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5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था चुनौती कठिन लेकिन असंभव नहीं

18/08/2019

5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था चुनौती कठिन लेकिन असंभव नहीं


वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश को 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का जो लक्ष्य रखा है वह कठिन तो है लेकिन असंभव नहीं। यह बात विपक्षी दलों के महत्वपूर्ण नेता भी मानते हैं। आज भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में पहले पायदान पर है। भले ही इस समय जीडीपी विकास की दर में थोड़ी गिरावट आई है लेकिन सच्चाई है कि यह जल्द ही 7 प्रतिशत की तेज गति पा लेगी। इतना ही नहीं,अगर अन्य परिस्थितियां सामान्य रहीं तो यह दर 8 या फिर 9 प्रतिशत तक जा सकती है। यह भी एक सच है कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुआई में भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछले पांच साल में एक खरब डॉलर जोड़े हैं और हमारी अर्थव्यवस्था 2.7 खरब डॉलर की बन गई है। इससे भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।

चीन-अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध बाधा की तरह है लेकिन इसे भी अवसर के रूप में लेना होगा। विदेशों से बांड के जरिये 10 अरब डॉलर जुटाने की सरकार की नीति अगर सफल रही तो योजनाओं को पूरा करने के लिए धन की कमी नहीं रहेगी।

वित्त मंत्री का कहना है कि इसी साल हमारी अर्थव्यवस्था 3 खरब डॉलर की हो जाएगी। बस यह कुछ महीनों की बात है कि भारत इंग्लैंड को पछाड़कर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। भारत को 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए सबसे पहले तो जरूरी है कि देश में मुद्रास्फीति की दर 4 प्रतिशत से ज्यादा कतई नहीं हो। मुद्रास्फीति बढ़ने से अर्थव्यवस्था के पांव लड़खड़ाने लगते हैं और उसकी गति धीमी पड़ जाती है। इसके अलावा जीडीपी विकास की दर 7 से 8 प्रतिशत रहे। विकास की दर में द्रुत गति से बढ़ोतरी पर ही यह लक्ष्य टिका हुआ है।

यह थोड़ा पेचीदा मामला है क्योंकि अभी विकास की दर 6.8 प्रतिशत है। यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के आरंभ में जीडीपी विकास की दर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की। 2012-13 में जहां हमारी विकास दर 5.5 प्रतिशत थी वहीं यह 2015 में 8 प्रतिशत को भी पार कर गई। यह उदाहरण देने का तात्पर्य यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था में विस्तार और प्रगति की क्षमता भरपूर है। फिलहाल इसमें थोड़ी गिरावट आई है लेकिन कोई कारण नहीं है कि यह 8 प्रतिशत की दर को फिर न छू ले क्योंकि आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि हालात में सुधार हो रहे हैं और अगले साल जीडीपी विकास की दर बढ़कर 7 प्रतिशत हो जाएगी। यह 8 और 9 प्रतिशत तक जा सकती है जिससे वित्त मंत्री का लक्ष्य आसान हो जाएगा।

वित्त मंत्री ने भारत को 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए अपने पहले बजट में कई कदमों की घोषणा की है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने राजस्व घाटे पर अंकुश लगाया है और इसे जीडीपी के 3.3 प्रतिशत तक सीमित रखने की घोषणा की है। राजस्व घाटे पर नियंत्रण रखना इसके लिए अनिवार्य शर्त है। इससे निवेश करने वालों को बल मिलेगा। दरअसल इस बजट में निवेश पर काफी जÞोर है और सरकार चाहती है कि देसी और विदेशी निवेश बढ़े। इसके लिए वह तमाम तरह के कदम उठा रही है। निवेशकों के लिए सरकार ने कई रास्ते खोले हैं और स्वयं प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी इस दिशा में कार्यशील हैं। अपने पिछले विदेशी दौरों में उन्होंने निवेश के लिए लगातार प्रयास किया है। आने वाले समय में यह कार्य दोगुने जोश से होगा।

भारत पांच खरब डॉलर की महत्वाकांक्षी अर्थव्यवस्था बनने की ओर ठोस कदम बढ़ाने को तत्पर दिखता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कच्चे तेल के भाव और डॉलर की कीमतें पहले की तरह अंधाधुंध न बढ़ें।

अपने सभी मंत्रालयों को 100 दिनों का कार्य लक्ष्य देकर उन्होंने यह स्पष्ट संदेश तक दिया है कि सरकार हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठी रहेगी। उनके इस पहल से निवेशकों में विश्वास बढ़ा है और वे निवेश करना चाहेंगे। देश में विकास को बढ़ावा देने के लिए वित्त मंत्री ने इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पूरा ध्यान दिया है और उस पर 100 लाख करोड़ रुपये के खर्च की बात कही है। यह रकम बहुत बड़ी है और इससे न केवल बाजÞार में तरलता आएगी बल्कि अर्थव्यवस्था में विस्तार भी होगा। इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास की कुंजी है। यह बात आसियान देशों ने बहुत पहले समझ ली थी और तभी तो वे विकास की दौड़ में हमसे कहीं आगे निकल गए थे। लेकिन वर्तमान सरकार इस दिशा में कार्यरत है और उसने इसे शीर्ष वरीयता दी है।

