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परिवारवाद का नया अध्याय

06/07/2019

परिवारवाद का नया अध्याय

सियाराम पांडेय ‘शांत’

दलितों-मजलूमों के हक की लड़ाई के लिए कांशीराम ने जिस बहुजन समाज पार्टी को आंदोलन का रूप दिया था। अपने भाई-भतीजे को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर इस आंदोलन की भ्रूण हत्या उन्हीं मायावती ने कर दिया जिन पर मान्यवर को सबसे ज्यादा भरोसा था।

वर्ष 2003 में एक वरिष्ठ पत्रकार का विश्लेषण छपा था कि भारतीय राजनीति मात्र 300 परिवारों तक सीमित है। अब 16 सालों में यह संख्या 565 हुई या नहीं हुई। इस पर रिसर्च होना चाहिए। बता दें कि अंग्रेजों के दौर में भारत में 565 राजघराने थे जो लोककल्याण की कम, अपने हितों की ज्यादा चिंता करते थे। राजनीति में परिवारवाद की आलोचना तो खूब होती है लेकिन लाभ की बहती नदी में डुबकी लगाने में कोई पीछे नहीं रहता। राजनीति में परिवारवाद की घोर आलोचक मायावती भी बहुजन समाज पार्टी में अपने परिवार के लिए गुंजाइश बनाने में अब पीछे नहीं रहीं। बहुजन समाज पार्टी की अखिल भारतीय बैठक में अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा भतीजे आकाश आनंद को राष्ट्रीय समन्वयक नियुक्त कर उन्होंने साफ कर दिया कि बसपा भी परिवारवाद के राजनीतिक दलदल में कूद गई है।
उन्होंने बसपा की राजनीति में परिवारवाद का नया अध्याय खोल दिया है। अब यह बांचने वालों पर निर्भर हैं कि वे इसे किस रूप में लेते हैं। हालांकि आकाश आनंद को पार्टी में शामिल करने के संकेत तो पिछले साल अपने 63 वें जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने दे दे दिए थे। तब से अब तक अनेक बार आकाश आनंद मायावती के साथ छाया की तरह लगे रहे। जब अखिलेश यादव मायावती का भतीजा बनने की कोशिश कर रहे थे तब भी मायावती का यह असली भतीजा उनके साथ रहा। अखिलेश की दाल तो नहीं गली, लेकिन आकाश ने न केवल बसपा की राजनीति में अपनी दाल गलाई बल्कि दुनिया को यह भी दिखाया कि असली और नकली में फर्क होता है। मुलायम सिंह यादव अगर अपने परिवार के ज्यादातर सदस्यों को राजनीति का हिस्सा बना सकते हैं तो मायावती क्यों नहीं? सावन से भादो दूबर क्यों रहे? मायावती ने अपनी राजनीतिक परिपाटी को बदली है।
पार्टी में मायावती के बाद कौन का सवाल उठता रहा है। मायावती ने उत्तराधिकारी तय कर बता दिया है कि बड़ी मुश्किल से कब्जा की गई बसपा पर उनके परिवार का ही अधिकार है। मायावती ने कांशीराम के परिवार और उनके अत्यंत नजदीकी नेताओं का भी विरोध झेला था। इतनी मुश्किल से हाथ लगी पार्टी को वह दूसरों के हाथ में कैसे जाने देतीं। बसपा में बड़े संगठनात्मक बदलाव की घोषणा कर उन्होंने प्रदेश भर के को आर्डिनेटरों को इस बात का संकेत दे दिया है कि पार्टी में दूसरे स्थान पर उनके भाई आनंद ही हैं। मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद के साथ पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी गौतम को भी नेशनल कोआर्डिनेटर की जिम्मेदारी दी है। रामजी गौतम भी उनके भतीजे बताए जाते हैं। बहरहाल, भारतीय लोकतंत्र में वंशवाद की दागबेल नेहरू खानदान से पड़ी थी। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी। यह शृंखला यहीं रुकेगी, कहना मुश्किल है।
बाल ठाकरे ने शिवसेना में परिवारवाद को बढ़ावा दिया। लालू यादव, शरद पवार, शेख अब्दुल्ला, फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला परिवार, माधवराव सिंधिया परिवार, मुलायम सिंह यादव ने भी वंशवादी राजनीति की परंपरा को आगे बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा। वंशवाद का आरोप तो खैर भाजपा पर भी लगा। उसमें भी कई ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र से अपने बेटे या बेटी को टिकट दिलवाया और परिवारवादी राजनीति को संबल दिया। कांग्रेस, सपा, बसपा, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल सेक्युलर, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तेलुगुदेशम पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति और द्रमुक जैसे राजनीतिक दल तो पार्टी को अपनी पुश्तैनी जागीर ही मानकर चल रहे हैं। देश की मूलभूत समस्याओं का अगर समाधान नहीं हो रहा है तो इसके मूल में राजनीति में कुछ परिवारों का वर्चस्व ही प्रमुख है।
कुल मिलाकर बसपा की अगर बात की जाय तो इसके सूत्रधार मान्यवर कांशीराम ने इसे गढ़ने के लिए अपना घर परिवार त्याग दिया था ताकि बहुजन के हित के लिए बनी यह पार्टी किसी परिवार के शिकंजे में न फंसे। शायद इसीलिए उन्होंने पार्टी की बागडोर कुंवारी मायावती को सौंपी थी लेकिन उनके इस आंदोलन की भ्रूण हत्या उन्हीं मायावती ने कर दिया जिन पर मान्यवर को सबसे ज्यादा भरोसा था।


 
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