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इस दल से भी सीख सकता है विपक्ष

02/11/2019

अरविंद कुमार शर्मा

यूरोपीय यूनियन के सांसदों के दल के कश्मीर दौरे की योजना की जानकारी मिलते ही उसपर विवाद खड़ा कर दिया गया। कहा गया कि देश के विपक्षी सांसदों को कश्मीर नहीं जाने दिया गया था। इसके विपरीत वहां विदेशियों को भेजकर एक तरह से तीसरी ताकत का हस्तक्षेप स्वीकार कर लिया गया। ऐसा कहने वालों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सीपीएम के सीताराम येचुरी भी शामिल हैं। हालांकि यह आरोप सतही जान पड़ते हैं। पहली बात तो यह कि विपक्षी नेताओं ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभक्त करने के बाद ही वहां जाने की अनुमति मांगी थी। उसके कुछ दिनों बाद ही अमेरिकी सिनेटर क्रिस वान हॉलेन ने भी ऐसी ही इच्छा जतायी थी। ध्यान देना होगा कि 05 अगस्त को राष्ट्रपति की अनुमति को संसद की ओर से पारित किए जाने के बाद सुरक्षा के इंतजाम पुख्ता रखने के लिए राज्य में एहतियाती कदम उठाये गये थे।

यूरोपीय यूनियन के सांसद भी करीब करीब ढाई महीने बाद वहां पहुंचे। अंदाजा लगाया जा सकता है कि विपक्षी नेताओं को भी कुछ सावधानियों के साथ वहां जाने की अनुमति मिल सकती है। सबसे बड़ी सावधानी यही है कि कोई ऐसा बयान न दिया जाय, जो राज्य के किसी हिस्से में उकसाने की कार्रवाई साबित हो। जहां तक यूरोपीय यूनियन के सांसदों के दौरे को विदेशी हस्तक्षेप बताया गया है, यहां यह सूचना अब आम हो चुकी है कि ये सांसदों की व्यक्तिगत यात्रा थी। इस तरह की यात्रा उनके सरकारों की ओर से होने पर ही हमारे आंतरिक मामले में वहां का हस्तक्षेप माना जा सकता है।

इन सांसदों की यात्रा के संदर्भ में सवाल किया जा रहा है कि इसकी अनुमति क्यों दी गयी? फिर इस तरह की अनुमति पहले अपने यहां के विपक्षी सांसदों को देने की जगह विदेशियों को ही क्यों दिया गया? हम नहीं कहते कि हमारे विपक्षी नेता कम-से-कम देश की अखंडता के मामले में गैर जिम्मेदार हो सकते हैं। फिर भी पिछले अनुभव बताते हैं कि दूसरे मसलों की तरह इस संवेदनशील मुद्दे पर जितनी सावधानी की जरूरत थी, नहीं रखी गयी। विदेशी प्रतिनिधिमंडल ने सुरक्षा मानकों का पूरा ख्याल रखा। उन्होंने श्रीनगर पहुंचकर सेना के अधिकारियों से मुलाकात की और फिर डल झील का भ्रमण भी किया। उन्होंने ग्राम सभाओं और नयी चुनी गयी ब्लॉक डवलपमेंट कमेटीज के प्रतिनिधियों से राज्य के सामान्य होते हालात जाने। अपना अनुभव साझा करते हुए प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि हमलोग अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल के हिस्सा हैं। भारत अपने यहां शांति स्थापित करने के लिए आतंकवाद को खत्म करने में लगा है। हम इस तरह की कोशिशों का पूरा समर्थन करते हैं। प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार और श्रीनगर के स्थानीय प्रशासन का अपने स्वागत के लिए आभार जताया।

इस दल के कतिपय सांसदों ने माना कि कश्मीर में आतंकवाद एक गंभीर समस्या है। साथ ही उन्होंने यकीन जताया कि यहां की मोदी सरकार कश्मीर समस्या को सुलझा लेगी। एक एजेंसी के मुताबिक फ्रांस के सांसद हेनरी मालोसे ने तो साफ तौर पर अनुच्छेद 370 को भारत का आंतरिक मामला बताया। उन्होंने भी कहा कि आतंकवाद पूरी दुनिया की समस्या है और हम इसके खिलाफ भारत के साथ खड़े हैं। याद करना होगा कि इस दल के कश्मीर रवाना होने के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वैश्विक आतंकवाद पर इन सांसदों का ध्यान आकृष्ट किया था। उन्होंने दुनिया के किसी भी कोने में आतंकवाद के खिलाफ सभी देशों के अभियान की जरूरत बतायी थी। तो क्या मोदी ने भारत, खासकर कश्मीर में आतंकवाद की तरफ दुनिया का जो ध्यान आकृष्ट किया था, यूरोपीय यूनियन के इन सांसदों ने भी मुहर लगा दी है? इस सवाल का जवाब सकारात्मक हो सकता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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