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पाकिस्तान की हताशा

12/09/2019

पाकिस्तान की हताशा

रेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ पूर्ण रूप से एकीकरण करके कश्मीर विवाद की जड़ों में मट्ठा डाल दिया है। भारत के इस एक कदम ने कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का मुद्दा बनाए रखने का आधार समाप्त कर दिया है। अब तक भारत पाकिस्तान से कश्मीर समस्या के हल के लिए बातचीत की कोशिश करता रहा। पाकिस्तान के लिए विवाद का मुद्दा कश्मीर का केवल वह भाग था, जो भारत में है। अब भारत उसके बारे में कोई बात करने से इनकार कर सकता है। जैसा कि हाल ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, अब कश्मीर पर जब भी बात होगी, वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के बारे में ही होगी। मोदी सरकार के कुछ मंत्री यह भी संकेत देते रहे हैं कि भारत का लक्ष्य पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को वापस लेना होगा। अभी यह बात अतिरंजित लग सकती है, लेकिन पाकिस्तान उसे लेकर आशंकित है। पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सों को लेने के लिए भारत आगे कभी दबाव बना सकता है। इन्हीं सब आशंकाओं के बीच पाकिस्तान कश्मीर समस्या को एक अंतरराष्ट्रीय विवाद बनाने की हर कोशिश में लगा है।

भारत ने कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को समाप्त करके पाकिस्तान के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। अब तक पाकिस्तान के सभी शासक कश्मीर को अपना सबसे बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनाए रहे। इसी मुद्दे के आधार पर वे अपने शासन की सब असफलताओं से अपने लोगों का ध्यान हटाते रहे थे।

पाकिस्तान की इमरान सरकार एक कमजोर सरकार है। सेना की वैसाखी का इस्तेमाल करके वह सत्ता में आई है। उस पर सेना का भी काफी दबाव है कि कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने के लिए हरसंभव कोशिश की जाए। भारत के अनुच्छेद 370 समाप्त करने के फौरन बाद पाकिस्तान ने काफी आक्रामक नीति अपनाने की कोशिश की। उसने भारत के साथ हो रहे द्विपक्षीय व्यापार को स्थगित कर दिया। इसके बाद उसने समझौता एक्सप्रेस स्थगित की। भारत के राजदूत को पाकिस्तान छोड़ने के लिए कहा गया। भारत ने शुरू में अपनी तरफ से तनाव घटाने के ही प्रयत्न किए। राजनयिक सूत्रों से पाकिस्तान को यह समझाने की कोशिश की कि यह आक्रामकता अनावश्यक है। जब पाकिस्तान का रुख नहीं बदला तो भारत ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप कदम उठाए। दोनों देशों के बीच परिवहन के अन्य व्यवस्थाओं को भी स्थगित कर दिया गया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत का रुख अधिक कड़ा हुआ। चीन की सहायता से पाकिस्तान सुरक्षा परिषद के बंद कमरे में अनौपचारिक बैठक करवाने में सफल हो गया, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। पाकिस्तान ने मुस्लिम देशों को बीच में डालने की कोशिश की।

इस्लामिक देशों के संगठन ने कश्मीर को लेकर अपनी चिंताएं प्रकट अवश्य कीं, ऐसा वह पहले भी करता रहा है। लेकिन इससे अधिक कुछ करने के उसने संकेत नहीं दिए। संयुक्त अरब अमीरात ने खुलकर भारत का पक्ष लिया। पाकिस्तान को तुर्की और सऊदी अरब से बहुत आशाएं थीं। तुर्की सदा पाकिस्तान का पक्ष लेता रहा है। लेकिन इन दोनों देशों ने औपचारिक चिंता जताने तक ही अपने को सीमित रखा। ईरान ने भी केवल यह कहा है कि वह कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति पर निगाह टिकाए हुए है। जिस देश में एक दमनकारी मजहबी शासन हो, वह मानवाधिकारों की दुहाई दे, यह अविश्वसनीय ही लगेगा। पाकिस्तान ने अमेरिका को बीच में डालने की काफी कोशिश की है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को अंतरराष्ट्रीय विवादों में बीच में पड़कर समझौता करवाने की काफी उतावली रहती है। उन्हें अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की समझ बहुत कम है, समझौता करवाने की अपनी शक्ति पर भरोसा काफी ज्यादा है। काफी समय से अपने दामाद को वे इजराइल और फिलिस्तीनियों के बीच समझौता करवाने में लगाए हुए हैं।

