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सादगी, सौम्यता और ईमानदारी के प्रतीक थे शास्त्री जी

01/10/2019

(लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिन, 2अक्टूबर पर विशेष) 

प्रो. अरविंद नाथ तिवारी 
सादगी, सौम्यता और ईमानदारी के प्रतीक, देश के दूसरे प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1901 उत्तर प्रदेश के मुगलसराय (अब दीनदयाल उपाध्याय नगर) में हुआ था। पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शास्त्री जी ने गृह मंत्रालय जैसे कई महत्वपूर्ण विभागों को सम्भाला था। नेहरू जी के निधन के बाद 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक लाल बहादुर प्रधानमंत्री के पद पर रहे। नाटे कद के कारण शास्त्री जी को उनके गांव के लोग नन्हें कहकर भी बुलाते थे। बताया जाता है कि जब वह रेलमंत्री थे, तो एक रेल दुर्घटना की जवाबदेही लेते हुए रेलमंत्री पद से इस्तीफा देते हुए संसद में बहस के दौरान यह कहा था कि 'मेरे छोटे कद और मृदुभाषी होने के कारण लोग यह समझ लेते हैं कि मैं दृढ़ नहीं हूं। शरीर से भले ही मैं मजबूत नहीं हूं, लेकिन अंदरूनी तौर पर मैं कमजोर नहीं हूं।' देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और शास्त्री जी का जन्मदिन एक ही दिन 2 अक्टूबर को पड़ता है। शास्त्री जी का जीवन गांधी जी के आदर्श वाक्य 'कर्म पूजा के समान है' से प्रभावित देखने को मिला। शास्त्री जी ने सभी को स्वावलंबन, आत्म सम्मान और बहादुरी से जीवन जीने की प्रेरणा दी। सन् 1964 में शास्त्री जी जब प्रधानमंत्री बने तो देश संकट में था। अमेरिका से अनाज मंगाया जा रहा था। सन् 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय देश सुखे की मार झेल रहा था। अमेरिका ने गेहूं देने से इनकार कर दिया। इस चैलेन्ज को स्वीकार करते हुए शास्त्री जी ने देशवासियों से अह्वान किया कि सप्ताह में एक बार सभी देशवासी उपवास रखें, तो देश अनाज की कमी से उबर जाएगा। देशवासियों ने शास्त्री जी के आह्वान पर सप्ताह में एक दिन उपवास रखना शुरू कर दिया। नतीजा हुआ कि अन्न की कमी से जूझ रहा देश बाहर निकल आया। शास्त्री जी के कई निर्णय देश के लिए महत्वपूर्ण साबित हुए। बस यातायात में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण शास्त्री जी की ही देन थी। सन् 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर यह सोचकर आक्रमण किया था कि सन् 1962  के चीनी आक्रमण से भारत कमजोर हो गया है और उसकी जीत हो जाएगी, परन्तु शास्त्री जी ने पंजाब के रास्ते लाहौर में सेंध लगाकर पाकिस्तान को युद्ध से हटने के लिए मजबूर कर दिया। शास्त्री जी ने देश को आगे तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए जवान और किसानों के लिए  'जय जवान -जय किसान' का नारा दिया था। साल 1965  भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध खत्म हुए अभी कुछ दिन ही बीते थे। नया साल शुरू हुआ था। राजधानी दिल्ली में ठंड चरम सीमा पर थी, लेकिन भारत-पाकिस्तान के युद्ध की गर्माहट देश में मौजूद थी। युद्ध की गर्माहट को ठंडक में बदलने के लिए सोवियत रूस के 'ताशकंद' में 10 जनवरी 1966 को भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच बातचीत करने का समय निर्धारित थी। लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान तय किये गये निर्धारित समय पर मिले। बातचीत काफी लंबी चली और दोनों देशों के बीच शांति समझौता भी हो गया। ऐसे में दोनों मुल्कों के शीर्ष नेताओं और प्रतिनिधिमंडल में शामिल अधिकारियों का खुश होना लाजिमी था। लेकिन उस दिन की काल रात्रि शास्त्री जी के लिए मौत बनकर आई थी। 10-11 जनवरी के दरम्यान रात में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध परिस्थितों में मौत हो चुकी थी। उस दिन ताशकंद में भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल रहे वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर इस घटना का जिक्र अपनी आत्मकथा 'बियॉन्ड द लाइंस' में  लिखते हैं कि 'आधी रात के बाद अचानक मेरे कमरे की घंटी बजी। दरवाजे पर एक महिला खड़ी थी। उसने कहा कि आपके प्रधानमंत्री की हालत गंभीर है। मैं भागते हुए उनके कमरे में पहुंचा, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कमरे में खड़े एक शख़्स ने इशारे से बताया कि शास्त्री जी की मौत हो चुकी है। ' उस ऐतिहासिक समझौते के कुछ घंटों बाद ही भारत के लिए सब कुछ बदल गया। विदेशी धरती पर संदिग्ध परिस्थितियों में भारतीय प्रधानमंत्री की मौत से सन्नाटा छा गया। लोग दुखी तो थे ही, लेकिन उससे कहीं ज्यादा हैरान थे। लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद तमाम सवाल खड़े हुए, उनकी मौत के पीछे साजिश की बात भी कही जाती है, क्योंकि, शास्त्री जी की मौत के दो अहम गवाह उनके निजी चिकित्सक आर एन चुग और घरेलू सहायक राम नाथ की सड़क दुर्घटनाओं में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई तो यह रहस्य और गहरा गया। लाल बहादुर शास्त्री की मौत के एक दशक बाद 1977 में सरकार ने उनकी मौत की जांच के लिए राज नारायण समिति का गठन किया। इस समिति ने तमाम पहलुओं पर अपनी जांच की, लेकिन आज तक उस समिति की रिपोर्ट का अता-पता नहीं है। बताया जाता है कि राज्यसभा के पास भी इस समिति की रिपोर्ट की कोई कॉपी नहीं है। सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलू ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा, 'संसद बहुत सावधानी से दस्तावेजों को सहेजने के लिए जानी जाती है। संसद में कहा गया हर शब्द रिकार्ड और सार्वजनिक दायरे में रखा जाता है। ऐसे में महत्वपूर्ण रिकार्ड कैसे गायब हो गया?' यह भारत के लोगों के लिए आज भी शास्त्री जी की मौत यक्ष प्रश्न है। 
(लेखक प्राध्यापक हैं।)


 
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