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फिर गलत साबित हुए चुनावी पूर्वानुमान

28/10/2019

प्रमोद भार्गव

हाराष्ट्र व हरियाणा के विधानसभा चुनाव परिणामों से जुड़े जनमत सर्वेक्षण गलत साबित हुए हैं। जमीनी सच्चाई से दूर इन अनुमानों में दावा किया गया था कि दोनों राज्यों में राजग, यानी भाजपा गठबंधन को भारी जीत मिलने जा रही है। इसकी तुलना में संप्रग यानी कांग्रेस गठबंधन को मजबूत नेतृत्व के अभाव में करारी हार का सामना करना पड़ेगा। हालांकि इंडिया टुडे-एक्सिस माई इंडिया का एकमात्र मतदान के बाद आया ऐसा सर्वेक्षण रहा है, जिसके पूर्वानुमान इन दोनों राज्यों में वास्तविक परिणामों के बहुत करीब रहे हैं। इस सर्वे में 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा-शिवसेना को 166-194 और कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गठबंधन को 72 से 90 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था। इसी तरह 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा में भाजपा को 32 से 44, कांग्रेस को 30 से 42 तथा जननायक जनता पार्टी को 6 से 10 सीटें मिलने की उम्मीद जताई गई थी। मतगणना के बाद ये अनुमान सर्वेक्षण की तराजू पर लगभग खरे उतरे। भाजपा-शिवसेना को महाराष्ट्र में 162, कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 98 और हरियाणा में भाजपा को 40, कांग्रेस को 31 और जेजेपी को 10 सीटों पर जीत हासिल हुई है।
अन्य सर्वे दोनों राज्यों में राष्ट्रवाद का झंडा फहराते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आंधी आने की संभावना जता रहे थे। महाराष्ट्र में एबीपी-सी-वोटर राजग को 204, संप्रग को 69, इंडिया न्यूज-पोल स्ट्रेट -194-209 राजग और 79-84 संप्रग, रिपब्लिक-जन की बात- राजग 216-230, संप्रग 50-59, टीवी 9-सिसेरो- राजग 192-202, संप्रग 70-80 और न्यूज 18-इप्सॉस, राजग को 243 और संप्रग को 39 सीटें दे रहे थे। हरियाणा में एबीपी-सी-वोटर राजग को 72, कांग्रेस 8, इंडिया न्यूज-पोल स्ट्रेट- राजग 75-80, संप्रग 9-12, रिपब्लिक-जन की बात- राजग 52-63, संप्रग 15-19, टीवी 9-सिसेरो, राजग 69, संप्रग 11 और न्यूज 18-इप्सॉस ने  राजग को 75 और संप्रग को 10 सीटें बताई थीं। ये अनुमान यदि औसत अनुमान के रूप में परिणाम में बदले दिखाई देते तो महाराष्ट्र में राजग को 213, संप्रग को 64 तथा हरियाणा में राजग को 70 और संप्रग को 11 सीटें मिलनी चाहिए थीं। लेकिन इन सर्वेक्षणों के परिणाम औसत सीटों के आसपास भी दिखाई नहीं दिए। इससे पता चलता है कि इंडिया टुडे का सर्वे छोड़, बाकी सर्वे टेबल पर बैठकर किए गए हैं। वैसे भी पिछले 22 चुनावों के एग्जिट पोल बमुश्किल 60 प्रतिशत ही सही साबित हुए हैं। इन सर्वेक्षणों ने ओपीनियन पोल यानी मतदान से पहले किए गए सर्वे के बहाने नरेन्द्र मोदी और भाजपा का गुणगान करके भी उसे अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया है। इसीलिए ओपीनियन पोल पर प्रतिबंध लगाने की बात उठती रही है।
फिलहाल हमारे देश में चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण एक नया विषय है। यह 'सेफोलॉजी' मसलन जनमत सर्वेक्षण विज्ञान के अंतर्गत आता है। भारत के गिने-चुने विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम के तहत सेफोलॉजी को पढ़ाने की शुरुआत हुई है। जाहिर है, विषय और इसके विशेषज्ञ अभी अपरिपक्व अवस्था में हैं। सर्वेक्षणों पर शक की सुई इसलिए भी जा ठहरती है कि पिछले कुछ सालों में निर्वाचन-पूर्व सर्वेक्षणों की बाढ़-सी आई हुई है। इनमें तमाम कंपनियां ऐसी हैं, जो धन लेकर सर्वे करती हैं। वैसे भी किसी भी प्रदेश के करोड़ों मतदाताओं की मंशा का आकलन महज कुछ हजार मतदाताओं की राय लेकर सटीक नहीं किया जा सकता है। कभी-कभी ये अटकलें खरी उतर जाती हैं। इसलिए चुनाव सर्वेक्षणों के प्रसारण व प्रकाशन पर रोक लगनी चाहिए।
