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नरसंहार की बुनियाद में लापरवाही

30/07/2019

नरसंहार की बुनियाद में लापरवाही

संजय सिंह

सोनभद्र कांड भ्रष्ट नौकरशाही और लापरवाह पुलिस तंत्र की हरकतों का दुखद परिणाम है। वर्षों से जिम्मेदार अफसर आंख मूंदकर खुद गुनाह की चिंगारी को हवा देते रहे। जमीन के इस खेल में ऊपर के प्रशासनिक अफसरों से लेकर स्थानीय पुलिस जानबूझकर अंजान बनी रही।

सोनभद्र नरसंहार कांड की बुनियाद में जमीन का विवाद था। जो दस लोगों की हत्या की वजह बना। कई जख्मी भी हुए। इस पूरे कांड को लेकर सियासत भी जमकर हुई। चुनाव दर चुनाव रसातल पर जा रही कांग्रेस भी प्रियंका गांधी वाड्रा को आगे करके इस पर राजनीति करती नजर आयी। समाजवादी पार्टी ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश की। बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने चिरपरिचत अंदाज में बयानबाजी कर सरकार को जिम्मेदार ठहराया, तो अन्य छिटपुट दल और संगठन भी खबरों में बने रहने के लिए नाटक करने से पीछे नहीं रहे। लेकिन किसी ने उन आदिवासियों का दर्द समझने और इस नरसंहार की जड़ में जाने की कोशिश नहीं की। जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। सभी आरोपितों की गिरμतारी और प्रदेश सरकार द्वारा पीड़ित आदिवासियों को मुआवजा व अन्य घोषणाएं करने के बाद विपक्ष अब दूसरे मुद्दे तलाशने में जुट गया है।
हालांकि पीड़ित अभी भी 17 जुलाई को हुए इस कांड को याद करते हुए सिहर जाते हैं। 17 जुलाई को हुई इस घटना के चश्मदीद बताते हैं कि उस दिन करीब 30 ट्रैक्टर में भरकर 150 लोग अचानक आ धमके। ये लोग असलहों से लैस थे। ग्रामीणों ने जब इनका विरोध किया तो उन्होंने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। उभ्भा और सपही गांव में समिति के नाम लगभग बारह सौ बीघा जमीन है। इसमें से उभ्भा में छह सौ बीघा जमीन है, जिसमें से लगभग पांच सौ बीघा जमीन खेती लायक है। ग्रामीणों के मुताबिक वह तीन-चार पीढ़ियों से इस जमीन पर खेती कर रहे हैं। नीरज राय नाम का एक शख्स प्रति बीघा एक हजार से तीन हजार रुपये तक वसूलता था। पिछले साल रजिस्ट्री के बाद से गोंड बिरादरी के लोगों ने रुपये देना बंद कर दिया था। प्रधान पक्ष ने पिछले साल भी जमीन पर कब्ज करने की कोशिश की थी।

घटना के बाद भी सहमे हुए हैं ग्रामीण
 गांव के अमर सिंह कहते हैं कि जमीन को लेकर पहले से विवाद और इस पर मुकदमा चल रहा है। उम्मीद नहीं थी कि इतनी संख्या में आकर प्रधान पक्ष हमला कर देगा। बेहद निर्दयतापूर्वक लोगों को मारा गया। कई लोगों की तो फायरिंग में मौके पर ही मौत हो गई। कुछ लोगों को तुरन्त अस्पताल में पहुंचाया गया। इतने बड़े कांड के बाद संगीनों के साये में रहने वाले ग्रामीण अभी भी खुलकर किसी का नाम लेने में डर रहे हैं अमर सिंह के चेहरे पर भी खौफ देखने को मिला।
 रामरती का देवर और भतीजा इस गोलीकांड में मारे गये। वह कहती हैं कि अचानक दो-ढाई सौ लोग ट्रैक्टर और पैदल आये और खेत जोतने लगे। जब गांव वालों ने उन्हे रोका तो उन्होंने मारपीट शुरू कर दी। ग्रामीणों की भीड़ जुटने पर उन्होंने गोलियां चलानी शुरू कर दी।
 रामलाल के मुताबिक चार-पांच पीढ़ियों से वह और कई लोगों के परिवार इस जमीन पर खेती करते आ रहे हैं। इसका कोई कागज नहीं होने के बावजूद कभी विवाद नहीं हुआ। वह लोग समिति के सदस्य के तौर पर रुपये जमा भी करते थे। करीब दो वर्ष पहले प्रधान पक्ष के लोगों ने उनसे खेती नहीं करने को कहा। ग्रामीणों ने उनसे रोजी रोटी का यही जरिया बताते हुए उनकी बात मानने से इनकार कर दिया। अब अचानक प्रधान ने दल-बल के साथ आकर इतना बड़ा कांड कर दिया।

