लेख

Blog single photo

कांग्रेस को अपनी हार नहीं, भाजपा की जीत की समीक्षा करनी चाहिए

31/05/2019

डॉ. नीलम महेंद्र
म चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए बहुत बुरी खबर लेकर आए। जैसा कि अपेक्षित था, देश की सबसे पुरानी पार्टी में भूचाल आ गया। एक बार फिर हार की समीक्षा के लिए कमेटी का गठन हो चुका है। पार्टी में इस्तीफों की बाढ़ आ गई है। खबर है कि खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस्तीफा देने पर अड़े हैं। लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता से लेकर आम कार्यकर्ता तक राहुल गांधी और उनके नेतृत्व में अपना विश्वास जता रहे हैं। यह अच्छी बात है कि ऐसे कठिन दौर में भी किसी संगठन का अपने नेतृत्व पर भरोसा कायम रहे। ऐसा कम देखने को मिलता है कि लगातार मिलने वाली असफलताओं के बावजूद उस संगठन के बड़े नेता से लेकर आम कार्यकर्ता तक अपने नेता के साथ मजबूती से खड़े हों। सभी लोग राहुल को यह समझाने में लगे हैं कि उन्होंने चुनावों में बहुत मेहनत की। चुनावों में पार्टी की हार क्यों हुई उसकी समीक्षा की जाएगी। वे मन छोटा न करें। पार्टी हर हाल में उनके साथ है। इससे पहले भी 2014 के लोकसभा चुनाव रहे हों या फिर उसके बाद होने वाले विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव, भाजपा लगातार अपने कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को चरितार्थ करने में लगी थी। राज्य दर राज्य सत्ता कांग्रेस के हाथों से फिसलती जा रही थी। महाराष्ट्र, हरियाणा, आंध्रप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, असम जैसे राज्य जहां कांग्रेस सत्ता में थी, नकार दी गई। गोवा, उत्तरप्रदेश, बिहार, गुजरात जैसे राज्य जहां सत्ता में नहीं थी, वहां भी नकार दी गई। जिन तीन राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में अभी मात्र पांच महीने पहले सत्ता में आई थी, वहां भी इन चुनावों में जनता का भरोसा नहीं जीत पाई। इन परिस्थितियों में राहुल का इस्तीफा देने की पेशकश करने और कांग्रेस का उनमें एक बार फिर विश्वास जताना न सिर्फ अत्यंत निराशाजनक है, बल्कि कांग्रेस पार्टी के भविष्य के लिए भी घातक है। दरअसल, आपसी गुटबाजी के चलते गांधी परिवार के ही किसी सदस्य के हाथों कांग्रेस की कमान सौंपना कांग्रेस की आज की मजबूरी है। लेकिन यह भी सच है कि सोनिया गांधी और कांग्रेस के बड़े नेताओं का कांग्रेस को मजबूर बनाने में काफी अहम योगदान रहा है। कांग्रेस की ऐसी दुर्गति हो जाएगी, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। इसलिए आज एक ऐसे शख्स के हाथों में पार्टी की कमान देना जिसके पास गांधी परिवार का सदस्य होने के अलावा और कोई योग्यता न हो पार्टी की मजबूरी बन गई है। आसन्न चुनाव परिणामों ने राहुल की योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगा दिए।
अब राहुल नाराज बताए जा रहे हैं। पार्टी के कुछ नेताओं को छोड़कर वे किसी से नहीं मिल रहे हैं। वे पार्टी के कुछ नेताओं के पुत्र मोह को पार्टी की हार की वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि इन नेताओं ने अपने स्वार्थ को पार्टी हित से ऊपर रखा। वैसे इस विषय में उनका अपनी मां सोनिया गांधी के बारे में क्या विचार है, यह जानना रोचक होगा। अगर सचमुच कांग्रेस अपनी वर्तमान स्थिति से दुखी है और इन परिस्थितियों से उबरना चाहती है तो सबसे पहले उसे अपनी सोच और अप्रोच दोनों बदलनी होगी। आदमी जो चीज हासिल करना चाहता है उसे उस पर फोकस करना चाहिए। सबसे बड़ी गलती जो कांग्रेस बार-बार करती आ रही है कि वो जीतना चाह रहे हैं लेकिन अपने प्रतिद्वंद्वी की जीत के कारणों की बजाय अपनी हार की समीक्षा करते हैं। कांग्रेस तो यह समीक्षा 1991 से लगभग लगातार ही करती आ रही है। राजीव गांधी की हत्या के बाद भी कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया था। चाहे 1991 की नरसिम्हा राव की सरकार हो या 2004 और 2009 की यूपीए की सरकार हो, कांग्रेस अपने दम पर पूर्ण बहुमत 1984 के बाद कभी भी हासिल नहीं कर पाई। इस बीच वो कई बार हारी। 2014 तो कांग्रेस के इतिहास की सबसे बुरी हार थी। अब 2019 का नतीजा सबके सामने है। जाहिर है पार्टी ने हर बार हार के कारणों की समीक्षा की होगी। सोचने वाली बात है कि इतनी समीक्षाओं के बाद भी पार्टी का प्रदर्शन क्यों नहीं सुधर रहा।
