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रंजन गोगोई का अमर्यादित विरोध

01/04/2020

रंजन गोगोई का अमर्यादित विरोध

बनवारी

राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा में मनोनीत किए जाने पर विपक्षी दलों ने एक अनुचित और अनावश्यक विवाद खड़ा कर दिया है। संविधान के अनुच्छेद 80 के अंतर्गत राष्ट्रपति को विभिन्न क्षेत्रों के 12 लोगों को उच्च सदन में मनोनीत करने का अधिकार है। यह सही है कि राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाने वाले व्यक्तियों का चुनाव केंद्र सरकार ही करती है। लेकिन केवल इसी आधार पर उसके पीछे सरकार का कोई निहित स्वार्थ ढूंढना सही नहीं है। रंजन गोगोई के मामले में तो विपक्ष ने संसदीय व्यवहार की सभी मर्यादाओं का उल्लंघन कर दिया। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस केवल केंद्र सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं रही। उसने रंजन गोगोई को राज्यसभा का मनोनयन स्वीकार करने के लिए लज्जित करने की भरपूर कोशिश की। रंजन गोगोई जब राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेने के लिए आगे बढ़े तो विपक्षी सदस्यों ने शर्म -शर्म के नारे लगाए। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने तो उन्हें अपमानित करते हुए कहा कि उन्हें कोई शर्म नहीं रह गई है और उन्होंने पूरी न्यायपालिका का गौरव घटा दिया है।

कांग्रेस ने जस्टिस गोगोई को राज्यसभा में मनोनीत किए जाने को गंभीर, अभूतपूर्व और संविधान के मूल स्वरूप पर आघात करने वाला निर्णय बताया है। क्या वास्तव में इससे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच की विभाजक रेखा समाप्त हो गई है?

संसद में किसी के शपथ ग्रहण के समय ऐसा अशोभन व्यवहार पहली ही बार देखने को मिला। सदन के बाकी सदस्यों को निश्चय ही इस अशोभन व्यवहार की निंदा करनी चाहिए थी। अपना विरोध मुखर करने के लिए समाजवादी  पार्टी के सदस्यों को छोड़कर बाकी विपक्षी सदस्यों ने सदन से वाक्आउट कर दिया। सभापति वेंकैया नायडू ने विपक्ष के इस व्यवहार को अनुचित बताया। सरकार की ओर से विधि मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने स्थिति संभालने की कोशिश की और कहा कि रंजन गोगोई का मनोनयन राज्यसभा की महती परंपरा का अंग है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के महत्वपूर्ण लोग राज्यसभा का अंग बने हैं। उनके सदन में आने से न्यायपालिका से संबंधित बहुत से विषयों को सही परिप्रेक्ष्य प्राप्त होगा।

रंजन गोगोई ने विपक्ष के विरोध पर केवल यह टिप्पणी की कि बाद में वे मेरा स्वागत करेंगे। रंजन गोगोई असम के एक प्रतिष्ठित राजनैतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता केशव चंद्र गोगोई अल्पावधि के लिए कांग्रेस की ओर से असम के मुख्यमंत्री रहे थे। उनके भाई अंजन कुमार गोगोई भारतीय वायु सेना में एयर मार्शल रहे। रंजन गोगोई 13 महीने तक सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश रहे। अपने कार्यकाल में वे अनेक पीठों का अंग रहे, जिन्होंने महत्वपूर्ण फैसले सुनाए। पर विपक्षी दल उनके दो फैसलों से पूर्वग्रह ग्रस्त दिखाई देते हैं। उन्होंने राफेल संबंधी याचिका में कोई सार नहीं पाया और उनकी पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा किए गए इस सौदे को निर्दोष करार दिया था।

विपक्ष को उससे भी अधिक परेशानी उनके अयोध्या संबंधी विवाद के निपटारे से है। लंबे समय से चले आ रहे अयोध्या विवाद के सर्वसम्मत निपटारे के लिए उनको और पीठ के अन्य सभी सदस्यों को बधाई दी जानी चाहिए। लेकिन कांग्रेस सदा इस विवाद को तूल देकर हिन्दू-मुस्लिम खाई चौड़ी करती रही है। इस विवाद को बनाए रखकर अल्पसंख्यक वर्ग में असुरक्षा पैदा करते हुए अपनी वोट बैंक की राजनीति में निमग्न रहने वाली कांग्रेस अकेली पार्टी नहीं थी। इनमें से कोई नहीं चाहता था कि अयोध्या विवाद का कोई सर्वसम्मत हल निकल आए। केवल विपक्षी दल ही नहीं देश में वाममार्गी विचारों का एक बड़ा बौद्धिक और राजनैतिक वर्ग पैदा हो गया है, जो हर मामले में नकारात्मक होकर सोचता है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के नाते रंजन गोगोई ने अयोध्या विवाद का सर्वसम्मत हल निकालने में जो सकारात्मक भूमिका निभाई, उसके लिए समाज में उनकी काफी प्रशंसा हुई थी। उनकी इस प्रशंसनीय भूमिका को औपचारिक स्वीकृत देने के लिए ही उन्हें राज्यसभा में राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत करने का निर्णय लिया गया लगता है।

