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कांग्रेस की आत्मघाती राजनीति

06/09/2019

कांग्रेस की आत्मघाती राजनीति

बनवारी

निकट भविष्य में कांग्रेस के राज परिवार की सत्ता में वापसी की कोई संभावना नहीं बची है। क्या इसी हताशा में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ और अधिक आक्रामक हुआ राजपरिवार यह समझने की स्थिति में भी नहीं रह गया है कि शत्रु देश पाकिस्तान उसके अतिरंजित कथनों का लाभ उठा रहा है?

एक बार फिर यह सिद्ध हो गया है कि कांग्रेस की इस समय सबसे बड़ी समस्या उसका राज परिवार है। जब तक वह अपने इस राज परिवार से मुक्ति नहीं पाती, देश की राजनीति में कोई सार्थक भूमिका नहीं निभा सकती। कांग्रेस को राजनैतिक रूप से सबसे अधिक हानि इस राज परिवार द्वारा केंद्र सरकार के अनुच्छेद 370 समाप्त करने के निर्णय का अंध-विरोध करने से हो रही है। केंद्र सरकार के इस फैसले से यह राज परिवार इतना किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था कि कई दिन उसे यह समझ में नहीं आया कि वह उसका समर्थन करे या विरोध।
पूरे देश में केंद्र सरकार के इस निर्णय का जिस तरह स्वागत हुआ, उसने उसकी कठिनाई बढ़ा दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इस परिवार में जो राजनीतिक घृणा भरी हुई है, उसने उसे केंद्र सरकार के इस फैसले का विरोध करने के लिए उकसाया। पार्टी के भीतर केंद्र सरकार के इस फैसले का व्यापक समर्थन दिखाई दे रहा था। ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर भूपेन्द्र सिंह हुड्डा तक नई-पुरानी पीढ़ी के अनेक नेता केंद्र सरकार के इस निर्णय पर अपना समर्थन जता चुके हैं। राहुल गांधी की युवा टोली के लगभग सभी सदस्य यह स्पष्ट कर चुके हैं कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध पार्टी के भविष्य को चौपट कर सकता है।
उन्होंने खुलकर यह कहा कि पुरानी पीढ़ी के गुलाम नबी आजाद जैसे जो नेता इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं वे वैसे भी अपने राजनैतिक जीवन के अंतिम दौर में हैं। लेकिन कांग्रेस के युवा नेता अपने राजनैतिक भविष्य को दांव पर नहीं लगा सकते। इन सब तर्कों का राज परिवार के सदस्यों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। केंद्र सरकार के निर्णय के कुछ दिन बाद सोनिया गांधी ने घोषित किया कि पार्टी निर्णय का विरोध करेगी और वह जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ किए गए विश्वासघात को मुद्दा बनाएगी। शुरू में उसकी आपत्तियां वैधानिक थी। धीरे-धीरे उसकी जगह जम्मू-कश्मीर की स्थिति को संभालने के लिए लगाए गए प्रतिबंधों को मुद्दा बनाया जाने लगा।
हमने यूरोपीय देशों से लोकतंत्रीय राजनीति का जो स्वरूप और संस्कार ग्रहण किया है, उसमें विपक्ष की भूमिका नकारात्मक ही होती है। फिर भी इस बात का ध्यान रखा जाता है कि राष्ट्रीय हित से जुड़े प्रश्नों पर नकारात्मक राजनीति को हावी न होने दिया जाए। कांग्रेस यह संतुलन नहीं रख पा रही तो इसका सबसे बड़ा कारण यह राज परिवार ही है। सोनिया गांधी की राजनीतिक असुरक्षा का मुख्य कारण यह है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता निरंतर बढ़ रही है। कम से कम निकट भविष्य में कांग्रेस के राज परिवार की सत्ता में वापसी की कोई संभावना नहीं बची है। इस हताशा ने राज परिवार को और अधिक आक्रामक होकर नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के निर्णयों का विरोध करने के लिए मजबूर किया है।
अपनी इस आक्रामकता में वे यह समझने की स्थिति में भी नहीं रह गए हैं कि भारत का विरोधी पाकिस्तान राज परिवार के अतिरंजित कथनों का लाभ उठा रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के विरुद्ध अपने दुष्प्रचार के लिए उनका इस्तेमाल कर रहा है। यह बात आरंभ में लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी के भाषण के समय ही स्पष्ट हो गई थी। उन्होंने अपने भाषण में यह तक कह दिया था कि केंद्र सरकार को इस तरह निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच का एक द्विपक्षीय विवाद है। अधीर रंजन के इस तर्क ने कांग्रेस को हुर्रियत के नेताओं की बगल में जा खड़ा किया था। स्वयं उनकी पार्टी को उनके इस भाषण से काफी परेशानी हुई थी। इसके बावजूद कांग्रेस की औपचारिक नीति नहीं बदली।
