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ताकि प्रदूषित न हो यमुना

14/10/2019

ताकि प्रदूषित न हो यमुना


नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल(एनजीटी) के आदेश के बाद गणेश विसर्जन इस बार यमुना में नहीं हुए । दिल्ली सरकार की तरफ से दिल्ली भर में कुल 116 ऐसे स्थान चुने गये, जहां लोगों के लिए गणेश प्रतिमा प्रवाहित करने की व्यवस्था की गई थी । जिसमें कई कृत्रिम तलाब बनाए गये । कई नहरों में भी गणेश विसर्जन की व्यवस्था की गई थी। यह व्यवस्था पर्यावरण को बचाने और लगातार प्रदूषित होती यमुना को संरक्षित करने के लिए की गई थी। दिल्ली के मयूर विहार इलाके में डीडीए के μलैट में चार कृत्रिम तलाब निर्मित किये गये थे, जहां मूर्ति विस्थापित करने की व्यवस्था की गई थी। यहां एमसीडी से लेकर दिल्ली पुलिस के लोग ड्यूटी पर तैनात थे। यहां की व्यवस्था भी इनके हाथों में ही थी। राजेश गौढ़ बताते हैं, ‘छह सितंबर से गणेश प्रतिमा विसर्जित करने लोग यहां आ रहे हैं। हम यहां लोगों को पंक्तिबद्ध करवाके विसर्जन करवा रहे हैं।

दिल्ली सरकार ने इस बार गणेश प्रतिमा विसर्जित करने के लिए 116 स्थानों को चिह्नित किया था, ताकि यमुना को प्रदूषण से बचाया जा सके। लेकिन सभी स्थानों पर पुख्ता व्यवस्था देखने को नहीं मिली।

हम कुल सात लोग हैं। बाकि प्रशासनिक व्यवस्था के लिए पुलिस बल तैनात हैं। हम इस बात का ध्यान रख रहे हैं कि सभी को उनकी आस्था के अनरुप समय दिया जा रहा है, जिससे वह पूरे भक्तिभाव से मूर्ति विसर्जित कर सकें।’ हालांकि जब कोई व्यवस्था बनती है तो उसमें खामियां भी होती हैं। दिल्ली सरकार ने 116 ऐसे स्थानों को चिन्हित किया था, जहां गणेश प्रतिमा विसर्जित की गई। लेकिन सभी स्थानों पर उस स्तर की व्यवस्था देखने को नहीं मिली। कई जगहों पर कोई व्यव्स्था ही नहीं की गई थी। न्यू कोंडली स्थित छठ घाट की स्थिति भी कुछ ऐसी ही देखने को मिली । नहर में पानी की कमी ऊपर से गंदगी का बड़ा अंबार। श्रद्धालू उस गंदे पानी में ही मूर्ति का विसर्जन करने को मजबूर थे। एनजीटी ने आदेश दिया था कि यमुना को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए लोगों को नदी में मूर्ति विसर्जन करने से रोकना होगा। इसके बाद दिल्ली सरकार को तालाब बनाने की दिशा में प्रयास करने के लिए कहा गया। बताया जाता है कि गुजरात के सूरत शहर से यह आइडिया लिया गया था, क्योंकि सूरत में ऐसे तालाबों में ही मूर्तियों के विसर्जन का चलन है। इस आदेश के बाद दिल्ली भर में खाली जगहों का चुनाव करके उसमें बड़े-बड़े गड्ढे बनाए गये।

