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परमाणु नीति पर रक्षामंत्री के बयान के निहितार्थ

30/08/2019

प्रमोद भार्गव

म्मू-कश्मीर के अनुच्छेद-370 हटने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार का रुख शीशे की तरह साफ दिखाई दे रहा है। सरकार असमंजस वाली मध्यमार्गी नीति से मुक्त हो रही है। कोई रहमदिली दिखाने की बजाय सरकार अब इस मूड में आ गई है कि जहां भी लोहा गरम हो, हथौड़ा चला दिया जाए। धूर्त पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में ऐसी कड़ाई बरतना भी जरूरी है। लिहाजा रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने युधिष्ठिर की शैली में कहा है, 'हमारी परमाणु नीति का सिद्धांत कहता है कि हम पहले परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे, लेकिन भविष्य में क्या होगा यह परिस्थिति पर निर्भर करेगा।' इस तरह इशारों-इशारों में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को राजनाथ ने कड़ी चेतावनी दे दी है कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया तो भारत पहले परमाणु हमला करने के सिद्धांत पर स्थिर नहीं रहेगा।
भारत ने 1998 में दूसरे परमाणु परीक्षण के बाद इस सिद्धांत को अपनाया था। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। भारत ने पहला परमाणु परीक्षण इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए पोखरण में किया था। अगस्त-1999 में भारत सरकार ने इस सिद्धांत का एक प्रस्ताव जारी किया था। उसमें कहा था कि परमाणु हथियार केवल निरोध के लिए है और भारत केवल प्रतिशोध की नीति अपनाएगा। अर्थात भारत कभी स्वयं आगे बढ़कर पहले परमाणु हमला नहीं करेगा। परंतु, यदि किसी देश ने उस पर परमाणु आक्रमण किया तो वह प्रतिकार की भावना से परमाणु हमला करके प्रतिक्रिया देगा। दरअसल, बौखलाये इमरान खान यह कह चुके हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो सकता है। पाकिस्तान के पूर्व मंत्री और सेना प्रमुख भी परमाणु हमले की धमकियां दे चुके हैं। इसलिए भारत को अपना रुख स्पष्ट करना जरूरी था।
अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआईए के पूर्व वरिष्ठ खुफिया अधिकारी केविन हलबर्ट की मानें तो पाकिस्तान दुनिया के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक देशों में एक है। पाकिस्तान की यह खूंखार और डरावनी सूरत इसलिए बन गई है, क्योंकि तीन तरह के जोखिम इस देश में खतरनाक ढंग से बढ़ रहे हैं। एक आतंकवाद, दूसरे ढह रही अर्थव्यवस्था और तीसरे परमाणु हथियारों का जरूरत से ज्यादा भंडारण। आर्थिक संकट के ऐसी ही बद्तर हालात से उत्तर कोरिया जूझ रहा है। मानव स्वभाव में प्रतिशोध और ईर्ष्या दो ऐसे तत्व हैं, जो व्यक्ति को विवेक और संयम का साथ छोड़ देने को मजबूर कर देते हैं। इस स्वभाव को क्रूरतम परिणति में बदलते हम अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर किए परमाणु हमलों के रूप में देख चुके हैं। अमेरिका ने हमले का जघन्य अपराध उस नाजुक परिस्थिति में किया था, जब जापान इस हमले के पहले ही लगभग पराजय स्वीकार कर चुका था। पाकिस्तान इस समय इसी क्रूरतम मानसिकता से गुजर रहा है।
पाकिस्तान दुनिया के लिए खतरनाक देश हो अथवा न हो, लेकिन भारत के लिए वह खतरनाक है। इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। दशकों से वह भारत पर हमला करने के लिए आतंकियों के इस्तेमाल को सही ठहराता रहा है। पाकिस्तान भारत के खिलाफ छद्म युद्ध के लिए कट्टरपंथी मुस्लिम अतिवादियों को खुला समर्थन दे रहा है। मुंबई और संसद पर हमले के दिमागी कौशल रखने वाले योजनाकार दाऊद और हाफिज सईद को उसने शरण दे रखी है। पुलवामा हमले का अपराधी अजहर मसूद वहां कुछ समय पहले तक खुला घूमता था। भारत के खिलाफ आतंकी रणनीतियों को प्रोत्साहित व संरक्षण देने का काम पाकिस्तान की गुप्तचर संस्थाएं और सेना कर रही हैं। हालांकि पाकिस्तान द्वारा आतंकियों को संरक्षण देने के उपाय अब उसके लिए भी संकट बन रहे हैं। आतंकी संगठनों का संघर्ष शिया बनाम सुन्नी मुस्लिम अतिवादियों में तब्दील होने लगा है। इससे पाकिस्तान में अंतर्कलह और अस्थिरता बढ़ी है। ब्लूचिस्तान और सिंघ प्रांत में इन आतंकियों पर नियंत्रण के लिए सैन्य अभियान चलाने पड़े हैं। पीओके, गिलगिट और बाल्टिस्तान में भी आक्रोश की आग सुलग रही है। बावजूद, पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी सेना और खुफिया तंत्र तालिबान, अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी गुटों को खतरनाक नहीं मानते। इन आतंकियों को अच्छा सैनिक माना जाता है, जो धर्म के लिए अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। पाकिस्तान में आतंकी इतने वर्चस्वशाली हो गए हैं कि लश्कर-ए-झांगवी, पाकिस्तानी तालिबान, अफगान तालिबान और कुछ अन्य आतंकवादी गुट पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार की भी चुनौती बन गए हैं। ये चुनी हुई सरकार को गिराकर देश की सत्ता पर सेना के साथ अपना नियंत्रण चाहते हैं। अगर ऐसा हो जाता है या परमाणु हथियार आतंकियों के हाथ लग जाते हैं, तो तय है, पाकिस्तान को दुनिया के लिए खतरनाक देश बन जाने में देर नहीं लगेगी। इस नाजुक परिस्थिति में सबसे ज्यादा जोखिम भारत को उठाना होगा, क्योंकि भारत उनके लिए दुश्मन देशों में पहले नबंर पर है।