लेख

Blog single photo

जिनके लिए पंजाब 'देस' था अब हुआ बेगाना!

12/05/2020

अमरीक
दुष्यंत कुमार का एक शेर है- 'न हो कमीज तो पांवों से पेट ढंक लेंगे/ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफ़र के लिए..।' पंजाब से हिजरत कर अपने मूल राज्यों की ओर लौटने या लौटने की कोशिश करने वाले प्रवासी श्रमिकों पर बरसों पहले लिखीं-कहीं गईं ये पंक्तियां बखूबी सार्थक साबित हो रही हैं। कोरोना वायरस है। लॉकडाउन है। कर्फ्यू है। इससे बेपरवाह पुरबिया प्रवासी मजदूर पंजाब के महानगरों और नगरों की सड़कों पर कतारबद्ध होकर खामोशी से चलते मिलेंगे। सबके सिरों पर गठरियां। बगल में पोटलियां। हाथों में बच्चों की नन्हीं हथेलियां। किसी-किसी के सिर पर कंकाल-से नजर आने वाले बूढ़े-बूढ़ियां। पूछिए कहां जाना है तो एक ही जवाब हर जगह मिलेगा- 'रेलवे स्टेशन!'
इससे आगे का सवाल आप क्या पूछ सकते हैं। जाहिरन घर वापसी के लिए। बल्कि कहना चाहिए कि मजबूरी की घर वापसी। विडंबना यह कि न इसे सरकार रोक पा रही है, न दशकों से उन्हें रोजगार देने वाले किसान तथा सरमाएदार और न वे खुद। तीनों पक्ष हालात के हर पहलू से वाकिफ होते हुए भी आश्वासनों की कच्ची नींव भविष्य का ताना-बाना बना रहे हैं, जिसकी बाबत यकीनन कोई भी आश्वस्त नहीं। रोकने वाले रोक रहे हैं लेकिन जाने वाले जा रहे हैं। जो जाने का सामर्थ्य नहीं पैदा कर पाए वे इसके लिए कवायद कर रहे हैं। उनका नाम जाने वालों की सूची में शुमार हो जाए, इसके लिए वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं। कोई दलालों के हत्थे चढ़ रहा है तो किसी को ठेकेदार बरगला रहे हैं। एक ने 9 मई की रात लुधियाना में इसलिए खुदकुशी की राह अख्तियार की कि घर वापसी मुश्किल-दर-मुश्किल हो रही थी और नौबत भुखमरी की। मौत ने आधी रात के बाद उत्तर प्रदेश के इस 38 साल के जेहन का दरवाजा खटखटाया। गोया अजीत राय ही नहीं बल्कि पूरा परिवार हालात की बुनी जानलेवा फांसी से लटक गया। जाने वाले की पत्नी खुद कहती हैं कि वह और उनकेे बेसहारा बच्चे अब न जिंदा में हैं न मरे हुओं में।
अजीत राय का यह दुखदाई मामला पुलिस-प्रशासनिक बेशर्मी के बावजूद वजूद में आ गया लेकिन न जाने कितने अजीत कोरोना काल में इस मानिंद खुदकुशी की राह खामोशी से चले गए होंगे। खैर, पंजाब से 12 लाख में से आठ लाख प्रवासी श्रमिकों ने घर वापसी के लिए बनाए गए सरकारी नियम-कायदों के तहत आवेदन किया है और क्रमवार आवेदन स्वीकृत करके रेलगाड़ियों के जरिए उन्हें बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश रवाना किया जा रहा है। जिन्हें प्रतीक्षा-सूची मोबाइल के जरिए भेजे जाने वाले संदेश (एसएमएस) पढ़नी नहीं आती, वे रोज रेलवे स्टेशनों की ओर जाते हैं और पुलिस की फजीहत सहकर तथा लुट-पिटकर वापस लौट आते हैं। मायूसी के साए में। घर वापसी की ख्वाहिश और इन गाढ़े दिनों में बेचने लायक पास जो कुछ भी था, वह बिक लिया है। यहां तक कि मोबाइल फोन भी। ज्यादातर पुरबिया प्रवासियों के पास मोबाइल फोन सबसे 'महंगी वस्तु' है और पंजाब में इन दिनों वे इसे कौड़ियों के दाम बेचने को मजबूर हैं।
वैसे भी मजबूरी का एक नाम पलायन है! पंजाब इनके लिए कभी अपना 'दूसरा देस' होता था। कइयों ने तो अपना मूल 'देस' सदा के लिए त्यागकर इसे पूरी तरह अपना लिया था। यहां रोजगार 'था', बेहतर रोजी-रोटी थी और सपनों की जिंदा उम्मीद। कोरोना, 'काल' बना और एकाएक सबकुछ बदल गया। यह देस अब बेगाना है। लौटकर नहीं आना है। त्रासदी के दु:स्वप्न यह कुछ भी देते हैं! बरहाल, दुष्यंत कुमार ही कह गए हैं- 'हम कहीं के नहीं रहे, घाट औ' घर करीब हैं।/आपने लौ छुई नहीं, आप कैसे अदीब हैं।/उफ़ नहीं कि उजड़ गए, लोग सचमुच ग़रीब हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
Top