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‘शोले’ और सिनेमाई दर्शक

02/08/2019

‘शोले’ और सिनेमाई दर्शक

प्रकाश के रे

सिनेमा को समाज के दर्पण के रूप में पढ़ा जाए या राष्ट्रीय रूपक के रूप में? दर्शक भरत मुनि का ‘रसिक’ है या चार्ली चैप्लिन का ‘इग्नोरैंट फेलो’? वह मोंटाज का उपभोक्ता है या लाइट एंड साउंड का भुक्तभोगी? वह एक नहीं है, सो शायद सब है।

हर साल भले ही सैकड़ों-हजारों फिल्में बनती हैं, पर कुछ ही फिल्मों के नसीब में यह होता है कि वे अनेक पीढ़ियों की पसंद बन जाती हैं। रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित ‘शोले’ एक ऐसा ही शाहकार है। इसे न सिर्फ आज भी खूब सराहा जाता है, बल्कि फिल्म बनाना सिखानेवाले संस्थानों में एक पाठ्य-पुस्तक की तरह पढ़ाया भी जाता है। अगले महीने की 15 तारीख यानी हमारे स्वतंत्रता दिवस के दिन यह फिल्म अपने 45वें बरस में प्रवेश कर जायेगी। ‘शोले’ इसी तारीख को 1975 में प्रदर्शित हुई थी। पर, इस फिल्म पर बहुत लिखा, बोला और पढ़ा जा चुका है। सो, इसके बहाने 1975 में रिलीज हुई कुछ अन्य फिल्मों की चर्चा करते हैं। काफी हद तक कहा जा सकता है कि जैसे 1957 को हिंदुस्तानी सिनेमा का सुनहरा साल कहा जाता है, उसी तरह से 1975 भी एक खास साल है।
सनद रहे, यह वही साल है, जब देश में इमरजेंसी लगायी गयी थी। उस साल की फिल्मों की गुणवत्ता किस हद तक थी, इसका अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अगले साल फिल्मफेयर अवार्ड्स में लगभग सभी कैटेगरी- 12 में से 9- में नामित शोले सिर्फ ‘बेस्ट एडिटिंग’ का अवार्ड ही जीत सकी थी। एडिटर एमएस शिंदे ने तीन लाख फिट लंबे फुटेज को मात्र 20 हजार फीट में संपादित कर दिया था। साल 1975 में रिलीज सफल फिल्मों की सूची देखिये- दीवार, जमीर, छोटी सी बात, आंधी, खेल खेल में, अमानुष, धर्मात्मा, खुशबू, चोरी मेरा काम, दो झूठ, चुपके चुपके, फरार, मिली, प्रतिज्ञा, एक महल हो सपनों का, उम्र कैद, संन्यासी, जख़्मी, वारंट, जूली, काला सोना, जय संतोषी माँ, संकल्प, गीत गाता चल, साजिÞश, रफू चक्कर, सलाखें, प्रेम कहानी, कहते हैं मुझको राजा, शोले ये फिल्में औसत से लेकर मेगा तक हिट हुई थीं। दो फिल्मों- ‘शोले’ और ‘जय संतोषी माँ’ ने तो कमाई के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिये थे। ‘संन्यासी’, ‘दीवार’ और ‘प्रतिज्ञा’ हिट होने के मामले में बाद के स्थानों पर रही थीं।
जब 15 अगस्त को ‘शोले’ रिलीज हुई, ‘दीवार’ मेगा हिट हो चुकी थी और थियेटरों में अब भी ‘जय संतोषी मां’ जलवानुमा थी। मेरी नजर में ये तीन फिल्में उस साल की और शायद उस दौर की प्रतिनिधि फिल्में मानी जा सकती हैं। प्रोडक्शन, कथानक और रिसेप्शन के मामले में। ‘शोले’ गंवई भारत के सामंती, खतरनाक और जड़ समाज और शहर में स्थित राज-सत्ता के केंद्रों के दखल की अनूठी दास्तान है। उससे भी बड़ी पहेली है कि दर्शक इमर्जेंसी के उन महीनों में सिनेमा में प्रोजेक्टेड सत्ता के साथ खड़ा था, वह डाकू गब्बर से भयभीत था, पर गब्बर को समझना नहीं चाह रहा था। निर्देशक और लेखक ने भी उस किरदार को समझाने की कोई कोशिश नहीं की है। ‘दीवार’ का ‘एंटी-हीरो’ विजय परिभाषित है। उसके संदर्भ से देखें, तो बाद में ‘सत्या’ के सत्या और भीखू म्हात्रे को समझ सकते हैं। लेकिन, गब्बर को ‘मदर इंडिया’ के बिरजू के संदर्भ में नहीं देखा गया।
यह फिल्म आधुनिक राज्य की सामंतवाद से रणनीतिक गठजोड़ को अच्छाई-बुराई के सीधे हिसाब में अहमियत दे रही थी, पर यश चोपड़ा की ‘दीवार’ राज्य सत्ता और आधुनिक भारत के करीब तीन दशकों की असफलता को रेखांकित कर रही थी। हर परेशान कर देनेवाले दृश्य में बजता था- ‘सारे जहां से अच्छा’ कमाल देखिये, दोनों फिल्में सलीम-जावेद की लेखक जोड़ी ने ही लिखा था। इन फिल्मों की कामयाबी के बीच ‘जय संतोषी मां’ के मेगाहिट होने को कैसे समझा जाए? न बजट, न स्टार कास्ट, न प्रचार, शुरुआती असफलता और फिर सुपर-डुपर सफलता! जो दर्शक ठाकुर का है, गब्बर का है, वीरू और विजय का है, उसे ‘जय संतोषी मां’ के कथानक और कलाकारों में ऐसा क्या दिखा? वह तो कोई पौराणिक आख्यान या धार्मिक महाकाव्य का सिनेमाई रूपांतरण भी न था? इन फिल्मों की कामयाबी और दशकों बाद भी कल्ट बने रहना कहीं हमारे बहुआयामीय मानसिक संरचना, विक्षोभ, बेचैनी और आकांक्षाओं का नतीजा तो नहीं! सिनेमा को समाज के दर्पण के रूप में पढ़ा जाए या राष्ट्रीय रूपक के रूप में? दर्शक भरत मुनि का ‘रसिक’ है या चार्ली चैप्लिन का ‘इग्नोरैंट फेलो’? वह ऋत्विक घटक का प्रोजेक्शन है या सत्यजीत रे का प्रोजेक्ट? वह मोंटाज का उपभोक्ता है या लाइट एंड साउंड का भुक्तभोगी? वह एक नहीं है, सो शायद सब है।


 
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