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के शहर हिरोशिमा पर 6 अगस्त और नागासाकी पर 9 अगस्त 1945 को परमाणु बम गिराए थे। इन बमों से हुए विस्फोट और विस्फोट से फूटने वाली रेडियोधर्मी विकिरण के कारण लाखों लोग तो मरे ही, हजारों लोग अनेक वर्षों तक लाइलाज बीमारियों की गिरफ्त में रहे। विकिरण प्रभावित क्षेत्र में दशकों तक अपंग बच्चों के पैदा होने का सिलसिला जारी रहा। अपवादस्वरूप आज भी उस इलाके में लंगड़े-लूल़े बच्चे पैदा होते हैं। अमेरिका ने पहला परीक्षण 1945 में किया था। तब आणविक हथियार निर्माण की पहली अवस्था में थे, किंतु तब से लेकर अब घातक और लंबी दूरी तक मार करने वाले परमाणु हथियारों के निर्माण की दिशा में बहुत प्रगति हो चुकी है। लिहाजा अब इन हथियारों का इस्तेमाल होता है तो बर्बादी की विभीषिका हिरोशिमा और नागासाकी से कहीं ज्यादा भयावह होगी। इसलिए कहा जा रहा है कि आज दुनिया के पास इतनी बड़ी मात्रा में परमाणु हथियार हैं कि समूची धरती को एक बार नहीं, अनेक बार नष्ट-भ्रष्ट किया जा सकता है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के पास 6185, रूस 6500, यूके 200, फ्रांस 300, चीन 290, पाकिस्तान, 150-160, भारत 130-140 और इजराइल के पास 80-90 परमाणु हथियार हैं। परमाणु हथियार नियंत्रण कार्यक्रम के निदेशक शैनन काइल का कहना है, 'दुनिया कम हथियार रखना चाहती है, लेकिन उनका आधुनिकीकरण करके आकार लघु करना चाहती है। जिससे परमाणु हथियार रखने में सुविधा हो।' दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों का अनुमान है कि पाकिस्तान के पास भारत से ज्यादा परमाणु हथियार हैं। इनमें भी अधिकांश ऐसे खतारनाक बम हैं, जो अत्याधिक रेडियोधर्मी पदार्थों से भरे हैं। पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर नजर रखने वाले लेखकों के दल की 2018 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के पास इस समय 140 से 150 परमाणु हथियार हैं। यदि परमाणु अस्त्र-शस्त्र निर्माण करने की उसकी यही गति जारी रही तो 2025 तक इनकी संख्या बढ़कर 220 से 250 हो जाएगी। यदि यह संभव हो जाता है तो पाकिस्तान दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा परमाणु हथियार संपन्न देश हो जाएगा। 
इसीलिए कहा जा रहा है कि यदि भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध का सिलसिला शुरू होता है तो इसके पहले ही प्रयोग में 12 करोड़ लोग तत्काल प्रभावित होंगे। न्यूयार्क टाइम्स ने खबर दी है कि ऐसे हालत में जिस देश पर परमाणु बम गिरेगा, वहां ड़ेढ़ से दो करोड़ लोग तत्काल मौत की गिरफ्त में आ जाएंगे। साथ ही इसके विकिरण के प्रभाव में आए लोग 20 साल तक नारकीय दुष्प्रभावों को झेलते रहेंगे। यदि यह युद्ध शुरू हो जाता है और परमाणु अस्त्रों से हमले शुरू हो जाते हैं तो इन्हें आसमान में ही नष्ट करने की तकनीक फिलहाल कारगर नहीं है। पाकिस्तान के पास फिलहाल टेक्टिकल परमाणु अस्त्र हैं। जिसकी मारक क्षमता कम है। इन्हें केवल जमीन से ही दागा जा सकता है। इसे दागने के लिए पाक के पास शाहीन मिसाइल है, जिसकी मारक क्षमता 1800 से 1900 किमी है। इसकी तुलना में भारत के पास अग्नि जैसी ताकतवर मिसाइलों की पूरी एक श्रृंखला है। इनकी मारक क्षमता 5000 से 8000 किमी तक है। यही नहीं भारत के पास परमाणु बम छोड़ने के लिए ऐसी त्रिस्तरीय व्यवस्था है कि हम जमीन, पानी और हवा से भी मिसाइलें दागने में सक्षम हैं। भारत की कुछ मिसाइलों को तो रेल की पटरियों से भी दागा जा सकता है। साथ ही हमारे पास उपग्रह से निगरानी प्रणाली भी है। भारत का संकट अब तक केवल इतना था कि उसके हाथ, 'पहले परमाणु शस्त्र' का उपयोग नहीं करने की नीति से बंधे हैं। जिससे मुक्त होने का संकेत देश के रक्षामंत्री ने दे दिया है। भारत की पीठ में छुरा भोंकने वाले देश पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में इस नीति से बंधे रहना हवन करते हाथ जलाने की तरह है। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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