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यक्ष प्रश्नों के विलक्षण उत्तर: दशावतार

18/08/2019

यक्ष प्रश्नों के विलक्षण उत्तर: दशावतार


जीवन, मृत्यु और इन दोनों के मध्य विद्यमान संपूर्ण संसार के अनेक अनुत्तरित प्रश्न वर्तमान में भी जिज्ञासा और रहस्य के आवरण में लिपटे हुए हैं। किसी भी प्रश्न का समाधान दो ही प्रकार से हो सकता है, तर्क या तथ्य से अथवा आस्था व विश्वास से? तर्क या तथ्य जहां विज्ञान सम्मत होते हैं, वहीं आस्था एवं विश्वास अध्यात्म या धर्म के आधारभूत स्तंभ होते हैं। यह तथ्य रेखाकंन योग्य है कि अध्यात्म या धर्म प्राय: अपनी आस्था या विश्वास को विज्ञान सम्मत स्थापित करने का प्रयास करते रहते हैं, जबकि विज्ञान कदाचित धार्मिक अथवा आध्यात्मिक होने को स्वयं के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न सदृश स्वीकारता है।

 पुस्तक-नाम              दशावतार
 लेखक                     प्रमोद भार्गव
 मूल्य                      300 रुपये
 प्रकाशक का नाम         

प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3,
अंसारी रोड, दरियागंज
नई दिल्ली-110002

‘दशावतार’ का अध्ययन इस दृष्टि से अत्यंत रोमांचक अनुभूत होता है कि शताब्दियों पूर्व सनातन हिंदू धर्म के अनेक ग्रंथों में जीवन व संसार के कई रहस्य उद्घाटित हुए हैं। इन पौराणिक मिथकों और कथाओं के रहस्यों को प्रमोद भार्गव ने ऐतिहासिक कालक्रम में सुचारु व रोचक शैली में जिस प्रकार अनावृत किया है, वह साहित्य सृजन का अद्भुत रूप है। ‘दशावतार’ दो शब्दों, दस-अवतार का संयुक्त रूप है। आॅक्सफर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्धारा प्रकशित संस्कृत-अंग्रेजी शब्द कोश में ‘अवतार’ का अर्थ लिखा है ‘उतरना’। अर्थात ‘अवतार’ का प्रत्यक्ष अर्थ है, इस मृत्युलोक में किसी श्रेष्ठतम स्थान से उतरना अथवा उपस्थित होना। सनातन धर्म के अनुसार जब-जब इस पृथ्वी पर अनाचार, अत्याचार व अन्याय बढ़ता है, तब-तब इन दारुण स्थितियों से प्राणियों को मुक्त करने के लिए परमपिता परमेश्वर स्वयं मानव शरीर धारण करते हैं, अपने वंश को मनुष्य शरीर के रूप में पृथ्वी पर भेजते हैं।

भगवत पुराण के अनुसार विष्णु के अनेक अवतार हुए हैं, परंतु उनके दस अवतारों को विशेष अवतार स्वीकारा गया है। इन दस अवतारों का वर्णन भगवत पुराण, गरुढ़ पुराण, अग्निपुराण और महाभारत में विस्तार से किया गया है। सुखसागर के अनुसार भगवान विष्णु के 24 अवतार हुए हैं। सिखों के दसवें गुरू, गुरू गोविंद सिंह द्धारा लिखित ‘दशम-ग्रंथ’ में भी विष्णु के 24 अवतारों का वर्णन है। परंतु प्रमुख रूप से विष्णु के दस अवतार ही लोक में मान्य हैं। पुस्तक में प्रथम अवतार ‘मत्स्यावतार’ का सर्वप्रथम वर्णन है। सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रह्मा, सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार का वर्णन इस अध्याय में बहुत रोचक ढंग से किया गया है।

जल से ही जीवन की उत्पत्ति हुई है, मत्स्यावतार से इस वैज्ञानिक तथ्य की भी पुष्टि होती है। इस अध्याय में प्रकृति और अध्यात्म के संयोजन की अद्भुत साहित्यिक प्रस्तुति हुई है। द्वितीय अध्याय में कूर्मावतार का वर्णन है। कूर्मावतार से तात्पर्य कच्छप या कछुआ अवतार से है। कूर्मावतार के प्रसंग में परमशक्ति की उत्पत्ति भी हुई है।… इसी (परमशक्ति) के सहयोग से ‘मैं (भगवान विष्णु) सृष्टि की रचना, पालन व संहार करता हूं। वैसे भी सृजन तभी संभव है, जब स्त्रीलिंग और पुल्लिंग में संसर्ग संभव बने, (पृ. 49-50) यह दृष्टांत सृष्टि के निर्माण एवं जीवन की रचना की, निसंदेह तार्किक प्रस्तुति है। इसी प्रकार विष्णु के सारे अवतारों का क्रमश: चित्रण ‘दशावतार’ में किया गया है। पुस्तक की एक उत्कृष्ट विशिष्टता यह है कि धार्मिक आख्यानों में दृष्टांतों, घटनाओं और कथाओं के उद्देश्यों, मंतव्यों और साक्ष्यों की सामायिकता को बहुत तार्किक ढंग से स्थापित किया गया है।

धर्म, धार्मिक कथाओं और घटनाओं को तोड़- मरोड़ कर उनके जो संकीर्ण अर्थ व स्वरूप प्रदान करने का कुत्सित प्रयास किया जाता रहा है, उस पाखण्ड को भी लेखक ने तार्किक ढंग से निर्जीव किया है। एक अंश दृष्टव्य है, ‘‘… मैं (परशुराम) जड़ता और शोषण के विरुद्ध संघर्षरत रहते हुए समतावादी समाज के निर्माण का नेतृत्वकर्ता था, किंतु दुर्भाग्यवश भविष्य की पीढ़ियों ने मेरे आचरण, सिद्धांत, व्यवहार और संघर्ष से प्रेरणा लेने की बजाय मेरी आरती उतारना शुरू कर दिया। अब तो लोगों ने मेरे नाम पर सेनायें भी बना लीं। इन कथित सेनाओं से जातीय विद्वैष के बढ़ने के अलावा किसी का भला नहीं हो रहा है।’’ इसी प्रकार अन्य अवतारों का भी तथ्यपरक चित्रण है।

पुस्तक 534 पृष्ठों में समाया हुआ एक बड़ा उपन्यास है। यह लेखक के शोध एवं श्रम का साक्षी है। प्रभावशाली आत्म-कथात्मक श्ैली में लिखे उपन्यास में अनेक पृष्ठ अंधविश्वास, आंडबर, पाखंड और रुढ़िवादिता पर सशक्त प्रहार करने में सफल हुए हैं। कतिपय मुद्रण संबंधी त्रुटियां दिखती हैं। पुस्तक के अंत में अनेक सन्दर्भ ग्रंथों की सूची दी गई है। उन्हीं पुस्तकों के अनेक श्लोक और ऋचाओं को संदर्भ के रूप में ‘दशावतार’ में प्रस्तुत किया गया है। परंतु प्रस्तुत श्लोक किस ग्रंथ के किस पृष्ठ से उद्धृत किए गए हैं, यदि इसका भी उल्लेख होता तो पाठकों को और सुविधा होती।


 
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