अभिलेखों में बंजर है जमीन
गोंड आदिवासियों की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले अधिवक्ता नित्यानंद द्विवेदी इस नरसंहार को लेकर कहते हैं कि देश में जब जमींदारी प्रथा का अंत हो रहा था। उस दौरान बधार के राजा आनंद ब्रह्म साहा की 600 बीघा जमीन को राजस्व अभिलेखों में बंजर घोषित कर दिया गया और इसे ग्राम सभा की भूमि के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद इस जमीन पर गोंड आदिवासियों गुजर बसर के लिए खेती करने लगे। इसके बाद 1952 में आईएएस अफसर प्रभात कुमार मिश्रा ने मिजार्पुर में अपनी तैनाती के दौरान एक आदर्श सहकारी समिति लिमिटेड आॅफ उभ्भा नाम की एक समिति बनाई। और बिहार के मुजμफरपुर निवासी अपने ससुर महेश्वरी प्रसाद सिन्हा को इसका अध्यक्ष तथा अपनी पत्नी आशा मिश्रा को पदाधिकारी बनाया। यहां के आदिवासियों को भी इसी समिति का सदस्य बनाकर उनसे जमीन पर खेती जारी रखने की बात कही। तब से ये चला आ रहा था।
इस दौरान बीच-बीच में जमीन की प्रभात मिश्रा और उनके करीबियों के नाम रजिस्ट्री भी हुई। आदिवासी इससे बेखबर खेती करते रहे। 2017 में इसी में से लगभग सौ बीघा जमीन ग्राम प्रधान को बेच दी गई और यही आखिरकार इतने बड़े कांड की वजह बनी। नित्यानंद द्विवेदी कहते हैं कि जमीन को ग्राम सभा की जमीन के रूप में दर्ज करने से लेकर उसे समिति को सौंपना और फिर खरीद व बिक्री सभी कुछ अवैध तरीके से हुआ। स्थानीय अधिकारियों को सारी जानकारी थी, लेकिन वह खामोश रहे। उधर आदिवासियों को इस पूरे खेल की भनक तक नहीं लगी। जब प्रधान पक्ष ने ताकत के बल पर अचानक सब कुछ हथियाना चाहा तो यह नरसंहार के रूप में सामने आया।

अधिकारियों ने नहीं लिया संज्ञान
इस बीच सामने आया है कि भाजपा के सहयोगी अपना दल के विधायक हरिराम चेरो पहले इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिख चुके थे। विधायक के मुताबिक उन्होंने 14 जनवरी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा था। इसमें उम्भा गांव के आदिवासियों की पैतृक जमीन पर कथित रूप से भूमाफिया द्वारा कब्जा करने और उन्हें फर्जी मामले में फंसाकर परेशान करने की जानकारी दी गई थी। विधायक के मुताबिक उन्होंने 600 बीघा विवादित जमीन और फर्जी समिति बनाकर भूमि हड़पने के बारे में अवगत कराते हुए उच्चस्तरीय एजेंसी से जांच कराने की मांग की थी।