ईको फ्रैंडली गणपति की धूम

बदलाव हर स्तर पर हो रहा है। लोगों की सोच में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। खासतौर पर युवा पीढ़ियों में। ये युवा अपने त्योहारों को अब ईको फै्रंडली बनाने में जुट गई है। दिल्ली ही नहीं पूरे देश से इस बार गणेश प्रतिमा से जुड़ी ऐसी खबरें आती रहीं, जो पर्यावरण को राहत पहुंचाने वाली थी। जिसमें प्लास्टर आॅफ पेरिस और कैमिकल की मूर्तियों से परहेज किया गया। फिल्मी हस्तीयों से लेकर आम जनमानस के मन में प्रकृति को लेकर चिंता साफ देखी जा सकती है। दिल्ली के निर्माण विहार में रहने वाली मूमल जोशी दिल्ली विश्वविद्याल में दर्शन शास्त्र की छात्रा हैं। उनके मन में खुद मिट्टी के गणेश बनाकर, उन्हें स्थापित करने की इच्छा जागी। देश भर में मूर्ति विसर्जन से होने वाले दुष्प्रभावों को देखते हुए मूमल को लगा कि हम अपने स्तर पर कुछ ऐसा करें, जिससे हमारी संस्कृति तो बरकरार रहे और साथ ही प्रकृति को होने वाले नुकसान को रोका भी जा सके। इसके लिए उनको अपनी माता-पिता का साथ भी मिला। उनकी मां उमा जोशी बताती हैं, ‘हम बरसों से गणेश प्रतिमा स्थापित करते आये हैं। हम पहले महाराष्ट्र भवन मूर्ति लेने जाते थे। जहां की मूर्तियां रासायनिक मिट्टी और प्लास्टर आॅफ पेरिस के उपयोग से निर्मित की जाती थी। लेकिन बेटी ने जैसे ही हमें सुझाया कि उसकी इच्छा खुद गणेश प्रतिमा बनाकर स्थापित करने की है, हम सभी उसके सहयोग में जुट गये।’ आज के युवाओं का स्वभाव दौड़-भाग का है। उसे भोजन में भी फास्ट-फूड पसंद आता है। देरी उसे किसी काम में पसंद नहीं। ऐसे में मिट्टी लाना और उस मिट्टी को मूर्ति का रूप देना, उनके लिए बड़ी बात नहीं हैं। मूमल कहती हैं, ‘मैं अपने दादा के साथ गणेश प्रतिमा की स्थापना और पूजा में जुटी रहती थी। हम स्कूल से लौटते ही महाराष्ट्र भवन से प्रतिमा लेने दादा जी के साथ निकल जाते थे। लेकिन इस बार मेरे मन में शुरू से ईको फ्रैंडली प्रतिमा स्थापित करने की इच्छा थी। मैंने इस बार खुद की बनाई मूर्ति स्थापित करने का मन बना लिया। मैं कॉलेज से आकर इसी काम में जुट जाती। इसमें मेरे साथ पूरे परिवार का सहयोग भी होता था। आखिरकार पूरे एक सप्ताह की मेहनत के बाद एक सुंदर मूर्ति तैयार हो गई। जिसको रंगने का जिम्मा पिता जी को था।’ मूमल के पिता संदीप जोशी कहते हैं, ‘ये हमारे लिए एकदम अलग अनुभव था। मेरे दादा और चाचा तो इंदौंर में मूर्तियां बनाते थे लेकिन हम दिल्ली में पले बढ़े हमारे साथ की पीढ़ी कभी मूर्ति निर्माण से नहीं जुड़ सके। लेकिन मैं इस पूरी प्रक्रिया में देखा कि इसमें घर के सभी सदस्य बिना कहे जुड़ते चले गये। ये जुड़ाव मूर्ति निर्वाण से अप्रत्यक्ष रूप से परिवार निर्माण की ओर बढ़ गया था। नहीं तो आज किसी भी व्यक्ति को मोबाइल और टीवी से फुर्सत कहां है।’

दिल्ली के बुराड़ी इलाके में 6 बड़े तालाब बनाए गए हैं, जिसमें यमुना से टैंकर के जरिए पानी लाकर डाला गया। मूर्तिकारों को भी निर्देश दिया गया था कि वह मूर्तियों के लकड़ी के ढांचे में अपना मोबाइल नंबर और नाम लिखें। विसर्जन के बाद मूर्तियों पर चढ़ी मिट्टी उतर जाएगी और सिविक एजेंसियां मूर्तिकारों को फोन करके उनका ढांचा लौटा देंगी, जिससे वह अगले साल भी उसी ढांचे पर मूर्तियां बना सकेंगे।


 
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