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मन का रावण मरता नहीं तो कैसा दशहरा

06/10/2019

(विजयादशमी, 8 अक्टूबर पर विशेष)

सियाराम पांडेय 'शांत'

रावण त्रेता युग में मारा गया था। उसे मरे सहस्त्राब्दियां बीत गईं लेकिन भारतीय समाज ने उसे आज तक माफ नहीं किया। साल-दर-साल भीड़ जुटाकर उसे अग्निबाण से मारा और जलाया जाता है। उसके भाई कुंभकर्ण और बेटे मेघनाद को भी रावण के साथ खड़ा कर जलाया जाता है। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद तीनों बुराई का प्रतीक हैं। रावण के दस मुख दस बुराइयों के प्रतीक हैं। रावण प्रतीक है अहंकार का, अनैतिकता का, सामर्थ्य के दुरुपयोग का और ईश्वर से विमुख होने का। उसके सिर प्रतीक हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि अवगुणों के। रावण दरअसल अवगुणों का समुच्चय है।
 रावण अपने समय का प्रकांड विद्वान था। भूत-भविष्य और वर्तमान का ज्ञाता था। ज्योतिष ग्रंथों में रावण संहिता का कोई जोड़ नहीं है। समय और मन की गति का बड़ा जानकार था। लेकिन इन तमाम सारी दक्षताओं, क्षमताओं और विद्वताओं के बाद भी वह अपने अवगुणों को नियंत्रित नहीं कर सका। रावण ने सीता का अपहरण कर बड़ी भूल की थी। समाज में इस तरह की भूलें रोज देखने को मिलती हैं। अब तो साधु-संन्यासी भी कालनेमियों की जमात में अपने नाम लिखा रहे हैं। रावण जब अपने अवगुणों का नाश खुद नहीं कर पाया तो उसने ईश्वर रूपी राम को अपना शत्रु बनाया। जिस समय खर-दूषण और त्रिशिरा समेत चौदह हजार राक्षस एक ही दिन में मारे गए थे, तभी रावण को इस बात का आभास हो गया था कि राम सामान्य मनुष्य नहीं, साक्षात नारायण हैं। ‘खर-दूषण मो सम बलवंता तिन्हहिं को मारईं बिनु भगवंता।‘ वह हठकर ईश्वर अर्थात् प्रभु श्रीराम के सम्मुख आया और उनसे वैर किया क्योंकि उसे पता था कि 'भाव कुभाव अनख आलसहूं। नाम जपत मंगल दिसि दसहूं।'
मानसकार ने ईश्वर के कल्याणमयी आश्वासन को कुछ इन शब्दों में निरूपित किया है -'सन्मुख होय जीव मोहिं जबहिं। जनम कोटि अघ नासहिं तबहिं।'  मतलब जब जीव मेरे सम्मुख हो जाता है तब मैं उसके जन्म-जन्मान्तर के पापों का नाश कर देता हूं। हर साल रावण को जलाकर हम यह मान बैठते हैं कि हमने रावण को जला दिया है। लेकिन अपने अंदर के अवगुण स्वरूप रावण को तो हम मारते नहीं। दरअसल, हम प्रतीकों में जीते हैं। हम मनुष्यों में और रावण में बहुत अधिक समानता है। यह बात स्वीकारने में असहज लगती है, किन्तु है पूर्ण सत्य। हमारी इस पंचमहाभूतों से निर्मित देह में मन रूपी रावण विराजमान है। इस मन रूपी रावण के काम ,क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, वासना, भ्रष्टाचार, अनैतिकता आदि दस सिर हैं। यह मन रूपी रावण भी ईश्वर से विमुख है। जब इस मन रूपी रावण का एक सिर कटता है तो तत्काल उसके स्थान पर दूसरा सिर प्रकट हो जाता है। रक्त बीज का कभी विनाश नहीं होता। एक विकार का दमन करो तो दूसरा प्रकट हो जाता है।
 रही बात बुराई पर अच्छाई की जीत की तो वह तो उसी दिन हो गई थी जब भगवान राम ने रावण का वध किया था। राम और उनकी वानरी सेना ने रावण के एक लाख पुत्रों और सवा लाख नातियों का संहार किया था। ‘इक लख पूत सवा लख नाती। ता रावण घर दिया न बाती। लंका-सी कोट, समुद्र-सी खाई ता रावण की खबर न पाई।' जब रावण के एक लाख पुत्र और सवा लाख नाती लंका के समरांगण में मारे गए तो केवल कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों को ही जलाना क्या उनके साथ ज्यादती नहीं है? पहले रावण के पुतले छोटे हुआ करते थे। इधर हर साल रावण, उसके भाई कुंभकर्ण और बेटे मेघनाद का कद बढ़ता जा रहा है। उनके पुतलों का आकार बड़ा हो रहा है। पुतला दहन करने वालों में होड़ लगी है कि किसका रावण सबसे बड़ा। यह दिखावापन भी एक तरह का रावणत्व ही है। रावण के 99 हजार 999 बेटों को अगर भारतीय समाज माफ कर सकता है। अहिरावण और महिरावण को माफ कर सकता है तो मेघनाद को क्यों नहीं?  विचार करना चाहिए। 
