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जलवायु समझौते में नहीं होगा बदलाव

01/07/2019

प्रमोद भार्गव
जी-20 शिखर सम्मेलन में जलवायु संकट पर दो दिन चली चर्चा के बाद पेरिस में 2016 में हुए जलवायु परिवर्तन के समझौते पर 19 देशों ने एकजुटता दिखाई है। ये देश इस संधि की शर्तों में बिना कोई बदलाव किए इसके पूर्ण क्रियान्वयन पर सहमत हो गए हैं। हालांकि अमेरिका ने एक बार फिर इस समझौते पर असहमति जताई है। इस तरह अमेरिका इस बैठक में अलग-थलग पड़ गया है। जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने कहा है कि जी-20 देश जलवायु संकट पर उस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे, जिस पर अर्जेंटीना में हुई पिछली बैठक में सहमति बनी थी। अर्जेंटीना में इन्हीं देशों ने पेरिस समझौते को अपरिवर्तनीय घोषित किया था। हालांकि अमेरिका ने उसी समय पेरिस समझौते से बाहर निकलने की घोषणा कर दी। यह सम्मेलन जापान के ओसाका शहर में संपन्न हुआ है।  
समूची दुनिया में धरती को बचाने की चिंता की जा रही है। उधर, पेरिस समझौते से पीछे हटने वाले अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन के संकट को व्यापार का सुनहरा अवसर मान लिया है। अमेरिका के इस कुतर्क से दुनिया के पर्यावरणविद् हैरान हैं। आर्कटिका में पिघलती बर्फ का सीधा संबंध सूखे, बाढ़ और लू के साथ माना जा रहा है। समुद्री व हिमालयी बर्फ के पिघलने से जलस्तर बढ़ रहा है। इसके नतीजे दिखने लगे हैं। इंडोनेशिया ने अपनी राजधानी जकार्ता को बदलने का प्रस्ताव संसद से पारित करा लिया है। जकार्ता दुनिया में तेजी से डूबने वाले शहरों में से एक है। समुद्र के बढ़ते जलस्तर के कारण जकार्ता का बड़ा हिस्सा 2050 तक डूब सकता है। भारतीय संसद के चालू सत्र में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्वनी कुमार चैबे ने बताया कि समुद्र के जल स्तर में वृद्धि की वजह से भारत के समुद्र तटीय इलाकों में तूफान, सुनामी, तटीय बाढ़, ऊंची लहरों और निचले इलाकों में मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है। पिछले 50 साल के भीतर समुद्र के जल में 1.3 मिली लीटर की सालाना वृद्धि दर्ज हुई है। पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर स्थित समुद्र के जल में 1948 से 2005 के बीच 5.16 मिली मीटर की बढ़ोत्तरी हुई है। गुजरात के कांडला में बीती एक सदी के भीतर 2.89 मिली मीटर की दर से समुद्र का जल स्तर बढ़ा है। यह वैश्विक औसत दर 1.8 मिली मीटर प्रति वर्ष से ज्यादा है। चौबे ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के डेटा के आधार पर बताया कि भारतीय उपमहाद्वीप का तापमान 0.6 डिग्री के ट्रेंड के साथ बढ़ रहा है। साफ है, भारत जलवायु संकट के बड़े खतरे की ओर बढ़ रहा है।    
2017 में पोलैंड के कातोवित्स शहर में 2015 के पेरिस समझौते के बाद जलवायु परिवर्तन की बैठक में 200 देशों के प्रतिनिधि गंभीर पर्यावरणीय चेतावनियों और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरों पर सहमत दिखे थे। इन प्रतिनिधियों ने 133 पन्नों की एक नियमावली को अंतिम रूप दिया था, जिसमें वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने की मांग पर सहमति बन गई थी। यह समझौता 2020 से प्रभावित होना है। हालांकि इस पर अमल करना आसान नहीं है। शायद इसीलिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटरेस ने कहा है कि इसे पूरी तरह लागू करने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति जतानी होगी। इसके लिए तकनीकि नवाचार अपनाने होंगे। अन्यथा बढ़ता तापमान आत्मघाती साबित हो सकता है। इसके पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हठधर्मिता के चलते पेरिस में 2015 में हुए जलवायु परिवर्तन समझौते से अलग होने की घोषणा कर दी थी। ध्रुवीय इलाकों में बर्फ पिघलने का बड़ा कारण कार्बन उत्सर्जन है। अमेरिका कार्बन उत्सर्जन वाले देशों में शीर्ष देश है। बावजूद अमेरिका ने कार्बन उत्सर्जन में 14 प्रतिशत की कटौती का दावा किया है, जबकि वैश्विक कॉर्बन उत्सर्जन में 20 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज हुई है।  