वह मोदी सरकार के इस निर्णय का विरोध करने के लिए कड़े से कड़े शब्दों का उपयोग करती रही। यह देखते हुए भी कि पाकिस्तानी प्रचार में निरंतर उसका उपयोग किया जा रहा है। केंद्र सरकार के अनुच्छेद 370 समाप्त करने के निर्णय ने पूरे विपक्ष को बांट दिया है। केंद्र सरकार के इस निर्णय का मुखर विरोध दो तरह के विपक्षी दल कर रहे हैं। एक वे, जो अपने वैचारिक आग्रहों को राष्ट्रहित से ऊपर रखते हैं। उनमें कम्युनिस्ट पार्टियां और द्रमुक को गिना जा सकता है। दूसरे वे जो मुस्लिम वोटों को ध्यान में रखकर ही अपने निर्णय करते हैं। इनमें समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों को रखा जा सकता है। हालांकि यह मानने का कोई आधार नहीं है कि जम्मू-कश्मीर के बाहर के सभी मुसलमान अनुच्छेद 370 हटाए जाने को सांप्रदायिक दृष्टि से देख रहे हैं।
कांग्रेस की एक और समस्या यह है कि जवाहर लाल नेहरू के जमाने से ही उसके सेक्यूलरिज्म का अर्थ हिंदू विरोध रहा है। इसीलिए नेहरू-गांधी परिवार के सभी नेताओं के वैचारिक दुराग्रह ने भाजपा और उसके पूर्ववर्ती रूपों को राजनैतिक अछूत दिखाने की कोशिश की है। विपक्षी दल अनुच्छेद 370 हटाने और जम्मूकश्मीर में प्रतिबंध लगाने का मुखर विरोध करने के लिए जम्मू-कश्मीर जाने की कोशिश करते रहे। इसी क्रम में 12 नेता 24 अगस्त को कश्मीर पहुंच गए, यह जानते हुए भी कि उन्हें हवाई अड्डे से वापस भेज दिया जाएगा।
लौटकर सबसे उग्र टिप्पणी राहुल गांधी ने की। उन्होंने बिना किसी आधार के कहा कि उन्हें जम्मू-कश्मीर जाकर वहां के लोगों पर किए जा रहे बल के बर्बर प्रयोग का अहसास हुआ। राहुल गांधी द्वारा प्रयोग किया गया ‘बर्बर’ शब्द काफी आपत्तिजनक था। लेकिन राहुल गांधी के समर्थन में एक कदम आगे बढ़कर प्रियंका गांधी ने कहा कि कश्मीर में लोकतांत्रिक अधिकारों को ताक पर रखने से ज्यादा कुछ भी राजनैतिक और राष्ट्रद्रोह नहीं है। उन्हें शायद याद नहीं रहा कि एक अदालत के फैसले से अस्थिर हुई अपनी कुर्सी को बचाने के लिए इंदिरा गांधी ने सभी देशवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करके आपातकाल लगा दिया था। राहुल गांधी की इन अतिरंजित टिप्पणियों का पाकिस्तान ने शीघ्र अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया। संयुक्त राष्ट्र को लिखे एक पत्र में पाकिस्तान ने राहुल गांधी की टिप्पणियों का साक्ष्य देते हुए कहा है कि जम्मू-कश्मीर में लोग मारे जा रहे हैं। भाजपा के इस आक्षेप के बाद कि राहुल गांधी पाकिस्तान के हाथों खेल रहे हैं, उन्हें अपनी सफाई देनी पड़ी।
उन्होंने कहा कि मोदी सरकार से उनके अनेकों मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इस बात पर उनका कोई मतभेद नहीं है कि जम्मूकश्मीर भारत का आंतरिक मामला है, उसमें हस्तक्षेप करने का पाकिस्तान को कोई अधिकार नहीं है। जम्मू-कश्मीर में अब तक होती रही हिंसा के लिए प्रमुख रूप से पाकिस्तान ही जिम्मेदार है। अगर राहुल गांधी सचमुच यह बात मानते हैं तो वे जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण एकीकरण के रास्ते की बाधा अनुच्छेद 370 को हटाने के इतना विरुद्ध क्यों हैं? यह तर्क देकर वे एक तरह का राजनैतिक छल कर रहे हैं कि इस निर्णय में जम्मू-कश्मीर के लोगों की सहमति नहीं ली गई। क्या नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच की साठ-गांठ के जरिए संविधान में जब अनुच्छेद 370 को अल्पकालिक बताते हुए जोड़ा गया था तो जम्मू-कश्मीर के लोगों की सहमति ली गई थी? क्या जवाहर लाल नेहरू के पास यह मानने का कोई आधार था कि शेख अब्दुल्ला के साथ किए गए इस समझौते में भारत के लोगों की सहमति है? जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा में यह वादा किया था कि अनुच्छेद 370 एक अल्पकालिक व्यवस्था है।
क्या उन्होंने या उनके उत्तराधिकारियों ने अपना यह वचन पूरा करने की कोशिश की? जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान बनवाते हुए अनुच्छेद 370 में यह बात जोड़ी गई थी कि जम्मू-कश्मीर की वैधानिक स्थिति के बारे में कोई भी फैसला वहां की संवैधानिक संस्थाओं की सहमति से होगा। लेकिन अब तक इस धारा में 40 से अधिक परिवर्तन किए जा चुके हैं। क्या वे अधिकांश केवल केंद्र सरकार के निर्णय नहीं थे? देश में अब तक अधिक समय कांग्रेस की ही सरकारें रही हैं। अब तक सभी सरकारों ने इस समस्या को सुलझाने के लिए बार-बार पाकिस्तान से बात की। बार-बार कश्मीरी नेताओं से बात की गई।

