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किरदारों में देश का आज और कल

09/07/2019

किरदारों में देश का आज और कल

प्रकाश के रे

हाल-फिलहाल प्रदर्शित तीन चर्चित फिल्में भारत, कबीर सिंह और आर्टिकल 15 की कहानियों और चरित्रों को देश के विकास क्रम के संघर्षों का द्योतक के रूप में देखा जाए, तो एक नए नजरिये से फिल्म को टटोला जा सकता है।

जू न में तीन चर्चित फिल्में भारत, कबीर सिंह और आर्टिकल 15 प्रदर्शित हुईं। पांच जून को थिएटरों में आने के बाद से ‘भारत’ दुनियाभर में 325 करोड़ से अधिक और देश में 200 करोड़ से अधिक कमा चुकी है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अली अब्बास जफर की इस फिल्म को दर्शक खूब पसंद कर रहे हैं। इससे सलमान खान के स्टारडम की ऊंचाई और बढ़ गयी है। संदीप रेड्डी वंगा द्वारा निर्देशित ‘कबीर सिंह’ 21 जून को रिलीज हुई थी और उसने भी 100 करोड़ की रेखा पार कर लिया है। इसमें मुख्य भूमिका शाहिद कपूर की है। महीने के आखिर में आयी अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15’ भी चर्चा में है। समीक्षकों ने इसकी भरपूर सराहना की है। फिल्म के नायक की भूमिका में आयुष्मान खुराना बतौर अभिनेता अपने को साबित कर चुके हैं। बीते दो-तीन सालों में उनकी अनेक फिल्में कामयाब रही हैं। बहरहाल, इन तीनों फिल्मों की कथा भले अलग- अलग हो तथा नायकों की भूमिकाएं भी मेल नहीं खाती हों, पर इनके जरिए हम भारतीय मानस को समझने का प्रयास तो कर ही सकते हैं।

इस कोशिश में 12 जुलाई को रिलीज हो रही विकास बहाल की ‘सुपर 30’ को भी रख सकते हैं। जफर की ‘भारत’ आजादी के बाद देश की यात्रा का चित्रांकन है। बिना किसी जातिगत या सामुदायिक पहचान का भारत अपनी नयी पहचान बनाता है। इस बनने में मेहनत, लगन, संघर्ष और सफलता है। भारत के पुराने सांस्कृतिक और मानवीय मूल्य उसके आधार हैं। उनके सहारे वह अपना व अपने परिवार का भविष्य संवारता है, जिसे देश के विभाजन ने तबाह कर दिया था। उसका संघर्ष अपना है, पर उसकी सफलता में सबका साझा है। ‘भारत’ का भारत भारत के आदर्शों का प्रतिनिधि है। लेकिन, नव-उदारवादी भारत में सम्पन्नता की गोदी में पैदा हुआ कबीर सिंह न केवल उन आदर्शों से अपरिचित है, बल्कि वह मनोविकारों से ग्रस्त है। स्वार्थ और हिंसा से उसका चरित्र और व्यवहार निर्धारित होता है। यह सिर्फ ‘भारत’ के आदर्शों का क्षरण भर नहीं है, बल्कि ‘मिलेनियल्स’ की संज्ञा पाये नयी पीढ़ी के अस्वस्थ और भ्रष्ट होने का संकेत भी है।
परंतु, इसी पीढ़ी का पुलिस अधिकारी अयान रंजन ‘आर्टिकल 15’ में स्वतंत्र भारत के आधारभूत ग्रंथ संविधान के अनुरूप सच्चाई और न्याय के लिए भी संघर्षरत दिखता है। इस संघर्ष में उसका हथियार कानून और उसकी वर्दी हैं। इसी फिल्म में अयान के बरक्स एक और ‘मिलेनियल’ संघर्ष में है। वह भी चाहता है कि संविधान के अनुरूप समता और सम्मान समाज के दलित-वंचित वर्ग को भी मिले। जिसके एक सदस्य के साथ कबीर सिंह सिर्फ़ एक गिलास तोड़ने के लिए मारने- पीटने लगता है, जिसकी तीन बच्चियों के साथ ‘आर्टिकल 15’ में कोई अंशु आर्या मजदूरी में तीन रुपये अधिक मांगने के ‘अपराध’ में हैवानियत पर उतर आता है। वह आंदोलन के रास्ते पर निकलता है और कानून का ही शिकार हो जाता है।

इस फिल्म में एक और ‘मिलेनियल’ ह सत्येंद्र, जो अयान की तरह सिविल सर्विसेज की परीक्षा नहीं पास कर पाता और एक साधारण सरकारी नौकरी में कुंठित और परेशान है। नौकरी और रोजगार के चक्कर में भारत भी परेशान होता है और दूर देश व समुद्र का फेरा लगाता है। अयान भारतीय पुलिस सेवा में चयनित तो हो जाता है, पर अपराध, गरीबी, जातिगत भेदभाव और वंचना से त्रस्त देहात में उसकी पोस्टिंग इसलिए होती है, क्योंकि कोई वरिष्ठ अधिकारी उससे नाराज है। अयान को यह पोस्टिंग पसंद नहीं आती, पर वह अपने कर्तव्य के निर्वाह की पूरी कोशिश करता है। कबीर सिंह किसी वर्तमान और किसी भविष्य से विलगित हो चुका है। सत्येंद्र भी। यह एक हिस्सा है युवा पीढ़ी का। दूसरा हिस्सा अयान, उसकी प्रेमिका अदिति और निषाद तथा कबीर के दोस्त शिवा जैसे युवाओं से बनता है। ये लोग भारत और उसके दोस्त विलायती का विस्तार हैं। भारत को अपने पिता गौतम कुमार की सीख और कर्तव्यों की परवाह है। कबीर और सत्येंद्र अवसाद, कुंठा में खो चुके हैं। यहां ‘सुपर 30’ के आनंद कुमार के संघर्ष और वंचित-बेहाल उनके छात्रों की उम्मीद को जोड़ें। कहानियां अपने पूरे रूप में कल्पना से गढ़ी जाती हैं, पर उनमें अपने समय का अक्स आसानी से टटोला जा सकता है। फिल्मों को ऐसे भी देखा जाना चाहिए।


 
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