दस्तावेज हैं गायब
खास बात है कि 17 दिसम्बर 1955 को लगभग 463 बीघा जमीन समिति के नाम स्थानांतरित हो गई, जिसके दस्तावेज गायब हैं। महेश्वरी प्रसाद सिन्हा की मौत होने तक जमीन उनके नाम पंजीकृत थी। 6 सितम्बर 1989 को 200 बीघा जमीन सिन्हा की बेटी आशा मिश्रा और पोती विनीता के नाम कर दी गई, जिन्होंने 144 बीघा जमीन दो करोड़ रुपये में ग्राम प्रधान यज्ञदत्त गुर्जर को बेच दी। सोनभद्र के जिलाधिकारी अंकित अग्रवाल के मुताबिक प्रशासन के पास 1995 की फाइल को छोड़कर सभी संबंधित दस्तावेज हैं। फाइल सोनभद्र के राजस्व विभाग में जमा नहीं कराई गई थी, जो 1989 में मिर्जापुर से अलग किया गया था।
कुछ मामलों में हालांकि रिकॉर्ड नष्ट नहीं भी किए जाते हैं, लेकिन उभ्भा गांव की इस विवादित भूमि से संबंधित 1955 के रिकॉर्ड नष्ट किए जा चुके हैं। अपर मुख्य सचिव (राजस्व) रेणुका कुमार ने जब अधिकारियों के साथ मूल दस्तावेजों की जांच शुरू कीं तो कई दस्तावेज नहीं मिले। उन्होंने कहा है कि जिसके पटल से दस्तावेज गायब हुए हैं उनके ऊपर कार्रवाई की जायेगी। अपर मुख्य सचिव राजस्व रेणुका कुमार, प्रमुख सचिव श्रम सुरेश चंद्र व कमिश्नर एनके सिंह की टीम ने पीड़ित पक्ष के अधिवक्ताओं से भी बात की है। उनसे मुकदमे के दौरान उनके द्वारा लगाए गए विभिन्न आपत्तियों की प्रति मांगी गई है।

जद में कई खाकी वर्दीधारी
मामले में पीड़ित ग्रामीणों पर हुई उत्पीड़नात्मक कार्रवाई की जांच एडीजी जोन वाराणसी कर रहे हैं। जांच से संबंधित पूछताछ के लिए अक्टूबर 2017 से लेकर अब तक तैनात रहे पुलिस अधिकारियों व कर्मियों को चिह्नित किया गया है। इनमें सेवानिवृत्त क्षेत्राधिकारी विवेकानंद तिवारी, निलंबित क्षेत्राधिकारी अभिषेक सिंह और इस समय दुद्धी में तैनात क्षेत्राधिकारी राहुल मिश्रा के अलावा चार इंस्पेक्टर भी शामिल हैं। इस अवधि में यहां तैनात रहे इंस्पेक्टर आशीष सिंह, मूलचंद्र चौरसिया, शिव कुमार मिश्रा व अरविद कुमार मिश्रा, उप निरीक्षक पद्मकांत तिवारी, लल्लन यादव व बीट के सिपाही के भी बयान लिये जायेंगे। दरअसल पुलिस पर प्रधान के दबाव में आदिवासियों पर कार्रवाई के आरोप हैं।

नरसंहार की जड़ में कांग्रेस
इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने कहा कि नरसंहार कांड का मुख्य आरोपित ग्राम प्रधान यज्ञ दत्त समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता है। वह समाजवादी पार्टी में सक्रिय भूमिका में हैं। इसके अलावा उसका भाई बसपा नेता है। यह घटना राजनीतिक साजिश की देन है। दबंगई के बल पर सपा कार्यकर्ता ने गोलीकांड किया। उस व्यक्ति ने इस मामले के विवादित भूमि के बाहर भी गौड़ जाति और अनुसूचित जाति से जुड़े हुए लोगों के भूमि पर भी कब्जा करने का प्रयास किया है। उम्भा की घटना के अलावा भी कई मामले सामने आए हैं। सभी की जांच कराई जा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पूरे विवाद के लिए कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। कांग्रेस के शासन काल के दौरान वनवासियों की जमीन को एक सोसायटी के नाम कर दिया गया। उन्होंने कहा कि इस पूरे प्रकरण में 1955, 1989 और 2017 में हुई हरेक घटना की जांच जरूरी है। कांग्रेस इस घटना पर घड़ियाली आंसू बहा रही है। उन्हें पीड़ितों से माफी मांगनी चाहिए क्योंकि यह घटना उन्हीं की देन है।