अनुच्छेद 370 पर विरोध दो तरह के विपक्षी दल कर रहे हैं। एक वे, जो अपने वैचारिक आग्रहों को राष्ट्रहित से ऊपर रखते हैं और दूसरे वे जो मुस्लिम वोटों को ध्यान में रखकर ही अपने निर्णय करते हैं।

पाकिस्तान को कश्मीर से उतना मतलब नहीं है, जितना भारत को कमजोर करने से है। अब तक पाकिस्तान की समूची राजनीति भारत के प्रति घृणा फैलाने पर ही केंद्रित रही है। कश्मीर के सभी मुस्लिम नेता केंद्र सरकार को ब्लैकमेल करते हुए कश्मीर समस्या को जटिल बनाते रहे हैं, क्योंकि इस समस्या के बने रहने में उनके निहित स्वार्थ हैं। 1990 से अब तक आतंकवाद के कारण 40 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, उनमें बहुलांश कश्मीरी ही हैं। इसके लिए मुख्य रूप से पाकिस्तान जिम्मेदार है, पर कांग्रेस की संकल्पहीनता और कमजोर नीतियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। जो साहसिक काम कोई कांग्रेस सरकार नहीं कर सकी, वह मोदी सरकार ने कर दिया है। उसका समर्थन क्यों नहीं किया जा सकता? कांग्रेस इस प्रश्न पर न केवल बंट गई है, बल्कि बिखरती जा रही है। जिस राज परिवार को आम कांग्रेसी अपनी शक्ति मानते थे, वही अब उन्हें अपनी कमजोरी दिखाई देने लगा है।
यह दिशा कांग्रेस के विलोपन की दिशा है। कांग्रेस के भीतर जो घबराहट फैल रही है, उसी का परिणाम जयराम रमेश का यह बयान है कि नरेंद्र मोदी को हर समय दानव चित्रित करते रहने से पार्टी लोगों का विश्वास खो देगी। शशि थरूर ने तो उसका समर्थन किया ही, अभिषेक मनु सिंघवी जैसे लोग भी जयराम रमेश के बयान का समर्थन करने को विवश अनुभव कर रहे हैं। इस सबके बाद भी कांग्रेस के राज परिवार के व्यवहार में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहा। आज यह राज परिवार कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या हो गया है और उससे मुक्ति का कांग्रेस के पास कम से कम अभी कोई उपाय नहीं है।


 
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