राम जन्मभूमि

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श्रीराम मंदिर का भूमि पूजन, 'प्रधानमंत्री ने राष्ट्रहित में सबको साधा'

05/08/2020

आमोद कान्त मिश्र 

अयोध्या, 05 अगस्त (हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की भूमि पूजा में न सिर्फ आध्यात्मिक, धार्मिक शक्तियों की आराधना की, बल्कि वर्ष 1989 में शिलाओं की पूजा कर मंदिर में लगाने को रामभक्तों-कारसेवकों द्वारा भेजे गए ईंटों का उपयोग कर उनकी भावनाओं का भी सम्मान किया। 

वे भूमि पूजन में भारत-नेपाल के सांस्कृतिक सम्बन्धों को पुष्ट किया। संविधान और आस्था के प्रति अपने समर्पण भाव को उजागर किया। भगवान श्रीराम के मंदिर के लिए हुए भूमि पूजन में प्रधानमंत्री ने विपक्षियों को आस्था और संवैधानिक कर्तव्य के प्रति अपनी निष्ठा का सकारात्मक संदेश दिया। वे इस मौके पर राष्ट्रहित में सबको एक साथ साधने की कोशिश की। 

अब श्रीराममंदिर की आधारशिला रख दी गई है। पूजा सम्पन्न हो गई है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या पहुंचकर हनुमानगढ़ी मंदिर में पूजा की। फिर रामलला के दर्शन किए।

श्रीराम मंदिर पूजन लिए सज-धजकर तैयार अयोध्या स्थित जन्मभूमि पर स्थापित भगवान रामलला को रत्न जड़ित हरे रंग के वस्त्र पहनाकर तैयार किया गया था। इस रंग का वस्त्र धारण करवाने के पीछे भी आध्यात्मिक सोच है। हालांकि, अब भी अयोध्या में हर तरफ उल्लास है। लोग सड़कों पर उतर आए हैं। सड़कों पर कीर्तन और जय श्रीराम के नारे लग रहे हैं।

नौ ईंटें रखी गईं

श्रीराम मंदिर 'भूमि पूजन' में अनुष्ठान करवा रहे पुजारी ने पूजा के बीच में ही बताया कि भूमि पूजन के दौरान नींव में नौ ईंटें रखी गई हैं। इन्हें वर्ष 1989 में दुनिया भर के भगवान राम के भक्तों ने भेजा था। ऐसी ईंटों की संख्या 2 लाख 75 हजार है, जिनमें से 100 ईंटें ' जय श्री राम 'उत्कीर्ण' की हुईं हैं।

भारत-नेपाल के सांस्कृतिक संबंधों की ताजा हुई यादें

अयोध्या में श्रीराम मंदिर के लिए हुए भूमि पूजन में लगाई गईं 09 शिलाओं के पूजन में बीच वाली शिला, 'कूर्मशिला' है। इस शिला के ठीक ऊपर रामलला विराजमान होंगे। यह पल, भारत-नेपाल के सांस्कृतिक संबंधों को प्रदर्शित करने वाला भी है। यह वर्ष 1895 में नेपाल के तत्कालीन नरेश जंग बहादुर राणा की बहू राजकुमारी देवी द्वारा अयोध्या में स्थापित नेपाली मंदिर की ओर ध्यान आकृष्ट करने वाला रहा। एक स्वप्न देखने के बाद राजकुमारी देवी ने इस मंदिर में कुर्मनारायण की स्थापना शालिग्राम के रूप में कराई थी। 

यह मान्यता है कि भगवान कूर्म ने अपनी पीठ पर भगवान शेषनाग को धारण किया है और उन्होंने अपने सहस्र फणों पर माता धरती को धारण किया है। यह सबकुछ अनायास ही नहीं हुआ। वर्ष 1895 में जिस कार्य को नेपाल राजवंश की बहू ने किया; वह आज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। नौ शिलाओं में शामिल कूर्मशिला पर ही भगवान रामलला विराजमान होंगे। यह भारत-नेपाल का सांस्कृतिक-आध्यात्मिक और विचारों-शक्तियों के योग का संयोग है।
 

संविधान और आस्था दोनों के प्रति समर्पण 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामलला के दरबार में साष्टांग प्रणाम कर खुद की भावनाओं को जाहिर किया तो वर्ष 2014 में लोकसभ जीत के बाद संसद पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसद के सामने साष्टांग होने का दृश्य अनायास ही आंखों के सामने आ गया। इन दोनों दृश्यों ने प्रधानमंत्री की आस्था और संवैधानिक कर्तव्य को समरूप लाकर खड़ा कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ऊपर लगातार हमलावर विपक्ष को यह स्पष्ट संदेश दिया कि किसी भी कीमत पर आस्था और संवैधानिक मूल्यों से समझौता नहीं किया जा सकता है। यह अलग-अलग होते हुए भी एक संवैधानिक व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण और निष्पक्ष, पक्ष है।

हिन्दुस्थान समाचार/आमोद/राजेश 


 
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