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क्यों थमी वाहनों की बिक्री....

14/10/2019

क्यों थमी वाहनों की बिक्री


हैरानी की बात है कि जब जीडीपी दर 7 प्रतिशत थी तो वाहन उद्योग में मंदी के लक्षण प्रकट होने लगे। उसके बाद तो जैसे इसके गिरने का सिलसिला शुरू हो गया। जुलाई आते-आते बिक्री में गिरावट 14 प्रतिशत तक हो गई। अगस्त में यह आंकड़ा तो 24 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। कारों की बिक्री में जैसे भूकंप आ गया है और इसमें कुल 35 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई जो 2000 के बाद का सबसे बुरा प्रदर्शन था। इन आंकड़ों ने वाहन उद्योग की नींद उड़ा दी है और कंपनियों को अपने उत्पादन पर अंकुश लगाना पड़ रहा है। कार कंपनियों,जैसे मारुति ने अपना संयंत्र थोड़े समय के लिए बंद भी कर दिया ताकि पहले से बनी गाड़ियां बिक सकें और नई गाड़ियों का उत्पादन न हो। ऐसा कई और कंपनियों ने किया है और वे भी साप्ताहिक अवकाश बढ़ाने लगी हैं।

एक बात तय है कि निर्यात में भारी बढ़ोतरी की इस समय जरूरत है और यह काम कंपनियों को ही करना होगा। सरकार तो प्रोत्साहन दे ही रही है।

सभी कंपनियों ने उत्पादन में कटौती की है और वे अब नवरात्रि तथा दीवाली जैसे त्योहारों का इंतजार कर रही हैं ताकि एक बार फिर से मांग बढ़े। इनसे बुरी हालत है कारों के पुर्जे बनाने वाली कंपनियों की जो मांग के अभाव में अपने कर्मचारियों की संख्या घटाने लगी हैं। अंदाजा है कि कुल ढाई लाख कामगारों की छंटनी हो गई है और अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो यह संख्या दस लाख तक जा सकती है। वाहन उद्योग ने देश की प्रगति में बड़ा योगदान किया है और जीडीपी में उसका कुल योगदान 7.5 प्रतिशत था। इस उद्योग में 2018 में 3 करोड़ 70 लाख लोग काम करते थे। इस लिहाज से भी यह रोजगार देने वाले सेक्टरों में काफी आगे था। यह मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में लगभग आधे का योगदान करने वाला उद्योग है। इसमें गिरावट जीडीपी के आंकड़ों को नीचे घसीट देती है। यह गिरावट क्यों हुई, इसका किसी के पास स्पष्ट कारण नहीं है। जो उद्योग पिछले साल तक अच्छे रिजल्ट दे रहा था, वह अचानक मंदी की चपेट में कैसे आ गया, इसका सीधा-सादा जवाब किसी के पास नहीं है। इसलिए इसका सरल समाधान भी नहीं दिख रहा है।

वाहन उद्योग की शानदार प्रगति के कारण ही 2016 में सरकार और आॅटो इंडस्ट्री के भागीदारों ने मिलकर एक बड़ा प्लान तैयार किया, जिसे आॅटोमेटिव मिशन प्लान 2016-26 का नाम दिया गया। यह बहुत ही महत्वाकांक्षी और विस्तृत योजना थी, जिसमें रिसर्च, टेक्नोलॉजी, एक्सपोर्ट, बिक्री से जुड़ी तमाम सरकारी नीतियों वगैरह को समाहित किया गया था। इसका लक्ष्य इस इंडस्ट्री को मजबूत और प्रणालीबद्ध बनाना था ताकि देश में स्किल्ड रोजगार बढ़े, देश में आधुनिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था तैयार हो। लेकिन इसका बड़ा उद्देश्य यह भी था कि अपने निर्यात के माध्यम से दुनिया भर के बाजारों में भारतीय कारों, टू व्हीलरों और ट्रकों वगैरह की बिक्री बढ़े। अमेरिका- इंग्लैंड का इतिहास इस बात का गवाह है कि वे इतनी तरक्की इसलिए कर पाए कि उनकी आॅटो इंडस्ट्री शीर्ष पर पहुंच गई थी। इसने ही उनके आर्थिक प्रगति का मार्ग तैयार किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि जीडीपी के प्रभावशाली आंकड़ों के कारण वाहन उद्योग ने भी महत्वाकांक्षी योजनाएं बनाईं और अतिरिक्त क्षमता सृजित की।

