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जी 20 में सफल रही भारतीय रणनीति

11/07/2019

जी 20 में सफल रही भारतीय रणनीति

रहीस सिंह

ओसाका जी 20 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय पक्ष को न केवल प्रभावी ढंग से पेश किया बल्कि आई 5 फॉर्मूले के जरिए दुनिया को आपस में कनेक्ट होने और समृद्ध होने का पाठ भी पढ़ाया।

एक ऐसा मंच जहां एक साथ विश्व की वे ताकतें एकत्रित हों जो विश्व की दिशा बदलने की हैसियत रखती हों, तो सभी की निगाहें उस ओर स्वयं ही टिक जाती हैं। ऐसा हुआ भी जब ओसाका (जापान) में दुनिया की ताकतें एक छत के नीचे आयीं और बहुत सारे मुद्दों पर चर्चा की गयी। प्रधानमंत्री मोदी जी 20 मंच से इतर रूस-भारत-चीन (आरआईसी; रिक) और भारत-अमेरिका-जापान के साथ ही बैठक की और ब्रिक्स अध्यक्षों के साथ भी बैठक की और वैश्विक अर्थव्यवस्था की ग्रोथ में आयी स्थिरता पर चिंता प्रकट की। इन संगठनों के अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने दुनिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात कर सामूहिक हितों को आगे बढ़ाने पर चर्चा की।
तो क्या हम यह मान सकते हैं कि ओसाका में खेमेबंदी के बीच भी भारत अपनी रणनीति में सफल रहा? जी 20 की ओसाका समिट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो, जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल, इंडोनेशियाई के राष्ट्रपति जोको विडोडो और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ-साथ सऊदी क्रॉउन प्रिंस से भी मुलाकात की। ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री मोदी जब डोनाल्ड ट्रंप से मिले तो ट्रंप 180 डिग्री घूमे हुए नजर आए। उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने प्रधानमंत्री से मुलाकात से ठीक पहले भारत को अमेरिकी उत्पादों पर सीमा शुल्क घटाने की धमकी दी थी।
उन्होंने ट्वीट किया था कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर बहुत ज्यादा सीमा शुल्क लगता है जो अस्वीकार्य है। इसे हटाना होगा। ट्रंप के ट्वीट के बाद भारतीय खेमे में बेचैनी सी देखी गयी थी। लेकिन जब राष्ट्रपति ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी से मिले तो उन्होंने उनको दोस्त बताते हुए यह भी कहा कि भारत व अमेरिका अभी जितने करीब हैं उतने इतिहास में कभी नहीं रहे। इसके बाद दोनों नेताओं की लगभग सभी मुद्दों पर खुलकर बात हुई। विदेश सचिव विजय गोखले के अनुसार इस बातचीत में 5 जी का मुद्दा भी उठा जिसमें अमेरिका चाहता है कि भारत उसकी तरह चीन की कंपनी हुवेई पर प्रतिबंध लगाए और अमेरिकी कंपनियों की तकनीक का इस्तेमाल करे। भारत की तरफ से उन मुद्दों को उठाया गया जो भारत के हितों को प्रभावित करते हैं। इनमें ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध का मुद्दा सबसे ऊपर रहा। खाड़ी देशों में तनाव की स्थिति से भारत की ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा पर असर पड़ने की संभावना है क्योंकि वहां से न सिर्फ भारत बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है बल्कि 80 लाख भारतीय भी वहां रहते हैं।
यानी प्रधानमंत्री ने ट्रंप को यह संदेश देने की कोशिश की कि खाड़ी क्षेत्र में तनाव सम्बंधी मसला भारत के लिए बेहद संवेदनशील है। हालांकि इस द्विपक्षीय बातचीत में रूस से एस 400 मिसाइल रक्षा प्रणाली की खरीद के विषय में चर्चा नहीं की गयी जबकि दोनों देशों ने सैन्य सहयोग को बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की थी। ध्यान रहे कि एस-400 ट्रायम्फ एयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम लम्बी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली (लांग रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम) रक्षा प्रणाली है जिसे नाटो एसए-21 ग्रॉलर के नाम से रिपोर्ट करता है। यह सिस्टम हवा में सभी प्रकार के टारगेट्स, जिसमें एयरक्राμट, यूएवी (अननेम्ड एरियल वेहिकल) तथा बैलिस्टिक एवं क्रूज मिसाइलें भी शामिल हैं, को 400 किमी की रेंज और 30 किमी की ऊंचाई तक निशाना बना सकता है। यह एक इंटीग्रेटेड डिफेंस सिस्टम है जिसमें मल्टीफंक्शन राडार, आॅटोनॉमस डिटेक्शन और टारगेटिंग सिस्टम, एंटी-एयरक्राμट मिसाइल सिस्टम, लांचर्स और कमाण्ड व कंट्रोल सेंटर मौजूद है।
इसमें मल्टीलेयर क्षमता का निर्माण करने के लिए तीन प्रकार की मिसाइलों को दागने की क्षमता है। एस 400 डिफेंस सिस्टम एक साथ 36 टारगेट्स को निशाने पर ले सकता है और 1000 किमी की दूरी पर ही आब्जेक्ट को पकड़ सकता है। इस सिस्टम को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि लक्ष्य की पहचान कर तत्काल समाप्त कर सके। चीन इस रक्षा प्रणाली को वर्ष 2015 में ही प्राप्त कर चुका है। लेकिन अमेरिका भारत से यह अपेक्षा करता है कि भारत उसके काउंटरिंग अमेरिकाज एडवरसरीज थ्रू सैंक्शंस ऐक्ट (काटसा) का आदर करे। इस एक्ट का सेक्शन 231 ट्रांजैक्शन- बाइ-ट्रांजैक्शन बेसिस पर विचार करता है जिसके अनुसार रूस के साथ किसी भी देश के स्ट्रैटेजिक डिफेंस सम्बंधी लेन-देन पर रोक लग जाती है। वैसे अमेरिकी संसद ने यह कानून रूस, ईरान और उत्तर कोरिया को ध्यान में रखकर बनाया है लेकिन भारत भी इसकी परिधि में आ गया।
बताते चलें कि यदि भारत ‘काटसा एक्ट’ को मानेगा तो रूस से रक्षा खरीद बंद हो जाएगी जबकि भारत की तीनों फौजों की इन्वेंटरी (वस्तु सूची) का एक बड़ा हिस्सा रूस से ही प्राप्त होता है। प्रधानमंत्री ने वैश्विक कूटनीति को देखते उचित संदेश यह दिया कि भारत वर्तमान समय में चीन, रूस और अमेरिका के बीच बनती खेमेबंदी में शामिल नहीं है। यहां पर भारत की तरफ से यह दिखाने की कोशिश की गयी कि वह अमेरिका का अच्छा मित्र है लेकिन उसकी मित्रता किसी खेमेबंदी की परिधि तक नहीं जाती। प्रधानमंत्री ने यहां पर कूटनीतिक संतुलन बनाने के लिए एक तरफ जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ जापान और अमेरिका के साथ हिन्द प्रशांत क्षेत्र में अपने रणनीतिक त्रिकोण को मजबूती प्रदान की और इसक कुछ ही देर बाद उन्होंने रूस- भारत-चीन (आरआईसी) की शीर्ष स्तरीय बैठक में शिरकत कर वैश्विक कूटनीति में संतुलन के साथ प्रगतिशीलता का संकेत दिया।
इन बैठकों पर विदेश सचिव विजय गोखले ने बताया कि मुख्य तौर पर पहली बैठक हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जुड़ी थी और तीनों नेता इस बात के पक्षधर रहे कि हिन्द प्रशांत क्षेत्र सिर्फ इन तीनों देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए शांति व समान अवसर वाला होना चाहिए। जाहिर है कि अमेरिका व जापान के साथ मिलकर भारत ने चीन को हिन्द प्रशांत क्षेत्र के हालात पर सीधा संकेत दिया कि उसकी भौगेलिक विस्तारवादी नीतियों को लेकर वह दुनिया के दिग्गज देशों के साथ है। यह दुनिया की ही नहीं भारत की जरूरत है। चीन और रूस के साथ बैठक में मुख्य तौर पर वैश्विक स्तर पर छाए मंदी के बादल और कारोबार में संरक्षणवादी नीतियों को मिल रहे प्रश्रय का मुद्दा सबसे अहम रहा।
विश्व व्यापार संगठन के नियमों की अनदेखी करने वाले राष्ट्रों पर भी भारत ने रूस और चीन के साथ मिलकर निशाना साधा। यह निशाना सही अर्थों में अमेरिका की तरफ था। अमेरिका जिस तरह से अपने कारोबार को बढ़ावा देने को लेकर आक्रामक हुआ है उससे सबसे ज्यादा चीन परेशान है लेकिन उसका असर अब भारत के आंगन तक पहुंच रहा है। इन दोनों बैठकों के बीच मोदी ने ब्रिक्स प्रमुखों की एक अलग बैठक में हिस्सा लिया। ब्रिक्स की स्थापना भी चीन और रूस ने भारत के साथ मिलकर अमेरिका की बढ़ती ताकत के सामने एक वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर की थी। ब्रिक्स देशों ने विश्व व्यापार संगठन को बेहद जरूरी बताते हुए इसकी निगरानी में भी वैश्विक कारोबार को बढ़ावा देने की अपील की। इसके साथ ही ब्रिक्स देशों ने भारत की आतंकवाद के खिलाफ अपील का एक मत से समर्थन किया। इसके अतिरिक्त रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर काफी जोर दिया। उनका कहना था कि आतंकवाद पूरी दुनिया की समस्या है और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होना चाहिए।


