यथावत

Blog single photo

छात्र संघ का चुनाव और नोटा

22/10/2019

छात्र संघ का चुनाव और नोटा


पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू में छात्र संघ के चुनाव संपन्न हुए। इसके अलावे देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी चुनाव हुए हैं। बहरहाल, राजधानी के दोनों विश्वविद्यालयों के छात्र संघों में एक नया ट्रेंड दिखाई दिया। यह ट्रेंड ‘नोटा’ का है, जो विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति को प्रभावित कर रहा है। सच तो यह है कि मतदाताओं के सामने नोटा, यानी उम्मीदवारों में सभी को नकारने का विकल्प राष्ट्रीय राजनीति में भी सकारात्मक नहीं बन पाया है। करीब छह साल पहले, 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से नोटा लागू किया गया था। अभी तक लोक सभा के दो और विधान सभाओं के 42 चुनाव में इसका प्रयोग हो चुका है। जो आंकड़े इकठा किये गए हैं, वह कम से कम,नोटा के द्वारा राजनीतिक परिवर्तन की पुष्टि नहीं करते। एक आंकड़े में यह दिखाई देता है कि सामान्यत: नोटा जनजातीय और अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित सीटों पर ज्यादा प्रयोग किया गया है। अर्थात सामाजिक समन्वय के लिहाज से यह प्रवृत्ति खतरनाक दिखायी दे रही है। अभी ऐसे मतों की गिनती को परिणाम पर प्रभावकारी नहीं माना गया है। ऐसे में कल्पना करें कि नोटा के अंतर्गत वोट देने वालों के बहुमत में होने के बावजूद जीत बहुत कम मतों पर भी हो सकती है।

चूंकि जेएनयू में छात्रों की तादाद भी बहुत ज्यादा नहीं है, इसलिए नोटा का असर गंभीर रूप से दिखाई दिया। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में नोटा करीब 11 हज़ार तक पहुंच गया, जो दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक था।

अब प्रश्न है कि आम चुनावों की तरह छात्र संघों मे भी इसकी प्रासंगिकता नहीं होने पर छात्र संगठन इस मुद्दे पर क्या कर रहे हैं। विद्यार्थी परिषद् का आगाज कैंपस में अन्य संगठनों से अलग रहा है। किसी राजनीतिक दल का घटक नहीं होने का बोझ भी विद्यार्थी परिषद् पर नहीं रहा। ऐसे में उसका दायित्व है कि वह इस तरह के प्रश्न पर बहस चलाये। इस दो विश्वविद्यालयों में सम्पन्न चुनाव में नोटा ने तो इस संगठन को ही अधिक प्रभावित किया है। नोटा में डाले गए कुल मत जेएनयू में 4500 के करीब थे। ये मत अलग अलग सेंट्रल पैनल और कौंसिलर के पदों पद डाले गए। चूंकि जेएनयू में छात्रों की तादाद भी बहुत ज्यादा नहीं है, इसलिए नोटा का असर गंभीर रूप से दिखाई दिया। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में नोटा करीब 11 हज़ार तक पहुंच गया, जो दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक था। अगर नोटा की व्यवस्था नहीं होती तो अखिल विधार्थी परिषद् की जीत का फासला और बड़ा होता। दरसअल, कैंपस की राजनीति में कई बार चीजें फैशन बन जाती हैं। नोटा के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है। नोटा युवाओं के बीच एक फैशन ही बन गया है। कौन इससे इनकार करेगा कि व्यवस्था को सुधारने के लिए सकारात्मक भूमिका की जरुरत होती है।

नोटा तो नकारात्मक दृष्टिकोण बन गया है। शिथिलता अथवा गुमशुदगी की स्थिति में व्यवस्था को नहीं बदला जा सकता। कैंपस की राजीनीति नकारात्मक ढांचे की मोहताज नहीं बननी चाहिए। अगर गिलाशिक वा या शिकायत है,तो उसकी भी बेबाकी से चर्चा होनी चाहिए। किसी भी कैंपस में चुनी गयी स्टूडेंट कौंसिल एक साल के लिए ही बनती है। अगर विरोध के कारण मोहभंग की स्तिथि बनती है और उस पर कोई चर्चा नहीं होती, तो यह क्षोभ युवा राजनीति के लिए ठीक नहीं है। नोटा का निर्णय तो क्षोभ का ही प्रतिफल है। अगर युवा देश के कर्णधार हैं और उनमें इतनी नकारात्मकता है तो देश की दिशा और दशा कैसे बदलेगी? अगर भगत सिंह या खुदीराम बोस, अशफाक उल्ला और चंद्रशेखर आजाद गांधी जी के विचारों से रूष्ट होकर चुप हो जाते तो भारत का एक उज्जवल क्रांतिकारी इतिहास अंधेरे में डूब जाता। अगर आंबेडकर जाति प्रथा से निराश होकर विदेशों में एक सुखमयी जिंदगी जीने को तैयार हो जाते तो आज भारत के लिए उनके योगदान का क्या होता? इन उदाहरणों के बीच तय लगता है कि छात्र-युवाओं को नकारात्मक नहीं, वैकल्पिक मतदान पर सोचना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि विश्वविद्यालयों और दूसरे कैंपस में नोटा पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो।


 
Top