ऐसा प्रतीत होता है कि जीडीपी के प्रभावशाली आंकड़ों के कारण वाहन उद्योग ने भी महत्वाकांक्षी योजनाएं बनाईं और अतिरिक्त क्षमता सृजित की। उनका अंदाजा था कि अर्थव्यवस्था में तेजी के साथसाथ् ा वाहनों की मांग भी बढ़ेगी लेकिन हुआ उसके विपरीत।

उनका अंदाजा था कि अर्थव्यवस्था में तेजी के साथ-साथ वाहनों की मांग भी बढ़ेगी लेकिन हुआ उसके विपरीत। दरअसल, हमें यह देखना होगा कि क्या हमारे यहां इतनी बड़ी तादाद में कारों तथा अन्य वाहनों के चलने के लिए सड़कें हैं? पूरे देश में सड़कों की कमी और ट्रैफिक जाम की समस्या है। हमारे तमाम शहर ट्रैफिक जाम की भयंकर समस्या से जूझ रहे हैं और कई शहरों में तो पैदल चलने में भी परेशानी आ रही है। राजधानी दिल्ली को ही ले लें, जहां वाहनों की संख्या एक करोड़ के पार हो चुकी है। इनमें 70 लाख टू व्हीलर हैं, जबकि सड़कों की लंबाई में बहुत थोड़ी ही बढ़ोतरी हुई है। यहां कारों की डेनसिटी प्रति किलोमीटर 108 है। इससे भी बुरी हालत है आर्थिक राजधानी मुंबई की जहां हर किलोमीटर में 510 कारें हैं। कोलकाता में इस समय प्रति किलोमीटर 319 कारें हैं। यही हाल लगभग छोटे शहरों का भी है जहां सड़कों पर गाड़ियां रेंग रही हैं। मतलब साफ है कि गाड़ियां चलाने के लिए सड़कें ही नहीं हैं। ऐसी स्थिति संभावित ग्राहकों को हतोत्साहित करती है। ऐसी हालत में परिवहन विशेषज्ञ शहरों के योजनाकारों को सलाह दे रहे हैं कि वे गाड़ियों के पंजीकरण पर लगाम लगाएं ,जैसा सिंगापुर ने किया।

इस उद्योग की मंदी के पीछे जो कारण बताए जा रहे हैं, उन पर ध्यान देना ही होगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस दिशा में एक बड़ा कदम यह उठाया कि पर्यावरण के नए और सख्त नियमों में ढील देने का एलान किया है। इसके तहत बीएस-चार श्रृंखला की गाड़ियां अपने जीवन काल तक चल सकेंगी। पहले उनके चलने पर आने वाले समय में रोक लगने वाली थी। यह बड़ी घोषणा थी क्योंकि बीएस- छह स्तर की गाड़ियां तैयार करने में वाहन उद्योग को 70,000 करोड़ रुपये खर्च करने होते। अब यह राशि पूरी तरह से बच गई है। इसके अलावा वित्त मंत्री ने गाड़ियों की बिक्री बढ़ाने के लिए सभी सरकारी विभागों को नई कारें खरीदने की अनुमति दे दी है। खरीदारी पर प्रतिबंध हटने से सरकारी विभाग बड़े पैमाने पर गाड़ियां खरीद सकेंगे। इसके साथ ही निर्मला सीतारमण ने गाड़ियों पर मिलने वाले सालाना डेप्रिसिएशन को बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया है। इससे कंपनियां और अन्य गाड़ियां खरीदने को प्रेरित होंगी। इसका उन्हें सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। यह कार उद्योग को बढ़ावा देने में बड़ा कदम साबित होगा।