वैश्विक कूटनीति को ध्यान में रखते हुए भारत की तरफ से यह दिखाने की कोशिश की गयी कि वह अमेरिका का अच्छा मित्र है। लेकिन उसकी मित्रता किसी खेमेबंदी की परिधि तक नहीं जाती।

जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ बातचीत में उन्होंने आपदा के बाद पुनर्वास हेतु विभिन्न देशों के गठबंधन की आवश्यकता पर बल देते हुए दुनिया के देशों से समर्थन मांगा। इसके अतिरिक्त सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे इन से भी बातचीत हुई जिसमें एंजेला मर्केल के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने इण्डस्ट्रियल रिवोल्यूशन 4.0 को केन्द्र में रखकर बातचीत की जबकि दक्षिण कोरिया के साथ आर्थिक सम्बंधों को और सुगम बनाने के लिए आगे बढ़ने पर। फिलहाल जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की ओसाका में सम्मेलन की शुरुआत से पहले की यह अपील कि हमें अपने मतभेदों पर जोर देने के बदले सहमतियां ढूंढनी चाहिए थी, हालांकि ट्रंप पर इसका असर कम दिखा, लेकिन भारत अपने मित्र की भावनाओं का आदर करते हुए अपनी रणनीति बनाने में सफल होता दिखा।


 
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