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दिल्ली में सांसों का संकट

05/11/2019

प्रभुनाथ शुक्ल 

दिल्ली की आबोहवा दमघोंटू हो चुकी है। सांस लेना भी मुश्किल हो चला है। सुप्रीम कोर्ट को बार-बार सरकारों और प्रशासन को चेतावनी देनी पड़ रही है। नेता दलगत राजनीति से ऊपर उठने को तैयार नहीं हैं। सरकारें दावा करती हैं कि वह कठोर कदम उठा रही हैं। दिल्ली में 15 नवम्बर तक  वाहनों पर ऑड-ईवन का फार्मूला लागू किया गया है। फिर भी सांसों पर संकट है। हाल ही में जारी एक सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि 40 फीसदी लोग अब यहां रहना नहीं चाहते। जहरीली होती दिल्ली हमारे लिए बड़ा खतरा बन गई है। पर्यावरण की चिंता किए बगैर विकास का सिद्धांत मुश्किल में डाल रहा है। समय रहते अगर इस पर लगाम नहीं लगाया गया तो धुंध और धुएं का मेल जनमानस को निगल जाएगा। हालात यहां तक हैं कि 24 घंटे में 20 से 25 सिगरेट से जितना जहरीला धुआं निकला है उतना एक नवजात निगल रहा है। जरा सोचिए, हमने दिल्ली को किस स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। दुनिया के प्रदूषित शहरों में दिल्ली-एनसीआर अव्वल है। भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन हो रहा है। हम पराली पर सवाल उठा रहे हैं और किसानों को सुविधाएं देने की  बजाय सारा दोष किसानों पर मढ़ रहे हैं। 
दिल्ली सरकार की तरफ से ऑड-ईवन तीसरी बार लागू किया गया है। यूपी, पंजाब और हरियाणा के मुख्य सचिवों से सुप्रीम कोर्ट ने जवाब मांगा है। केंद्र सरकार ने भी सम्बन्धित राज्यों और केंद्रीय अफसरों से जरूरी कदम उठाने को कहा है। लेकिन यह सब समस्या का स्थायी हल नहीं है। देश में प्रदूषण पर राजनीति हो रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ऑड-ईवन लागू करने के फैसले पर पहले ही सवाल उठा चुका है। पिछले साल सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने एनजीटी को बताया था कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि दिल्ली में वाहन प्रदूषण पर कोई असर पड़ा हो। इसकी वजह से ऑड-ईवन पर सवाल खड़े हो गए हैं। फिर भी दिल्ली सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है। उत्सव मना रही है
आज दुनियाभर में बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण बड़ी चुनौती बन गया है। दिल्ली में तकरीबन 60 लाख से अधिक दोपहिया वाहन पंजीकृत हैं। प्रदूषण में इनकी भागीदारी 30 फीसदी है। कारों से 20 फीसदी प्रदूषण फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 20 प्रदूषित शहरों में 13 भारतीय शहरों को रखा है, जिसमें दिल्ली चार प्रमुख शहरों में शामिल है।
दिल्ली में 85 लाख से अधिक गाड़ियां हर रोज सड़कों पर दौड़ती हैं। इसमें 1400 से अधिक नई कारें शामिल होती हैं। इसके अलावा दिल्ली में निर्माण कार्यों और इंडस्ट्री से भी भारी प्रदूषण फैल रहा है। दिल्ली में आबादी का आंकड़ा एक करोड़ 60 लाख से अधिक हो चला है। ऐसे में दिल्ली में वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग अधिक बढ़ाना होगा। शहर में स्थापित प्रदूषण फैलाने वाले प्लांटों के लिए ठोस नीति बनानी होगी। दुनियाभर में ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। इसमें कार्बन की सबसे बड़ी भूमिका है। वैज्ञानिकों का दावा है कि वर्ष 2021 तक छह डिग्री सेल्सियस तक तापमान बढ़ सकता है। भारत में गर्मी के शुरुआती दिनों में ही बेतहाशा गर्मी पड़ने लगी है। दिल्ली में प्रदूषण को लेकर 16 साल पूर्व एक सर्वे में जो आंकड़े आए थे, वह चौंकाने वाले थे। आज उनकी क्या स्थिति होगी यह विचारणीय बिंदु है। दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स बहुत खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। स्कूलों को बंद कर दिया गया है। अस्पतालों में सांस के मरीजों की संख्या बढ़ गई है। लोग काफी परेशान हैं। लेकिन समाधान नहीं दिख रहा है। 
दिल्ली में कुछ वर्ष पूर्व वाहनों से प्रतिदिन 649 टन कार्बन मोनोऑक्साइड और 290 टन हाइड्रोकार्बन निकलता था, जबकि 926 टन नाइट्रोजन और 6.16 टन से अधिक सल्फर डाईऑक्साइड की मात्रा थी। जिसमें 10 टन धूल शामिल है। इस तरह प्रतिदिन तकरीबन 1050 टन प्रदूषण फैल रहा था। आज उसकी भयावहता समझ में आ रही है। उस दौरान देश के दूसरे महानगरों की स्थिति मुंबई में 650, बेंगलुरू में 304, कोलकाता में करीब 300, अहमदाबाद में 290, पुणे में 340, चेन्नई में 227 और हैदराबाद में 200 टन से अधिक प्रदूषण की मात्रा थी।
हमें बढ़ते वाहनों के प्रचलन और विलासिता की दुनिया से बाहर आना होगा, तभी हम बिगड़ते पर्यावरण प्रदूषण पर लगाम लगा सकते हैं। यह जहर हमारी पीढ़ी के लिए बेहद जानलेवा है। दुनियाभर में 30 करोड़ से अधिक बच्चे वायु प्रदूषण से प्रभावित हैं। 2017 में बढ़ते प्रदूषण की वजह से 12 लाख लोगों की मौत हुई थी। आज की स्थिति और भी भयावह है। प्रदूषण को हमने कभी गम्भीरता से नहीं लिया। सरकारों और संबंधित एजेंसियों का दावा है कि किसानों द्वारा पराली जलाए जाने से स्थिति गंभीर हुई है। पराली हजारों सालों से जल रही है, फिर इतना कोहराम क्यों नहीं मचा। लेकिन आज किसान और पराली पर राजनीति हो रही है। 
प्रदूषण को हमने कभी गम्भीरता से नहीं लिया। कभी चीन और थाईलैण्ड की स्थिति बेहद बुरी थी। लेकिन वहां की सरकारों ने प्रदूषण रोकने और उद्योग से निकले वाले कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए गम्भीरता दिखाई। आधुनिक मशीनें लगाकर शुद्ध हवा का विकल्प खोजा। लेकिन भारत इस तरह का कदम उठाने में नाकाम रहा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि प्रदूषण से बचना है तो गाजर खाएं। यह हास्यास्पद है। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सख्त फैसले लेने होंगे। तभी इसका समाधान निकलेगा। हमें नये विकल्प की तलाश करनी होगी। 
(लेखक पत्रकार हैं।)


 
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