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तेल युद्ध विश्वयुद्ध न बन जाय!

02/10/2019

अरविंद कुमार शर्मा

सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको पर हुए हमले का विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। कम से कम सितंबर के अंतिम दिनों में जो कुछ हुआ, उससे विश्व की अर्थव्यवस्था बिगड़ने के साथ युद्ध तक का संकट देखा जा रहा है तो इसे समझने के लिए सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस, अमेरिका के राष्ट्रपति और ईरानी नेताओं के बयान को ध्यान में रखना होगा। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सितंबर के आखिरी दिवस यानी 30 तारीख को अरामको पर हुए हमले के बारे में पहली बार बयान दिया। उन्होंने कहा कि ईरान को नहीं रोका गया तो युद्ध होगा और इसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना होगा। असल में अरामको के तेल ठिकानों पर हमले की जिम्मेदारी हूती विद्रोहियों ने ली थी। इसके बावजूद अमेरिका और सउदी अरब इसके लिए सीधे ईरान को ही जिम्मेदार मानते हैं। यहां याद करना होगा कि परमाणु संधि टूटने के बाद से अमेरिका पहले से ही ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगा चुका है। उसने भारत सहित कई दूसरे देशों पर भी ईरान से तेल मंगाने पर रोक के लिए दबाव डाला था। तब से दुनियाभर की नदियों में बहुत सारा पानी बह चुका है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले ओमान की खाड़ी में तेल टैंकरों पर हमले और फिर सऊदी अरब के अरामको तेल ठिकानों पर ड्रोन आक्रमण से सऊदी और ईरान के बीच तनाव में वृद्धि हुई है। पहले से ही ईरान से नाराज अमेरिका को उस पर हमले का फिर मौका मिल चुका है।

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव युद्ध के मुहाने पर पहुंच चुका है। ज्ञातव्य है कि जून में अमेरिका ने ईरान पर हमले की योजना बना ली थी, जब ईरान ने उसके एक टोही ड्रोन को मार गिराया था। तनाव बढ़ता देख फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन की पहल पर बातचीत की उम्मीदें बढ़ी थीं। इस पर ईरान ने पहले अमेरिका से उस पर लगे प्रतिबंध वापस लेने की मांग कर दी। लगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कुछ ढीले पड़ रहे हैं कि इसी बीच खाड़ी में एक-दूसरे की तेल संपत्ति पर हमलों ने खेल बिगाड़ दिया। अब राष्ट्रपति ट्रंप एक ट्वीट में कहते हैं, "ईरान चाहता है कि बातचीत के लिए मैं उसपर से प्रतिबंधों को हटा दूं। मैं कहता हूं कि ऐसा हरगिज नहीं होने वाला है। अमेरिका ईरान से प्रतिबंधों को नहीं हटाएगा।" ट्रंप के इस बयान से उत्तेजित ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी की तरफ से भी कहा गया कि फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के नेताओं ने अमेरिका से बातचीत के लिए ईरान को प्रोत्साहित किया था। इन देशों ने आश्वासन दिया था कि अमेरिका ईरान पर से सभी प्रतिबंधों को हटा लेगा। ऐसा नहीं होता तो अमेरिका से बातचीत का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

वैसे, इस विवाद में जो तीन देश बातचीत के पक्षधर हैं, उनमें से ब्रिटेन भी ईरान के खिलाफ सख्त रवैया रखता है। इस बीच रूस ने तो यहां तक कह दिया है कि युद्ध हुआ तो वह ईरान का साथ देगा। रूस ने अमेरिका को चेतावनी के अंदाज में कहा है कि यदि वह क्षेत्र में हिंसा को बढ़ावा देगा तो इसकी भरपाई मुश्किल हो जाएगी। अब देखना होगा कि रूस जिस मुश्किल की बात कर रहा है, उसमें कम से कम क्या हो सकता है। भयंकर स्थिति तो यह हो सकती है कि अमेरिकी और सहयोगी सेनाओं के हमले से परमाणु सम्पन्न ईरान भी प्रतिक्रिया में हमले करे। खाड़ी क्षेत्र होने के चलते ये हमले जहाजों और तेल ठिकानों पर हो सकते हैं। इस क्षेत्र में कच्चा तेल पूरी दुनिया को आर्थिक युद्ध के हालात में डाल सकता है। खुद ईरान तेल की आपूर्ति रोककर दुनिया को परेशान कर सकता है। फिर दुनियाभर के देशों को आपूर्ति किए जाने वाले तेल का पांचवां हिस्सा फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच होरमुज स्ट्रेट के रास्ते होकर जाया करता है। युद्ध के दौर में ईरान इस रास्ते को बंद कर दे तो बड़ी मुश्किल हो जायेगी।

तेल के रास्ते रुकने से पूरी अरब की खाड़ी का क्षेत्र युद्ध का क्षेत्र बन जायेगा। रूस ने पहले ही साफ कर दिया है कि युद्ध के हालात में वह ईरान के साथ होगा। तय है कि ऐसी स्थिति विश्वयुद्ध के ही हालात बनाएंगे। भारत जैसे जो देश इस युद्ध में सीधे शामिल नहीं होंगे, तेल संकट से तो जरूर गुजरेंगे। अमेरिका के संग बढ़ते रिश्तों के बीच ईरान से भी सम्बंध बनाए रखना भारत की मजबूरी है। बहरहाल, तनाव कम करने के प्रयास जारी हैं। ईरान और अमेरिका को भी युद्ध के खतरों का अंदाज है। देखना है कि इस बढ़ते संकट से बचाव के लिए अमेरिका, ईरान और सऊदी अरब किस हद तक संयम का परिचय देते हैं। बहुत कुछ इसी बात पर निर्भर करेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


 
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