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तीन तलाक कानून बनना जरूरी

06/07/2019

तीन तलाक कानून बनना जरूरी


एक साथ तीन तलाक पर उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले को मूर्त रूप देने वाले विधेयक के कानून में परिणत होने की संभावना पहले से ज्यादा प्रबल है। अगर ऐसा हुआ, तो यह कानून महिलाओं को न्याय दिलाने वाला सिद्ध होगा।

राष्ट्रपति के अभिभाषण में तीन तलाक और हलाला की स्पष्ट चर्चा का मतलब ही था कि सरकार इसके खिलाफ फिर से विधेयक लाने की तैयारी कर चुकी है। भाजपा ने लोकसभा चुनाव के अपने संकल्प पत्र में भी इसका वायदा किया था। इसलिए विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 17वीं लोकसभा में जब अपने पहले विधेयक के रूप में ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019’ पेश किया, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ।
लेकिन पूरा दृश्य लगभग दिसंबर 2018 वाला ही था। विपक्ष की ओर से इसके विरोध में वही सारे तर्क दिए गए, जो पहले दिए जा चुके थे। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित कई दलों ने इसका विरोध किया, तो फिर इसका भविष्य क्या होगा? क्या इसकी दशा फिर पूर्व की भांति होगी? ध्यान रखिए सरकार के पिछले कार्यकाल में यह लोकसभा में पारित हो गया लेकिन राज्यसभा में लंबित रह गया। इस कारण इसे अध्यादेश के रूप में कायम रखा गया। प्रश्न यह भी है कि क्या इसके विरोध में जो तर्क दिए जा रहे हैं वे वाकई स्वीकार्य हैं या केवल राजनीतिक नजरिए से विरोध के लिए विरोध किया जा रहा है? एआईएमएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का विरोध पहले दिन से है और उनका तर्क भी जाना हुआ है। उनका विरोध मुख्यत: पांच पहलुओं पर है।
एक, तलाक एक सिविल मामला है इसे अपराध बनाना गलत है। दो, अगर उच्चतम न्यायालय ने फैसला दे दिया कि एक साथ तीन तलाक से तलाक हो नहीं सकता तो फिर कानून क्यों? तीन, अगर आप पति को जेल में डाल देंगे तो फिर महिला को गुजारा-भत्ता कौन देगा? चार, यह मौलिक अधिकारों की धारा 14 और 15 का उल्लंघन है। पांच, यह हिन्दू और मुसलमानों में भेद करता है। कांग्रेस की ओर से थोड़ा भिन्न रूप में यही तर्क दिये गये हैं। इस बार कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने लोकसभा में पार्टी का मत रखा। उन्होंने कहा कि मैं तीन तलाक को खत्म करने का विरोध नहीं करता, लेकिन इस विधेयक का विरोध कर रहा हूं। तीन तलाक को आपराधिक बनाने का विरोध करता हूं। मुस्लिम समुदाय ही क्यों, किसी भी समुदाय की महिला को अगर पति छोड़ता है, तो उसे आपराधिक क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए। यह समुदाय के आधार पर भेदभाव है, जो संविधान के खिलाफ है।
कांग्रेस ने पिछली बार लोकसभा में बहिर्गमन किया था। अब जरा इन सारे विरोधों को सच की कसौटी पर कसिए। तलाक अवश्य सिविल मामला है। इस्लाम में तीन तलाक के दो प्रकार मान्य हैं तलाक-ए-हसन और तलाक-एअहसन। एक साथ तीन तलाक यानी तलाकए-विद्दत मान्य नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने 23 अगस्त 2017 को 395 पृष्ठों के अपने ऐतिहासिक फैसले में इसके मजहबी, संवैधानिक, सामाजिक सारे पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए इसे गैर मजहबी एवं असंवैधानिक करार दिया है। असदुद्दीन ओवैसी जिस आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसने तथा जमियत-ए-उलेमा-एहिन्द ने तलाक-ए-विद्दत के पक्ष में जितने तर्क दिए न्यायालय ने सबको खारिज कर दिया। इसने कई तर्क दिए थे।
जैसे यह पर्सनल लॉ का हिस्सा है। इसलिए न्यायालय इसमें दखल नहीं दे सकता। तलाक के बाद उस पत्नी के साथ रहना पाप है और सेक्यूलर न्यायालय इस पाप के लिए मजबूर नहीं कर सकता। इसका सबसे कड़ा तर्क यह था कि पर्सनल लॉ को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। हालांकि उसने यह स्वीकार किया कि तीन तलाक अवांछित है, लेकिन साथ में इसे वैध भी माना। इनने कहा था कि यह 1400 साल से चल रही प्रथा है। यह आस्था का विषय है, संवैधानिक नैतिकता और बराबरी का सिद्धांत इस पर लागू नहीं होगा। पर्सनल लॉ बोर्ड ने तो यह तर्क भी दिया कि इसे इसलिए जारी रखा जाए ताकि कोई पति पत्नी से गुस्सा होकर उसकी हत्या न कर दे। इसने महिलाओं की कम समझ होने का हास्यास्पद तर्क भी दिया। न्यायालय ने साफ कर दिया कि इस्लाम में इसे कहीं मान्यता नहीं है। कहने का तात्पर्य यह कि अगर यह इस्लाम में मान्य नहीं है, गैर कानूनी भी है तो फिर यह सिविल मामला नहीं हो सकता। कोई व्यक्ति अपनी झनक, अहम या वासना में एक महिला को क्षण भर में तलाक-तलाक-तलाक कहकर उसे पत्नी के सारे अधिकारों से वंचित करता है, तो यह स्पष्ट तौर पर आपराधिक कृत्य है। एक आपराधिक कृत्य के खिलाफ अपराध कानून ही बनाया जा सकता है।
हां, अगर इस्लाम में मान्य तरीके से तीन तलाक होता है, तो वह सिविल है और उसमें यह कानून लागू नहीं हो सकता। ध्यान रखिए, उच्चतम न्यायालय ने भी तीन तलाक का निषेध नहीं किया केवल एक बार में तीन तलाक चाहे वह मौखिक हो, किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से या फिर पत्र द्वारा हो, उसे अमान्य किया है। वर्तमान विधेयक भी इसी पर लक्षित है, सामान्य तलाक पर नहीं। सभी समुदायों को इसमें शामिल करने का तर्क ही हास्यास्पद है। तीन तलाक या तलाक-ए-विद्दत केवल इस्लाम में है, तो इसमें दूसरे समुदाय को कैसे शामिल किया जा सकता है। हिन्दुओं में तो 1955 के पहले तलाक था ही नहीं। हिन्दुओं तलाक लेने के लिए पूरी कानूनी प्रक्रिया है जिसका पालन करना होता है। बिना पालन किए आप पत्नी को उसके अधिकारों से बेदखल करते हैं तो सजा के भागीदार हैं। उच्चतम न्यायालय ने एक साथ तीन तलाक को अमान्य करार दिया लेकिन उसके बाद भी ऐसा हो रहा है तो क्या किया जाए? परित्यक्त पत्नियां थाने जाती हैं, लेकिन पुलिस के पास ऐसा कानून नहीं जिसके तहत वह मुकदमा दर्ज कर पति के खिलाफ कार्रवाई करे। जैसा लोकसभा में बताया गया 2017 से 543 मामले तीन तलाक के आए। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद 239 मामले सामने आए। अध्यादेश के बाद भी 31 मामले सामने आए। सरकार ने सितंबर 2018 और फरवरी 2019 में 2 बार तीन तलाक अध्यादेश जारी किया था। जिस समय उच्चतम न्यायालय का फैसला आया उस समय सरकार का मत भी यही था कि घरेलू हिंसा कानून से काम चल जाएगा।
किंतु अनुभव आया कि यह पर्याप्त नहीं है। इसलिए कानून अपरिहार्य है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि विपक्ष के विरोध एवं सुझावों के अनुरूप मूल विधेयक में कुछ बदलाव किए गए। वर्तमान विधेयक के अनुसार प्राथमिकी तभी स्वीकार्य की जाएगी, जब पत्नी या उसके नजदीकी खून वाले रिश्तेदार दर्ज कराएंगे। विपक्ष और कई संगठनों की चिंता थी कि इस मामले में प्राथमिकी का कोई दुरुपयोग कर सकता है। दूसरे, पति और पत्नी के बीच पहल होती है तो मजिस्ट्रेट समझौता करा सकते हैं। पहले के विधयेक में इसका प्रावधान नहीं था। विपक्ष सुलह की व्यवस्था चाहता था। तीन, तत्काल तीन तलाक गैरजमानती अपराध बना रहेगा, लेकिन अब इसमें ऐसी व्यवस्था कर दी गई है, जिसके बाद मजिस्ट्रेट इसमें जमानत दे सकता है, लेकिन इससे पहले पत्नी की सुनवाई करनी होगी। यानी मजिस्ट्रेट पीड़िता पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर जमानत दे सकते हैं। मूल विधेयक में तीन साल की सजा के प्रावधान के बाद जमानत की गुंजाइश नहीं दी गई थी।

