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नए राजनीतिक प्रयोग का शुभारम्भ

03/06/2019

सतीश कुमार दीक्षित
मोदी सरकार-2 में दो सांसदों तेजस्वी सूर्या और प्रताप चन्द्र सारंगी की जीत ने भारतीय राजनीति में मेहनत, ईमानदारी और सादगी का जीवन जीने वालों का हौसला बढ़ा दिया है। राजनीति के पिछले पांच दशकों में ऐसा प्रतीत होने लगा था कि राजनीति केवल धनाढ्य और बाहुबलियों की दासी है। चुनावों में राजनीतिक दल ऐसे लोगों को ही प्रत्याशी बनाते रहे जो धनाढ्य और बाहुबली होते थे। उनका उद्देश्य रहता था कि धन और बाहुबल के सहारे ही अपने पक्ष में वोट कराया जा सकता है। वह समझते थे कि उन्हें ही अपना प्रत्याशी बनाना अच्छा रहेगा। इस प्रकार से अब तक राजनीति धनाढ्य और बाहुबलियों की भेंट चढ़ चुकी थी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा 2019 के चुनाव में कुछ अलग तरीके के प्रयोग किये। ऐसा लगता है कि वह राजनीति में स्वच्छ और स्वस्थ परम्परा की पुनर्स्थापना करना चाहते हैं। उन्हें यह दिखाना है कि राजनीति में धनाढ्य और बाहुबलियों की अपेक्षा समाज से जुड़े ऐसे लोगों को भी आगे लाना है जो जमीनी  कार्यकर्ता हो। वह कहीं न कहीं यह मानते हैं कि समाज से जुड़कर काम करने वालों को सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ी दिक्कतों का सही अनुभव होता है। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने अनुभव को जिस प्रकार से राजनीति में प्रयोग करते हैं, निश्चय ही उससे समाज को प्रेरणा लेनी होगी। उन्होंने देश की राजनीति में जातिवाद, धर्मवाद और तुष्टिकरण का कोई स्थान नहीं रखा। देश की 130 करोड़ जनता के सामने उन्होंने राष्ट्रवाद और विकास का मुद्दा रखा और लोकसभा 2019 में राजग को मिली भारी बहुमत की सफलता इस बात का प्रमाण है कि इस मुद्दे को जनता ने स्वीकार कर लिया है। अकेले भारतीय जनता पार्टी को 303 सीटें मिल जाने के कारण उसे बहुमत के लिए राजग के अन्य राजनीतिक दलों के समर्थन की जरूरत ही नहीं पड़ी। फिर भी पार्टी ने गठबंधन धर्म का पालन करते हुए जदयू और अपना दल को छोड़ मोदी सरकार-2 में सभी राजग दलों को प्रतिनिधित्व दिया है। जिन दो दलों का मोदी कैबिनेट में प्रतिनिधित्व नहीं हो सका, उनके अपने कारण हैं  
राजनीतिक विश्लेषण करने वालों ने यहां तक कहा है कि देश की राजनीति में एक बदलाव आया है। मोदी के विपक्षियों को अब यह स्वीकार करना होगा कि देश में जातिवाद, धर्मवाद और तुष्टिकरण करके लोकतन्त्र बचाने की बात नहीं की जा सकती है। जिन लोगों ने लोकतन्त्र को बचाने और मोदी को सत्ता से बाहर करने की बात की थी उन्हें देश की जनता ने नकार दिया। यही कारण है सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट होने के बाद भी मोदी को सत्ता से हिला न सका। लोकतन्त्र में मोदी की वापसी बेहद सम्मानजनक तरीके से हुई।
अब मोदी की उस राजनीति पर चर्चा की जाए जिससे नए राजनीतिक प्रयोग का शुभारम्भ हुआ। इसे समझने और सबक लेने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कर्नाटक के बेंगलुरु दक्षिण से 28 वर्षीय युवा सांसद तेजस्वी सूर्या और उड़ीसा के बालासोर लोकसभा सीट से 64 वर्षीय प्रताप चन्द्र सारंगी को संसद तक लाने के लिए एक नया प्रयोग किया है। इससे युवाओं में राजनीति के प्रति लगाव बढ़ेगा तथा सारंगी जी जैसा सरल और सादा जीवन जीने वालों के मन में राजनीति करने की अपेक्षा समाज सेवा से जुड़े रहने के प्रेरणा भी मिलती रहेगी। उनको यह विश्वास होगा कि समाज सेवा से जुड़े लोगों को भी सांसद बनने का और उस माध्यम से जन आकांक्षाओं को पूरा करने का अवसर मिलता है।