इटली में दुनिया के सबसे धनी देशों के समूह जी-7 की शिखर बैठक में भी पेरिस संधि के प्रति वचनबद्धता दोहराने के संकल्प पर ट्रंप ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। ट्रंप ने तब भारत और चीन पर आरोप लगाया कि इन दोनों देशों ने विकसित देशों से अरबों डॉलर की मदद लेने की शर्त पर समझौते पर दस्तखत किए हैं। लिहाजा यह समझौता अमेरिका के आर्थिक हितों को प्रभावित करने वाला है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप द्वारा खड़े किए इस सवाल का उत्तर देते हुए कहा था कि 'भारत प्राचीनकाल से ही पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाता चला आ रहा है। हमारे 5000 साल पुराने शास्त्र पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग रहे हैं। अथर्ववेद तो प्रकृति को ही समर्पित है। हम प्रकृति के दोहन को अपराध मानते हैं।' यहां यह भी बताना मुनासिब होगा कि पेरिस समझौते के बाद 2015 में भारत को हरित जलवायु निधि से कुल 19000 करोड़ रुपये की मदद मिली। उसमें अमेरिका का हिस्सा महज 600 करोड़ रुपये था। ऐसे में ट्रंप का यह दावा नितांत खोखला था कि भारत को इस निधि से अमेरिका के जरिए बड़ी मदद मिल रही है।         
विश्व मौसम संगठन के अनुसार पूर्व औद्योगिक काल से आज तक दुनिया का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। 1850-1900 में तापमान के स्तर में 2018 के पहले 10 महीनों के दौरान औसत वैश्विक तापक्रम करीब 0.98 डिग्री सेल्सियस अधिक है। पिछले 22 साल में 20 सबसे गर्म साल रहे हैं। इनमें 2015 से 2018 के चार साल शीर्ष पर हैं। यदि यही प्रकृति बनी रही तो 2100 तक वैश्विक तापमान 3 से 5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि का अनुमान है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि बर्फ पिघलने की यही रफ्तार रही तो 2050 तक आर्कटिका बर्फविहीन हो जाएगा। अफ्रीका और एशिया के कमोवेश सभी शहर मौसम की अतिवृष्टि और अनावृष्टि के खतरों की चपेट में है। दुनिया की अर्थव्यवस्था में तेजी से उभरने वाले 100 शहरों में से 84 पर तापमान बढ़ने और जलवायु परिवर्तन से होने वाली प्राकृतिक आपदाओं की तलवार लटक गई है। यदि कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं लाई गई तो एक रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 56 गीगा टन तक पहुंच जाएगा। 
 अमेरिका में कोयले से कुल खपत की 37 फीसदी बिजली पैदा की जाती है। इस बिजली उत्पादन में अमेरिका विश्व में दूसरे स्थान पर है। कोयले से बिजली उत्पादन करने से सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं। इस दिशा में भारत ने बड़ी पहल करते हुए 50 करोड़ एलईडी बल्बों से प्रकाश व्यवस्था लागू कर दी है। इस प्रक्रिया से कॉर्बन डाइऑक्साइड में 11 करोड़ टन की कमी लाने में सफलता मिली है। इसकी अगली कड़ी में सघन औद्योगिक ईकाइयों की ऊर्जा खपत को तीन वर्षीय योजना के तहत घटाया जा रहा है। पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत ने कार्बन उत्सर्जन में 30.35 प्रतिशत कटौती का लक्ष्य 2005 की तुलना में रखा है।
जलवायु परिवर्तन के असर पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि सन् 2100 तक धरती के तापमान में वृद्धि को नहीं रोका गया तो हालात नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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