दरअसल पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का यह सपना था कि देश के बुनियादी ढांचे का बड़े पैमान पर विस्तार हो और इस दिशा में काम भी हुआ था लेकिन यूपीए सरकार ने इसमें बाधा डाल दी और उस समय की तमाम योजनाओं को बट्टे खाते में डाल दिया था। देश में अभी औद्योगिक उत्पादों की मांग में कमी आई है और इसका असर जीडीपी पर पड़ा है। भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का जीडीपी में योगदान लगभग 23 प्रतिशत का ही है जबकि विकसित देशों में यह 30 प्रतिशत है। हमारा लक्ष्य इसे बढ़ाकर उन ऊंचाइयों तक ले जाने का है। इसलिए अब सरकार न केवल खुद खर्च करने जा रही है बल्कि देसी और विदेशी निवेशकों को भी प्रोत्साहन देने जा रही है। इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। हाउसिंग सेक्टर को बढ़ावा देकर सरकार ने बाजार में मांग बढ़ाने का रास्ता खोला है। इससे देश में आवास की समस्या का समाधान तो होगा, औद्योगिक वस्तुओं की मांग भी बढ़ेगी।

अब 400 करोड़ रुपये तक का कारोबार करने वाली कंपनियों पर टैक्स घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया है। इससे उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा। मध्यम वर्ग की इनकम टैक्स की सीमा बढ़ाकर सालाना 5 लाख रुपये करके सरकार ने उन्हें अधिक खर्च करने को उत्साहित किया है। भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू खपत पर आधारित है और यह जरूरी है कि यहां निर्यात को भी बढ़ावा दिया जाए। निर्यात को बढ़ावा देने में इस समय सबसे बड़ी बाधा है, चीन-अमेरिका का व्यापार युद्ध। इसका दुष्परिणाम भारत को भी भुगतना पड़ रहा है। आने वाले समय में इसके समाधान की संभावना नहीं दिख रही है और इसलिए वाणिज्य मंत्रालय को काफी कुछ करना होगा। कोशिश तो यह होनी चाहिए कि इस अघोषित युद्ध का भारत फायदा उठा ले। इस दिशा में भी वित्त मंत्री ने कदम उठाया है।

विदेशों से बांड के जरिये 10 अरब डॉलर जुटाने की सरकार की नीति अगर सफल रही तो सरकार के पास योजनाओं को पूरा करने के लिए धन की कमी नहीं रहेगी। इसी तरह विनिवेश के जरिये धन जुटाकर सरकार अर्थव्यवस्था पर बोझ को हल्का करेगी। इससे घरेलू बाजारों में तरलता बनी रहेगी। बैंकों और एनबीएफसी को बढ़ावा देने के लिए वित्त मंत्री ने कई कदमों की घोषणा की है। बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 70,000 करोड़ रुपये की राशि आवंटित करके सरकार ने उनमें जान डाल दी है। बैंकिंग सिस्टम एनपीए के बोझ से लड़खड़ा रहा था लेकिन अब उसमें भारी रिकवरी के कारण हमारे सरकारी बैंक मजबूत हो रहे हैं। जैस-जैसे बैंकों का डूबा हुआ पैसा लौटेगा वैसे-वैसे वे मजबूत होते जाएंगे। एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि सरकार के राजस्व में कितनी बढ़ोतरी होगी।

पिछले वित्त वर्ष में हमने देखा कि टैक्स वसूली में कमी आई है। आलोचकों का कहना है कि सरकार की टैक्स वसूली में डेढ़ लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा की कमी आई है। यह गंभीर मामला है और इस पर नजर रखनÞे की जरूरत है। यहां देखने वाली बात यह है कि जिस जीएसटी से सरकार को टैक्स वसूली में बड़ी उम्मीदें थीं, वह अब दिख नहीं रही है। हम अब तक डेढ़ लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाये हैं। जीएसटी में व्यापारियों द्वारा हेराफेरी की खबरें लगातार आ रही हैं। इतना ही नहीं ,जनता को भी पर्याप्त राहत नहीं मिल पा रही है। इस दिशा में केन्द्र और राज्य सरकारों को मिलकर कदम उठाना होगा। सरकार के पास अगर कम संसाधन होंगे तो बड़े लक्ष्य पूरे कैसे होंगे? बजट में वित्त मंत्री ने जो प्रस्ताव किए हैं उनका सही-सही पालन करके भारत पांच खरब डॉलर की महत्वाकांक्षी अर्थव्यवस्था बनने की ओर ठोस कदम बढ़ाने को तत्पर दिखता है।

लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कच्चे तेल के भाव और डॉलर की कीमतें पहले की तरह अंधाधुंध न बढ़ें। कच्चे तेल की बढ़ी कीमतें अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाती हैं और प्रगति में बाधा डालती हैं। यही बात डॉलर के साथ भी लागू होती है।


 
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