तेजस्वी सूर्या और प्रताप चन्द्र सारंगी के बारे में जानना जरूरी है। इस बार तेजस्वी सूर्या ने बेंगलुरु दक्षिण लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी बीके हरिप्रसाद को 3,31,192 मतों से हराया। इसी प्रकार उड़ीसा में बालासोर लोकसभा सीट से भाजपा के प्रताप चन्द्र सारंगी, बीजेडी के रवीन्द्र कुमार जेना को पराजित करके पहली बार संसद पहुंचे हैं। सूर्या अपने छात्र जीवनकाल से ही राष्ट्रवाद की मुख्यधारा से जुड़कर काम करने की लगन रखते थे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् में नये-नये प्रयोगों के साथ काम करते रहे। कानून की डिग्री लेने के बाद वकालत के पेशे में आ गए। कुशाग्र बुद्धि होने के साथ-साथ सोशल मीडिया से अधिक लगाव रखने वाले तेजस्वी सूर्या ने अपने बेडरूम को एक स्टूडियो का रूप दे दिया था, जहां से पाजीटिव विचारधारा की वीडियो अपलोड करके सोशल मीडिया के जाने-माने चेहरे के रूप में संगठन के सामने उभर कर आये तथा भाजपा के कई नेताओं के लिए अधिवक्ता के रूप में काम किया। उनकी प्रखर वाक्शक्ति ने उन्हें भाजपा युवा मोर्चा के महासचिव के पद तक पहुंचाया। तेजस्वी सूर्या को जब बताया गया कि भाजपा ने उन्हें बंगलूरू दक्षिण से सांसद प्रत्याशी घोषित कर दिया है तो उन्होंने ट्वीट करके लिखा था। 'ओ माय गॉड, विश्वास नहीं होता! दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र के पीएम और सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष ने 28 साल के एक व्यक्ति को बंगलूरू दक्षिण जैसी प्रतिष्ठित सीट के लिए चुना है। ये सिर्फ भाजपा में हो सकता है।'
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नजरें उड़ीसा के गांव गोपीनाथ, नीलगिरी में बेहद गरीब घर में जन्मे और समाज की सेवा में लिप्त रहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता प्रताप चन्द्र सारंगी पर भी टिकी थी। शायद वह उनकी सादगी और ईमानदारी के बेहद कायल रहे होंगे। प्रताप चन्द्र सारंगी सरल व सादा जीवन जीने वाले व्यक्ति उड़ीसा के मोदी के नाम से जाने जाते हैं। उनकी सादगी और ईमानदारी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सन् 2004 और 2009 में वह नीलिगिरी से विधायक निर्वाचित हुए थे। दस साल विधायक रहने के बाद आज भी एक कच्चे मकान और साईकिल से चलने वाले प्रताप चन्द्र सारंगी बालासोर सीट से बीजेडी के अरबपति प्रत्याशी रवीन्द्र कुमार जेना को परास्त करके सांसद बन गये हैं। हालांकि सारंगी को लोकसभा 2014 में कड़े मुकाबले में जेना से हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन उनकी सादगी, साधारण कार्यशैली से लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए क्योंकि मोदी सरकार-2 में उन्हें केन्द्रीय राज्यमंत्री बनाया गया है।
भारतीय जनता पार्टी द्वारा सूर्या और सारंगी को संसद तक पहुंचने का अवसर देना अन्य राजनीतिक दलों और समाज में संदेश देने के लिए बेहद जरूरी था। पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि राजनीति अब केवल धनाढ्य और बाहुबलियों की दासी नहीं रहेगी। नये भारत की राजनीति कुशाग्र बुद्धि, राष्ट्रवादी सोच एवं सादगी से जीवन जीने वाले समाजसेवियों के लिए नये द्वार खोल रही है। इस पहल के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का स्वागत करना चाहिए जिससे समाज और राजनीतिक रणनीतिकारों में एक नई रोशनी फैले।
हालांकि भविष्य में सभी सूर्या और सभी सारंगी जैसे लोगों को राजनीति में जगह देना संभव नहीं है। इसी प्रकार सभी युवाओं को नौकरी देना भी सम्भव नहीं। युवाओं को स्वरोजगार की ओर भी कदम रखने होंगे। लेकिन इन सभी क्षेत्रों में सूर्या और सारंगी जैसे विचार रखने से ही समाज का कल्याण होगा। जब समाज सुखी होगा तो देश खुशहाल रहेगा। इसलिए सामाजिक हित के लिए सरकार से ज्यादा इच्छा नहीं रखनी चाहिए। बल्कि समाज के लोगों को ही सोचना चाहिए कि अपना व्यवहार ऐसा प्रस्तुत करें जिससे लोगों में लोक मंगल की भावना बने।
(लेखक पत्रकार हैं।) 


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