ओपीनियन पोल मतदाता को गुमराह कर निष्पक्ष चुनाव में बाधा बन रहे हैं। इसीलिए पूर्व महाधिवक्ता गुलाम ई वाहनवती ने केंद्र सरकार को निर्वाचन पूर्व सर्वेक्षणों पर रोक लगाने की सलाह दी थी। वैसे भी ये सर्वेक्षण वैज्ञानिक नहीं हैं, क्योंकि इनमें पारदर्शिता की कमी है और ये किसी नियम से बंधे नहीं हैं। साथ ही ये सर्वे कंपनियों को धन देकर कराए जा सकते हैं। बावजूद इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने ढोया जा रहा है। जबकि ये पेड न्यूज की तर्ज पर 'पेड ओपीनियन पोल' में बदल गए हैं। इसीलिए इनके परिणाम भरोसे के तकाजे पर खरे नहीं उतरते। सर्वे कराने वाली एजेंसियां भी स्वायत्त होने के साथ जवाबदेही के बंधन से मुक्त हैं। 
चुनाव आयोग ने 21 अक्टूबर 2013 को सभी राजनीतिक दलों को एक पत्र लिखकर चुनाव सर्वेक्षणों पर राय मांगी थी। दलों ने जो जवाब दिए, उससे मत भिन्नता पेश आई। वैसे भी बहुदलीय लोकतंत्र में एकमत की उम्मीद बेमानी है। जाहिर है, कांग्रेस ने सर्वेक्षण निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले बताए थे। बसपा ने भी असहमति जताई थी। माकपा की राय थी कि निर्वाचन अधिसूचना जारी होने के बाद सर्वेक्षणों के प्रसारण और प्रकाशन पर प्रतिबंध जरूरी है। तृणमूल कांग्रेस ने आयोग के फैसले का सम्मान करने की बात कही थी। जबकि भाजपा ने इन सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध लगाना संविधान के विरुद्ध माना था। उस समय ज्यादातर चुनाव सर्वेक्षण भाजपा के पक्ष में आ रहे थे। उसने तथ्य दिया था कि सर्वेक्षणों में दर्ज मतदाता या व्यक्ति की राय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का ही मामला है। तय है, दलों के अलग-अलग रुझान भ्रम और गुमराह की मन:स्थिति पैदा करने वाले थे इसलिए चुनाव आयोग भी हाथ पर हाथ धरे बैठा रह गया।
जो राजनीतिक दलों और सर्वेक्षण कंपनियों के पैरोकार इन सर्वेक्षणों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने जारी रखने की बात कह रहे हैं, उन्हें सोचने की जरूरत है कि संविधान के अनुच्छेद 19-1 में दर्ज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आजादी के मौलिक अधिकारों के प्रावधानों का दुरुपयोग भी हुआ है। हर एक चुनाव में पेड न्यूज के जरिए दलों और उम्मीदवारों का विद्युत व मुद्रित मीडिया ने कितना आर्थिक दोहन किया यह सक्रिय राजनीति और पत्रकारिता से जुड़ा हर व्यक्ति जानता है। दरअसल, संविधान की मूल भावना, 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की ओट में ही मीडिया का उम्मीद से ज्यादा व्यवसायीकरण हुआ है। मीडिया में मीडिया से इतर व्यवसाय वाली कंपनियों ने बड़ी पूंजी लगाकर प्रवेश किया और देखते-देखते अनेक निष्पक्ष स्वायत्त घरानों, मंचों, पत्रकार समितियों व संस्थानों पर कब्जा कर लिया। जाहिर है, पेड न्यूज के सिलसिले में तो मीडिया पहले ही अपना विश्वास खो चुका है उसका पेड ओपीनियन पोल खालिस मुनाफाखोरी की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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