण की रिपोर्ट संसद के पटल पर रखेगी। मोदी कैबिनेट ने पूर्व में इस मसले पर काफी मंथन किया है। 
इसके अलावा मोदी सरकार पर चुनावों में जनता से किए चुनावी घोषणापत्र के वादों को पूरा करने की भी जिम्मेदारी रहेगी। सरकार बनने के दूसरे दिन ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली कैबिनेट में बड़े फैसले लिए गए थे, जिनमें कृषि सुधार जैसे कई फैसले शामिल रहे। छोटे और सीमांत किसानों की सामाजिक सुरक्षा के लिए स्कीम भी लांच की गई है। इन फैसलों से मेहतनी किसानों और कर्मशील व्यापारियों को अत्यंत लाभ होगा। इसके अलावा नेशनल डिफेंस फंड के तहत मिलने वाली स्कॉलरशिप में लड़कों के लिए 25 फीसद और लड़कियों के लिए 33 फीसदी की बढ़ोतरी करना, असंगठित मजदूरों को तीन हजार मासिक पेंशन के प्रस्ताव को मंजूरी देना आदि शामिल है। इन स्कीमों पर सरकार को जनता का पूर्ण समर्थन हासिल है।  
रोजगार और सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल बना हुआ है। अपनी असुरक्षा को लेकर इस वक्त पूरे देश के चिकित्सक सड़कों पर उतरे हुए हैं। कोलकाता में पिछले दिनों एक चिकित्सक साथ की गई मारपीट को लेकर डॉक्टर गुस्से में हैं। बीते शुक्रवार को पूरे देश के डॉक्टरों ने हड़ताल की। इसके अलावा सबसे बड़ा मसला जो मोदी सरकार के लिए चुनौती होगा, वह है रोजगार का मुद्दा। समूचे भारत में धीरे-धीरे नौकरी का सवाल बड़ा हो रहा है। ऐसे आंकड़े आ रहे थे कि पिछले साल शहरों और गांवों में कई लोगों की नौकरियां चली गई। जब मोदी सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला कर लिया है, तो नौकरियों को तैयार करना होगा। आरक्षण देने का मतलब है नौकरी देना। समीक्षा तभी होगी, जब नौकरियां दी जाएंगी। लेकिन एकदम नौकरियां तैयार करना और वितरण करना, इतना आसान नहीं है। 
सरकार को संसद सत्र में घेरने के लिए विपक्षी पार्टियां भी कमर कस चुकी हैं। विपक्षी दल लगातार मीटिंग कर रहे हैं। हालांकि सरकार को चिंता नहीं है, क्योंकि इस बार संसद में विपक्ष काफी कमजोर है। संसद में विपक्षी दल का नेता भी नहीं होगा, क्योंकि नेता विपक्ष के लिए प्रमुख विपक्षी दल के पास 55 सदस्य होने चाहिए, वह संख्या भी कांग्रेस के पास नहीं है। इसके अलावा टीएमसी का कैसा व्यवहार होगा? बाकी दल सरकार के साथ होंगे या नहीं, देखने वाली बात होगी। पिछले सत्र में पास नहीं हुए दर्जनों बिल, क्या इस बार भी पास हो पाएंगे? तीन तलाक को लेकर विपक्ष अब भी अड़ियल रवैया अपनाए हुए है। ऐसे तमाम बिल हैं जिसे पास करने की सरकार के समक्ष चुनौती होगी। इस साल तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए उनको ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार कोशिश करेगी पेंडिंग बिल और घोषणा पत्र में किए वादों को पूरा करने की। आरक्षण और तीन तलाक, ये दो ऐसे मसले हैं जिन पर तुरंत निर्णय नहीं लिया जा सकता। कई कानूनी पचड़े हैं जिन्हें सुलझाने की दरकार केंद्र सरकार के समक्ष रहेगी।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
Top