पाकिस्तान ने अमेरिका को बीच में डालने की काफी कोशिश की है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को अंतरराष्ट्रीय विवादों में बीच में पड़कर समझौता करवाने की काफी उतावली रहती है। उन्हें अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की समझ बहुत कम है, समझौता करवाने की अपनी शक्ति पर भरोसा काफी ज्यादा है। काफी समय से अपने दामाद को वे इजराइल और फिलिस्तीनियों के बीच समझौता करवाने में लगाए हुए हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच पंच बनने की भी ट्रम्प ने उतावली में वैसी ही नादानी भरी घोषणा कर दी। जब भारत की ओर से दो टूक जवाब मिला कि भारत कश्मीर के मामले में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं देखता तो ट्रम्प कुछ दिन शांत रहे। लेकिन इधर फिर उनकी उतावली दिखाई देने लगी है। वे इमरान खान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात कर चुके हैं। पाकिस्तान को संयत रहने और स्थिति न बिगाड़ने की नसीहत भी दे चुके हैं, लेकिन बीच-बीच में यह बयान भी देते रहते हैं कि वे दोनों देशों के बीच बढ़ते जा रहे तनाव पर निगाह रखे हुए हैं। स्थिति विस्फोटक है। दोनों देश राजी हों तो वे उनके बीच समझौता करवाने की कोशिश करेंगे। पाकिस्तान स्थिति को भयावह दिखाने की पूरी कोशिश कर रहा है। उसके अनुसार तनाव बढ़ता जा रहा है और उससे युद्ध की आशंका पैदा हो गई है। अब तक वह अनेक बार कह चुका है कि दोनों देश नाभिकीय शक्ति से संपन्न हैं। उनके बीच फिर से युद्ध छिड़ा तो विश्व शांति के लिए गंभीर स्थिति पैदा हो जाएगी। लेकिन ट्रम्प की लगातार बदलते रहने वाली भाषा को छोड़ दें तो विश्व के अन्य देश पाकिस्तान की इस आशंका को गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं हैं।

विश्व शक्तियों में से रूस ने खुलकर भारत का समर्थन किया है। फ्रांस विवाद को द्विपक्षीय वार्ता से ही सुलझाने का हामी है। लेकिन उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पेरिस में उपस्थिति के बावजूद यह भी कहा कि वह कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति पर नजर रखे हुए है। ब्रिटेन अब तक कुछ भी कहने से परहेज करता रहा है। पाकिस्तान अमेरिका पर दबाव डालने के लिए अफगानिस्तान समस्या की आड़ ले रहा है। उसने कई बार अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान को यह समझाने की कोशिश की है कि भारत सीमा पर तनाव बढ़ा रहा है। उसे मजबूर होकर अपनी सेनाओं की उपस्थिति पूर्वी मोर्चे पर बढ़ानी पड़ सकती है। उसके लिए उसे पश्चिमी मोर्चे पर अपनी सैनिक उपस्थिति कम करनी होगी। इससे तालिबान पर दबाव कम हो जाएगा। ऐसी हालत में अमेरिका और तालिबान के बीच चल रही बातचीत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अमेरिका तालिबान से शांतिवार्ता के लिए पाकिस्तान पर काफी निर्भर है। अमेरिकी प्रशासन इस पाकिस्तानी तर्क से कुछ प्रभावित भी दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति ट्रम्प इसी कारण कश्मीर को लेकर दोनों पक्षों से बात करने की घोषणाएं करते रहते हैं।