लापरवाही पर निलंबन
मामले में लापरवाही पर सोनभद्र के घोरावल के उपजिलाधिकारी, क्षेत्राधिकारी घोरावल, इंस्पेक्टर घोरावल समेत पांच अधिकारियों कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है। समिति की जांच रिपोर्ट के मुताबिक सीआरपीसी की धारा-145 के तहत कार्रवाई करने के लिए उपजिलाधिकारी घोरावल रिपोर्ट काफी दिनों तक दबाए रहे। इसी तरह क्षेत्राधिकारी घोरावल के अलावा इंस्पेक्टर घोरावल ने भी कर्तव्यों का पालन नहीं किया। घोरावल थाने के बीट सब-इंस्पेक्टर और सिपाही ने भी उचित कार्रवाई नहीं की। इसलिए वहां के उपजिलाधिकारी, क्षेत्राधिकारी, इंस्पेक्टर, एसआई व बीट इंचार्ज को निलंबित कर दिया गया है।


अलर्ट हुआ खुफिया तंत्र

इस बीच इस नरसंहार के बाद यूपी में नक्सलियों की सक्रियता बढ़ने का भी अंदेशा है। बस्तर से नक्सलियों की बौद्धिक टीम के घोरावल और आस-पास के क्षेत्रों में सक्रिय होने की सूचना पर आईबी अलर्ट हो गई है। उत्तर प्रदेश में यूं तो नक्सली गतिविधियां लम्बे अर्से से शान्त हैं, लेकिन जिस तरह से सोनभद्र में आदिवासी ग्रामीणों को मौत के घाट उतारा गया, उसको देखते हुए नक्सली कोई बड़ा कदम उठा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक उनके लोगों ने स्थानीय स्तर पर लोगों से सम्पर्क किया है। इसलिए खुफिया एजेंसी प्रभावित इलाकों पर नजर रखे हुए है। वहीं उत्तर प्रदेश एटीएस भी सोनभद्र कांड की संवेदनशीलता को देखते हुए सतर्कता बरत रही है।

अब तक 34 लोग गिरतार
जमीन के संघर्ष में हुई दस लोगों की हत्या मामले में अब तक कुल 34 लोगों की गिरμतारी हो चुकी है। जिसमें से 16 लोग नामजद अभियुक्त हैं। इनमें मुख्य आरोपित ग्राम प्रधान यज्ञदत्त भी शामिल है। सभी आरोपितों पर रासुका की कार्रवाई की जा रही है। 50 अज्ञात के खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज की जा चुकी है। वारदात में शामिल असलहे बरामद करने के साथ 24 ट्रैक्टर भी कब्जे में लिये गये हैं। इसके साथ ही राज्य मानवाधिकार आयोग ने मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव (गृह) से रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने कहा है कि यह भी तय करें कि आगे से इस तरह की घटनाएं रोकने के लिए क्या रास्ते हो सकते हैं। इस मामले में गिरμतार किए गए भदोही स्टेशन अधीक्षक कोमल सिंह को निलंबित कर दिया गया है। प्रदेश सरकार ने भले ही मामले को लेकर त्वरित कार्रवाई की हो, लेकिन सोनभद्र कांड भष्ट नौकरशाही और लापरवाह पुलिस तंत्र की हरकतों का परिणाम है।
वर्षों से जिम्मेदार अफसर आंख मूंद कर खुद गुनाह की चिंगारी को हवा देते रहे। जमीन के इस खेल में ऊपर के प्रशासनिक अफसरों से लेकर पुलिस जानबूझकर अंजान बनी रही। कहने को जनसमस्याओं के निस्तारण के लिए थाना, तहसील स्तर से लेकर शासन तक पूरी व्यवस्था है, लेकिन कहीं भी इसकी गंभीरता को भांपा नहीं जा सका। अगर ऐसा हो पाता तो इतने घरों में एक साथ अर्थियां नहीं उठती, मातम नहीं होता। पीड़ितों को इस सदमे से उबरने में काफी वक्त लगेगा।



 
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