राम ने जब दसमुख रावण को मारा था तो दो रावण और भी थे। एक शतमुख रावण और दूसरा सहस्त्रमुख रावण। दसमुख रावण का वध राम ने किया था तो सौ मुख वाले रावण का वध सीताजी ने काली रूप धारण कर किया था। काली चालीसा में इसका जिक्र इस रूप में मिलता है। ' शतमुख रावण मारिन अंबा। करहुं कृपा सब पर अविलंबा।'
अयोध्या में भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद सारे ऋषि-मुनि राम दरबार में उपस्थित हुए और एक स्वर में कहने लगे कि रावण के वध से अब विश्व में शान्ति स्थापित हो गयी है। सब लोग सुख और शान्ति से जी रहे हैं। तब सीताजी को हंसी आ गई। जब मुनियों ने उनकी हंसी का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने बचपन में एक ब्राह्मण के मुख से सहस्त्रमुख रावण की गाथा सुनी थी। वह भी रावण का भाई है और वह पुष्कर द्वीप में अपने नाना सुमाली के साथ रहता है। उसका अत्याचार भी रावण से कम नहीं है। जब तक सहस्त्रमुख रावण नहीं मारा जाता तब तक धरा पर शांति कैसे हो सकती है? यह बात सुनकर श्रीराम ने उसी क्षण पुष्पक विमानका स्मरण किया और इस शुभकार्य को शीघ्र सम्पन्न करने की इच्छा जताई। वानरराज सुग्रीव और राक्षसराज विभीषण को दलबल के साथ बुला लिया गया। बड़ी सेना के साथ श्रीराम पुष्पक विमान से पुष्कर क्षेत्र पहुंचे। सहस्त्रमुख रावण ने सोचा, इन क्षुद्र जंतुओं से क्या लड़ना?  क्यों न इन्हें इनके देश भेज दिया जाए?  ऐसा सोचकर उसने वायव्यास्त्रका प्रयोग किया। वायव्यास्त्रने सभी प्राणियों को बाहर निकाल दिया। केवल चारों भाई, सीताजी, हनुमान, नल, नील, जामवंत और विभीषण पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा। अपनी सेना की यह स्थिति देखकर श्रीराम सहस्त्रमुख रावण पर टूट पड़े। सहस्त्रमुख रावण से युद्ध करते हुए श्रीराम मूर्छित हो गए। यह देख सहस्त्रमुख रावण अपने दो हजार हाथों को उठाकर नाचने लगा। सीता यह सब सह न सकीं। उन्होंने महाकाली का विकराल रूप धारण का लिया और एक क्षण में ही सहस्त्रमुख रावण का सिर काट लिया। उसकी सेना को तहस नहस कर दिया। तब ब्रह्मादि देवताओं ने देवी काली की स्तुति की और उनके क्रोध को शांत किया।
 उड़िया भाषा में लिखित जगमोहन रामायण की कथा पर यकीन करें तो मिथिला में आयोजित धनुष यज्ञ में दसमुख रावण, शतमुख रावण और सहस्त्रमुख रावण ने शिवधनुष को उठाने की कोशिश की थी और वहीं बेहोश हो गए थे तब परशुराम ने उन्हें उठाकर लंका, सुलंका और विलंका में फेंक दिया था। यह कथा बताती है कि रावण ही तीन नहीं थे, उन दिनों लंका भी तीन थी। दशहरा प्रेरणा पर्व है। वह हमें यह जानने को प्रेरित करता है कि हम क्या हैं, राम या रावण। रावण दस मुख का था, सौ मुख का था या हजार मुख का था, यह बात उतनी मायने नहीं रखती जितनी यह कि आज रावण कितने मुख का हो गया है? हर चेहरे के पीछे एक चेहरा है जो दिखता नहीं। व्यक्ति का मन सबसे बड़ा राम है और वही सबसे बड़ा रावण है। रावण को जलाना है तो पुतला ही क्यों, अपने अंदर की बुराइयों को जला दें। सब कुछ ठीक हो जाएगा। धरा पर रामराज्य आ जाएगा। सारे फसाद की वजह तो मन है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ' मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयो:।' आदमी के बंधन और मोक्ष का कारण मन है। 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।' सारा खेल तो मन का है। इसलिए तो कहा है कि मन को साधने के बाद कुछ भी साधना शेष नहीं रह जाता। ऐसे तो हम  सहस्त्राब्दियों तक रावण को जलाते रहेंगे लेकिन मन में बैठा रावण न मरेगा, न जलेगा। अलबत्ता वह हमें जरूर अंदर ही अंदर जलाता रहेगा।
  अब भी समय है कि हम इस दशहरे में अपने अंदर की बुराइयों को जलाएं। फिर उसे अपने पास फटकने न देने का संकल्प लें। दशहरा मनाने की सार्थकता भी यही है। काश, हम पुतला जलाने की बजाए दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुष्प्रवृत्तियों को जला पाते तो यह सही मायने में बुराई पर अच्छाई की जीत होती।
( लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)  


 
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