दरअसल, पर्यावरण के कठोर नियमों के कारण भी वाहनों की उत्पादन लागत में बढ़ोतरी हुई है। इनमें थोड़ी रियायत की जरूरत थी और सरकार ने सही समय पर सही कदम उठाया है। दूसरा बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि बीमा की दरों में काफी बढ़ोतरी हुई है। इनसे भी छोटी और सस्ती कारों के ग्राहक हतोत्साहित हुए हैं। कई राज्यों ने तो रजिस्ट्रेशन फीस पर भी सरचार्ज लगा दिया है, जिससे कारें महंगी हो गई हैं। इसका ज्यादा असर कम बजट वाली कारों पर पड़ा है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि महंगी तथा बिल्कुल नए मॉडल की कारों की मांग वैसी ही है और उनकी उपलब्धता आसानी से नहीं है। ब्रिटिश कंपनी एमजी ने अपनी नई कार हेक्टर के लिए जब बुकिंग खोलने की घोषणा की, तो थोड़े समय में ही तीस हजार से भी ज्यादा बुकिंग हो गई। ऐसा ही कोरियाई कंपनी किया के साथ हुआ। इन कारों को खरीदने के लिए कतार लग गई है। कारों की बिक्री बढ़ाने के लिए इंडस्ट्री मांग कर रही है कि उन पर से जीएसटी घटाया जाए। फिलहाल ये 28 प्रतिशत के दायरे में हैं और इन्हें घटाकर 18 प्रतिशत करने की मांग हो रही है। लेकिन यह सरकार के लिए संभव नहीं है। उसने समयस मय पर बहुत सी वस्तुओं पर जीएसटी घटाया है और यह प्रक्रिया अभी जारी है।

फिलहाल आॅटो सेक्टर से जीएसटी वसूली 15,000 करोड़ रुपये से घटकर 10.11 हजार करोड़ तक जा पहुंची है। सरकार इसमें और कमी देखना नहीं चाहती। मारुति उद्योग के चेयरमैन आर सी भार्गव का मानना है कि कारों पर जीएसटी घटाना इस समस्या का समाधान नहीं है। उनका कहना है कि कई सरकारी नियमों, मसलन कारों में सेμटी बैग अनिवार्य तौर पर लगाने जैसे कदमों ने कारों को बेवजह महंगा कर दिया है। जिस देश में कारों की औसत रμतार 40 किलोमीटर प्रति घंटे है, वहां ऐसे कानून अनुचित हैं। उन्होंने कहा कि बढ़े हुए रोड टैक्स भी बिक्री घटने के लिए जिम्मेदार हैं। कई राज्यों में तो 20,000 रुपये तक रोड टैक्स है। यह ग्राहकों को हतोत्साहित करता है। इसके अलावा ओला तथा उबर जैसी टैक्सी सेवा ने भी हालत को बिगाड़ा है।

लोगों के सामने ये बहुत अच्छे विकल्प के रूप में सामने आए हैं। देश के सभी बड़े नगरों में मेट्रो रेल सेवा आरंभ हो जाने से यात्रा सुगम हुई है। इन सब का असर कारों की बिक्री पर पड़ा है। भार्गव मानते हैं कि नए कानूनों और भारी टैक्स-सरचार्ज वगैरह ने कारों की बिक्री पर बुरा असर डाला है। वित्त मंत्री और केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री, दोनों इस समस्या के समाधान के लिए उत्सुक हैं। दोनों इस विषय पर अपने-अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। जाहिर है कि कुछ समाधान निकलेगा।


 
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