अगर सच में कांग्रेस अपनी स्थिति सुधारना चाहती है तो सर्वप्रथम उसे स्वयं को चाटुकारों से मुक्त करना होगा। उसे परिवारवाद के दीमक से मुक्त होना होगा। जनता की समस्याओं के लिए सड़कों पर उतरना होगा और भविष्य के लिए नए चेहरे तैयार करने होंगे। लेकिन बड़ा सवाल यह कि क्या कांग्रेस ऐसा कर पाएगी?
दरअसल, 1952 में जब आजाद भारत का पहला लोकसभा चुनाव हुआ था तब से लेकर 1971 तक के चुनावों में कांग्रेस लगभग जीती हुई बाजी ही खेलती थी। देखा जाए तो ये चुनाव कांग्रेस के लिए लगभग एकतरफा चुनाव होते थे। देश की आजादी के लिए एकता जरूरी थी। इसलिए अपनी अलग-अलग विचारधाराओं के बावजूद देश की आजादी के लिए लड़ने वाले लगभग सभी संगठनों ने राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस में विलय करके अपनी पहचान तक से समझौता कर लिया था। इसलिए 1947 में जब कांग्रेस के नेतृत्व में देश आजाद हुआ और महात्मा गांधी की इच्छानुसार जवाहरलाल नेहरु देश के पहले प्रधानमंत्री बने तो देश में यह संदेश गया कि कांग्रेस ने ही देश को आजाद कराया है। जनमानस के इसी मनोविज्ञान का फायदा कांग्रेस को 1971 तक मिला। उधर, समय के साथ विपक्ष मजबूत होता जा रहा था। 1975 में कांग्रेस द्वारा देश पर थोपा गया आपातकाल कांग्रेस की सत्ता पर कमजोर होती जा रही उसकी पकड़ का सबूत था। कहना न होगा कि 1977 में बुरी तरह हारने वाली कांग्रेस जब 1980 में फिर एक बार जीती तो उसमें कांग्रेस की योग्यता से ज्यादा विपक्षी दलों का योगदान था। इसी तरह 1985 में कांग्रेस की जीत में इंदिरा गांधी की हत्या का योगदान था। लेकिन 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व में 400 से अधिक सीटें जीतने वाली कांग्रेस उसके बाद फिर कभी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाई। यहां तक कि राजीव गांधी की हत्या के बाद भी नहीं। यानी जब तक खेल एकतरफा था, कांग्रेस जीतती रही लेकिन जब-जब सामने विपक्ष मजबूत और एक होकर आया, वो हारी है।
इसलिए आज अगर राहुल कांग्रेस को मजबूत करना चाहते हैं तो सबसे पहले उन्हें खुद को मजबूत करना होगा। वे इस बात को समझ लें कि भले ही वो मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हों लेकिन उनके सामने चुनौतियां नेहरू से अधिक हैं। तब कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी न तो सक्षम थे और न ही उनमें एकता थी। लेकिन आज राहुल का जिनसे सामना है वो एक भी हैं और सक्षम भी। यह वे दो बार साबित कर चुके हैं वो भी पहले से अधिक ताकत के साथ। 
अगर राहुल कांग्रेस को वाकई में मजबूत करना चाहते हैं तो उनके नाम में जो गांधी शब्द लगा है, उसे चरितार्थ करना होगा। गांधीजी ने अफ्रीका से लौटने पर देश के स्वतंत्रता आंदोलन को शुरू करने से पहले पूरे भारत का भ्रमण किया था वो भी ट्रेन के तृतीय श्रेणी के डिब्बे में ताकि वे असली भारत को जान पाएं। राहुल को भी अगर लोगों के दिल में जगह बनानी है तो उन्हें भारत को समझना होगा। यहां के जनमानस का मन पढ़ना होगा। सिर्फ हवाई किला बनाने, हेलीकॉप्टर से उड़ान भरने और हाथ हिलाने से जनता के दिल में जगह नहीं बनेगी। राजनीति में विदेश से हासिल डिग्री विरोधियों का मुंह तो बन्द कर सकती है लेकिन वोट नहीं दिलवा सकती। एसी कमरों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके आरोप तो लगाए जा सकते हैं लेकिन उन आरोपों पर देश की विश्वसनीयता नहीं जीती जा सकती। भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोपों से घिर चुकी कांग्रेस को लोगों का बरोसा जीतने के लिए हाड़तोड़ मेहनत करना होगा। भ्रष्टाचार पर अपना कड़ा रुख देश को दिखाना होगा। 
(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
Top