विधेयक का भविष्य
लोकसभा में कोई समस्या है नहीं। राज्यसभा में इस समय 236 सदस्य हैं। बहुमत के लिए 119 सदस्यों का समर्थन चाहिए। इस समय राजग की संख्या इस प्रकार है- भाजपा 75, अन्नाद्रमुक 13, जदयू 6, अकाली दल-शिवसेना-नामित 3-3, आरपीआई-एजीपी 1-1। इसमें दो निर्दलीय अमर सिंह और सुभाष चंद्रा को मिलाकर 107 हो जाती है। 5 सदस्यों वाले बीजद ने सरकार के साथ रचनात्मक सहयोग की भूमिका की घोषणा की है। दो सदस्यों वाले वाईएसआर कांग्रेस का समर्थन भी मिल जाएगा। 6 सदस्यों वाले टीआरएस का रुख साफ नहीं है, लेकिन सरकार चन्द्रशेखर राव से बात कर रही है। 1-1 सदस्यों वाले एनपीएफ और बीपीएफ को साथ लाने में समस्या नहीं है। इस विधेयक के पारित होने के बीच ही होने वाले राज्य सभा चुनावों में भाजपा को 3 सीटें मिलना तय है। जदयू सहित विरोध करने वाले कुछ दूसरे दलों को बहिर्गमन कर सरकार विधेयक को पारित करा सकती है।

विधेयक के अनुसार मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा मां के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपी को उसका भी गुजारा देना होगा। यह तर्क विचित्र है कि अगर पति को जेल हो गया तो गुजारा भत्ता कौन देगा? यदि तीन साल की सजा हो भी गई तो उसे भारतीय दंड संहिता के अनुरूप जमानत मिल जाएगी।


 
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