आज भारत एक बड़ी आर्थिक शक्ति है। मुस्लिम देश भी उससे अच्छे संबंध बनाए रखने में अपना हित देखते हैं। वे भारत से व्यापारिक संबंध बढ़ाने के लिए अधिक उत्सुक रहते हैं। अपने हितों को नुकसान पहुंचाकर वे पाकिस्तान की मदद के लिए आगे नहीं आएंगे।

अफगानिस्तान सरकार ने पाकिस्तान की इस कोशिश पर कड़ा ऐतराज किया है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी को अपनी विदेश नीति की परीक्षा बना दिया है। इसलिए वे पाकिस्तान को साधे रखना चाहते हैं। लेकिन पाकिस्तान जानता है कि भारत किसी भी तरह अमेरिका को कश्मीर विवाद में पंच बनाने के लिए तैयार नहीं होगा। अमेरिका भारत पर एक सीमा से अधिक दबाव नहीं डाल सकता। इस समय भारत को अमेरिका की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी अमेरिका को भारत की है। अमेरिका के लिए चीन की चुनौती और भी बड़ी समस्या है। वह चीन की शक्ति को संतुलित करने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका देखता है। इसलिए पिछले दिनों भारत और अमेरिका के बीच जो रणनीतिक सहयोग विकसित हुआ है, अमेरिका उसे खटाई में नहीं डालना चाहेगा। वैसे भी भारत इस विषय पर किसी दबाव में आने वाला नहीं है, यह अमेरिका समझता है। पाकिस्तान की इमरान सरकार सभी देशों के दरवाजे अवश्य खटखटा रही है, लेकिन उसे मालूम है कि वह भारत के खिलाफ किसी भी तरह का अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की स्थिति में नहीं है। यह बात पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिल्कुल साफ शब्दों में कह भी चुके हैं।

आरंभ में जब पाकिस्तान मुस्लिम देशों का समर्थन जुटाने और चीन की सहायता से सुरक्षा परिषद में मामला उठाने की कोशिश कर रहा था तो इमरान सरकार से कोई अतिशय अपेक्षा न रखी जाए, यह कहने के लिए पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने चेताया था कि लोगों को यह नहीं समझना चाहिए कि दुनिया का कोई देश माला लेकर पाकिस्तान की आगवानी करने के लिए बैठा हुआ है। आज भारत एक बड़ी आर्थिक शक्ति है। मुस्लिम देश भी उससे अच्छे संबंध बनाए रखने में अपना हित देखते हैं। वे भारत से व्यापारिक संबंध बढ़ाने के लिए अधिक उत्सुक रहते हैं। अपने हितों को नुकसान पहुंचाकर वे पाकिस्तान की मदद के लिए आगे नहीं आएंगे। यही बात उन्होंने यूरोपीय शक्तियों के बारे में कही। आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है। कोई उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता। इस वास्तविकता को पहचानने के बावजूद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में लगा हुआ है। उसका कारण पाकिस्तान के भीतर का आंतरिक दबाव है।

पाकिस्तान की यह हताशा केवल अनुच्छेद 370 हटाने से ही पैदा नहीं हुई, उससे वह और गहरी हो गई। पिछले कुछ वर्षों में उसकी कठिनाइयां जिस तरह बढ़ी हैं, उसके कारण अब उसे यह अनुभव होने लगा है कि वह भारत को किसी तरह के दबाव में नहीं ला सकता।