यह उचित ही नहीं आवश्यक भी था। उनके मनोनयन पर जो लोग विवाद खड़ा कर रहे हैं, उन्होंने लोकतंत्र की एक अत्यंत नकारात्मक अवधारणा बना ली है। उन्हें लगता है कि हर मामले में सरकार की आलोचना करना ही लोकतंत्र है। यह दलील देना कि रंजन गोगोई को राज्यसभा में मनोनीत करके केंद्र सरकार ने उन्हें उन फैसलों के लिए पुरस्कृत किया है, यह बात उनके साथ अन्याय ही नहीं है बल्कि उसके पीछे एक अत्यंत खतरनाक मानसिकता दिखाई देती है। अगर इस तरह की तर्कपद्धति स्वीकार्य हो जाए तो कोई भी जज सरकार के पक्ष में फैसला सुनाने से परहेज करेगा। सबसे दुखद बात यह है कि रंजन गोगोई का विरोध करते हुए सार्वजनिक जीवन की शिष्टता और लोकतंत्र की मयार्दा का भी ध्यान नहीं रखा गया। रंजन गोगोई के एक पूर्व सहयोगी जज ने घोषित कर दिया कि उनके राज्यसभा में मनोनयन से लोकतंत्र का एक और स्तंभ ढह गया। यह टिप्पणी अविचारित और अशोभनीय टिप्पणी थी।

उससे रंजन गोगोई पर ही आक्षेप नहीं आया, पूरी न्यायपालिका पर आक्षेप आया। क्या जस्टिस लोकुर को लगता है कि अब न्यायपालिका अपने विवेक से निर्णय करने लायक नहीं रह जाएगी। सब जज सरकारी प्रलोभनों की आस लगाए बैठे रहेंगे और सरकार को प्रिय लगने वाले फैसले देंगे? कांग्रेस अब तक सबसे अधिक समय देश पर शासन करती रही है और जिसने अपने राजनैतिक स्वार्थ के सामने कभी किसी संवैधानिक संस्था की मर्यादा लांघने में हिचक नहीं की, उसे अपना विरोध जताते हुए कुछ तो अपने अतीत का स्मरण करना चाहिए था। यह पहला अवसर नहीं है जब न्यायपालिका के किसी सेवानिवृत्त व्यक्ति को कोई राजकीय पद दिया गया हो। बहरुल इस्लाम के मामले में तो सभी मर्यादाएं ताक पर रख दी गईं थीं। वह तो सीधे-सीधे न्यायपालिका के एक सदस्य का राजनैतिक दुरुपयोग था। रंगनाथ मिश्रा के मामले में भी उतनी मर्यादा नहीं रखी गई थी, जितनी मोदी सरकार ने रखी है।

ऐसे उदाहरणों की लंबी सूची बनाई जा सकती है। अगर कांग्रेस को सचमुच ऐसा लगता है तो सबसे पहले उसे अब तक के अपने ऐसे सभी निर्णयों के लिए पूरे देश से माफी मांगनी चाहिए। उसे अपने उन सभी संविधान के मूल स्वरूप पर आघात करने वाले निर्णयों के लिए कुछ प्रायश्चित भी घोषित करना चाहिए। यह विचित्र व्यवहार है कि कांग्रेस जो करे वह सही और उसके विरोधी जो करे वह अनुचित। राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में रंजन गोगोई का मनोनयन दो कारणों से हुआ लगता है। एक कारण तो संभवत: यह है कि केंद्र सरकार अयोध्या विवाद के उचित और सर्वसम्मत निपटाने में उनकी भूमिका के लिए उन्हें सम्मानित करना चाहती थी। दूसरा कारण व्यावहारिक हो सकता है। इस समय सबसे बड़ा राजनैतिक विवाद नागरिकता संशोधन कानून को लेकर है। इसका विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि अपने आपमें यह कानून भले मुस्लिम विरोधी न हो, पर उसे राष्ट्रीय नागरिक पंजी से जोड़कर देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि मोदी सरकार अल्पसंख्यकों के प्रति दुर्भावना रखती है और उन्हें देश से बाहर कर देना चाहती है। केंद्र सरकार यह कह चुकी है कि राष्ट्रीय नागरिक पंजी को पूरे देश में लागू करने की अभी कोई योजना नहीं है।

रंजन गोगोई 13 महीने तक सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश रहे। अपने कार्यकाल में वे अनेक पीठों का अंग रहे, जिन्होंने महत्वपूर्ण फैसले सुनाए। पर विपक्षी दल उनके दो फैसलों से पूर्वग्रह ग्रस्त दिखाई देते हैं।

पर सरकार के भीतर और बाहर बहुत लोग यह मानते हैं कि अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए अन्य सभी देशों की तरह भारत को भी एक समय यह करना पड़ेगा। असल में असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी कांग्रेस शासन में 1951 में शुरू की गई थी। जवाहर लाल नेहरू की उसमें मुख्य भूमिका थी। पर राजनैतिक कारणों से उस पर ठीक से अमल नहीं हुआ। 2013 में रंजन गोगोई और फली नरीमन की पीठ के सामने यह मामला आया था और पीठ के निर्देश पर ही असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी को अद्यतन करने की प्रक्रिया आरंभ हुई थी। सर्वाेच्च न्यायालय की पहल के बावजूद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने उसे मोदी सरकार के विरुद्ध एक मुहिम का रूप दे दिया। देश के मुसलमानों में असुरक्षा पैदा की गई और नागरिकता संशोधन कानून जैसी निर्दाेष पहल को भी विवादास्पद बना दिया गया, जिसके बारे में अब तक सर्वदलीय सहमति दिखाई देती थी। केंद्र सरकार राष्ट्रीय नागरिक पंजी के बारे में समुचित स्पष्टीकरण देने और राजनैतिक सहमति बनाने के लिए आगे कभी रंजन गोगोई का उपयोग कर सकती है। इसी तरह नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी को लेकर फैले भ्रमों के निवारण के लिए भी उनका सहयोग लिया जा सकता है।


 
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