पाकिस्तानी संसद के भीतर जब इमरान सरकार पर कुछ और कारगर कदम उठाने के लिए दबाव डाला गया तो सरकार की ओर से यही कहा गया कि जो भी कदम उठाए जा सकते थे, वे सब उठा लिए गए हैं। क्या विपक्ष चाहता है कि पाकिस्तान भारत से युद्ध छेड़ दे? इमरान सरकार की ओर से यह जवाब अत्यंत हताशा में ही दिया गया था। असल में पाकिस्तान सरकार पर उन सब तत्वों का दबाव है जो भारत के प्रति घृणा रखते हैं। इनमें सेना के नामचीन अफसर, राजनेता, नौकरशाह और जेहादी तत्व सब शामिल हैं। पाकिस्तान की यह हताशा केवल अनुच्छेद 370 हटाने से ही पैदा नहीं हुई, उससे वह और गहरी हो गई। पिछले कुछ वर्षों में उसकी कठिनाइयां जिस तरह बढ़ी हैं, उसके कारण अब उसे यह अनुभव होने लगा है कि वह भारत को किसी तरह के दबाव में नहीं ला सकता।

अब तक की कांग्रेस सरकारें आसानी से दबाव में आ जाती थीं। लेकिन नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान से संबंध सुधारने में मिली आरंभिक असफलता के बाद निश्चय कर लिया था कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में उत्तर दिया जाएगा। तब से पाकिस्तान से घुसपैठ करने वाले और घाटी में पैदा होने वाले सभी आतंकवादियों को सीधे निशाना बनाने की आक्रामक नीति बनाई गई। पाकिस्तान नियोजित बड़ी कार्रवाईयों का बदला लिया गया। बालाकोट की कार्रवाई से यह सिद्ध कर दिया गया कि मोदी सरकार पाकिस्तान की सीमा के भीतर कार्रवाई करने से भी नहीं चूकेगी। तभी से पाकिस्तान में यह आकलन आरंभ हो गया था कि अगर युद्ध छिड़ा तो पाकिस्तान क्या करेगा। इस बहस में यह सुझाव आया ही होगा कि पाकिस्तान नाभिकीय हमले का विकल्प चुन सकता है। उसका उत्तर सार्वजनिक तौर पर सत्ता से बाहर हो चुके मुशर्रफ ने यह कहकर दिया कि पाकिस्तान अगर एक नाभिकीय बम फेंकेगा तो भारत दस नाभिकीय बम फेंक देगा। इस लड़ाई में भारत का उतना विनाश नहीं होगा, जितना पाकिस्तान का।

पाकिस्तान शायद अब यह बात अच्छी तरह समझता है कि भारत के नए नेतृत्व को नाभिकीय हमले का डर दिखाकर ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता। कारगिल युद्ध के समय भी पाकिस्तान ने यह धमकी देने की कोशिश की थी। उस समय हमारे सेनाध्यक्ष पद्नाभन को टेलीविजन पर आकर यह चेतावनी देनी पड़ी थी कि पाकिस्तान ने ऐसा कोई दुस्साहस किया तो धरती से उसका नामोनिशान मिट जाएगा। पाकिस्तान जानता है कि उसके पास भारत से युद्ध का विकल्प नहीं है। उसकी आर्थिक स्थिति खराब है और इस समय वह सीमित युद्ध का खतरा भी नहीं उठा सकता। पहले भी वह अपनी अर्थव्यवस्था पर युद्ध के दुष्परिणाम देख चुका है। अयूब खां ने प्रधानमंत्री नेहरू की मृत्यु के कुछ समय बाद 1965 में यह सोचकर भारत पर आक्रमण किया था कि भारत के दुविधाग्रस्त नेतृत्व से वह आसानी से कश्मीर छीन लेगा। युद्ध से उसे कुछ हासिल नहीं हुआ और उसकी आर्थिक हालत इतनी बिगड़ गई कि अयूब खां को इस्तीफा देकर सत्ता याहिया खां को सौंप देनी पड़ी। याहिया खां ने भी वही गलती की।

1971 में भारत पर पहले आक्रमण करके भारत को सीधे युद्ध में उतरने का बहाना दे दिया। उसका परिणाम उसके विभाजन में तो हुआ ही, जनरल नियाजी को अपने 93 हजार सैनिकों के साथ बड़े शर्मनाक तरीके से भारतीय फौजों के सामने आत्समर्पण करना पड़ा। उसकी शर्म आज भी इतनी गहरी है कि इमरान खान अपने नाम के साथ अपना कुल नाम नियाजी नहीं लगाते। कारगिल युद्ध का भी पाकिस्तान पर उतना ही बुरा प्रभाव पड़ा। पाकिस्तान की मुश्किल यह है कि अब तक उसने व्यापार स्थगित करके, परिवहन रोककर या राजनयिक संबंधों का स्तर घटाकर जो भी कदम उठाए हैं, उससे उसका ही नुकसान अधिक हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में उसे कोई समर्थन नहीं मिला। भारत से युद्ध में वह उतर नहीं सकता। ऐसी स्थिति में उसके पास कोई विकल्प नहीं रह गया है। उसने कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की, जो सफल नहीं हुई। वह भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ने की आशंका जताता रहा, किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया। युद्ध के द्वारा वह कश्मीर समस्या को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दे सकता था। पर इतना बड़ा जोखिम उठाने की वह स्थिति में नहीं है।

पाकिस्तान को 1971 में पराजय के बाद भी काफी हताशा हुई थी। लेकिन तब वह भारत से बदला लेने का जुनून पैदा करके उस हताशा से निकल सकता था। जनरल जिया का उभार इसी का परिणाम था। जनरल जिया ने पाकिस्तान की राजनीति को भारत से बदला लेने के लिए कट्टर इस्लाम के रास्ते पर धकेल दिया। जुल्फिकार अली भुट्टो के समय 1973 में पाकिस्तान का जो संविधान बनाया गया था, उसमें भी उसे एक इस्लामी राज्य ही बताया गया था। लेकिन जनरल जिया ने पाकिस्तान की राजनीति के इस्लामीकरण का जो अभियान शुरू किया, उसने एक जेहादी तंत्र खड़ा कर दिया। जनरल जिया की 1988 में विमान दुर्घटना में मौत हो गई, लेकिन भारत को उसके बाद आतंकवाद से निरंतर जूझते रहना पड़ा। आज पाकिस्तान का यह अस्त्र भी बेकार हो गया है। भारतीय सेना आतंकवादियों को चुन-चुनकर मारने के लिए कृतसंकल्प दिखाई दे रही है।

पाकिस्तान ने भारत से बातचीत का दौर फिर चलाने की काफी कोशिश की, लेकिन इस बार भारत ने ठान लिया है कि जब तक पाकिस्तान अपने आतंकवादी तंत्र को समाप्त नहीं करता, उससे बात नहीं की जाएगी। भारत आतंकवाद को एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने में भी सफल हो गया है और दुनिया में पाकिस्तान की छवि एक खलनायक जैसी हो गई है। उसे एक झटका एशिया प्रशांत क्षेत्र की फाइनेंशियल एक्शन टॉस्क फोर्स ने काली सूची में डालकर दिया है। यह संगठन ऐसे देशों को जो आतंकवादियों को वित्तीय सहायता पहुंचाते हैं, चिह्नित करता है और उनसे वित्तीय सहयोग पर रोक लगा देता है। अब इसके केंद्रीय संगठन की अक्टूबर में बैठक होगी और अगर उसमें पाकिस्तान को काली सूची में डाल दिया गया तो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता मिलना भी बंद हो जाएगी। चीन इस संगठन का इस समय अध्यक्ष है। पर वह भी पाकिस्तान की मदद करने की स्थिति में नहीं है। इन सब कारणों से पाकिस्तान में जो हताशा पैदा हो रही है, वह भविष्य में उसे बिखराव की ओर ले जा सकती है।


 
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