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धूम्रपान की तस्वीर भयावह, अंकुश लगाना जरूरी

30/05/2019

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस, 31 मई पर विशेष 

सियाराम पांडेय शांत
'मरता है कोई तो मर जाए, हम दाम कमाना क्यों छोड़ें'। नशे के सौदागर चाहे वे उत्पादक हों या निर्यातक, उन पर यही सिद्धांत लागू होता है। लोगों की जिंदगी से खेलना ही उनकी प्रवृत्ति है। उन्हें बस अपने लाभ से मतलब होता है। स्वार्थ की यह प्रवृत्ति भयानक रूप से विकसित हो रही है। नशा नाश की जड़ है। यह बात सभी जानते हैं। इसके बाद भी लोग नाश करने से बाज नहीं आते। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य देशों ने 31 मई 1987 को पहली बार विश्व तम्बाकू निषेध दिवस मनाया था। तब से आज तक हर साल दुनियाभर के देशों में विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। ऐसा करते दुनिया को 32 साल हो गए लेकिन न तो धूम्रपान में कमी आई और न ही धूम्रपान रहित तम्बाकू के सेवन में। इसमें शक नहीं कि किसी भी नशे की शुरुआत शौक से होती है और अंत जानलेवा बीमारियों से होता है। नशे के खिलाफ मुहिम तो साल के सभी 365 दिन चलनी चाहिए। एक दिन की मुहिम तो रस्मी ही कही जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के उद्देश्यों पर गौर करें तो उससे यही बात झलकती है। इसमें कहा गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का इरादा तम्बाकू की खपत के विविध रूपों के संयम के 24 घंटे की अवधि को प्रोत्साहित करना है। मतलब एक दिन की सतर्कता और 364 दिन की बेफिक्री। इस एक दिन की जागरूकता देखते ही बनती है। लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी सभी सक्रिय नजर आते हैं। कोई धूम्रपान के खतरे बताती कविता लिखता है तो कोई चित्र और कोलाज बनाता है। सब अपनी-अपनी तरह से विरोध करते हैं। करना भी चाहिए। लेकिन काश, यह विरोध सातत्य बना रहता। तम्बाकू के खतरे पर गौर करें तो आंकड़ों में जाना होगा और आंकड़े हैं कि उद्वेलित किए बिना नहीं रहते। हर साल दुनिया में 70 लाख से अधिक मौत धूम्रपान की वजह से होती है। बिना धूम्रपान के तम्बाकू उत्पादों का सेवन करने वालों का आंकड़ा भी 8 लाख 90 हजार के करीब है। दुनिया में रोज 2739 लोग तम्बाकू से मरते हैं। इन मौतों को रोकने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। इस साल के विश्व तम्बाकू निषेध दिवस की थीम रखी गयी है तंबाकू और हृदय रोग। हृदय रोग की बड़ी वजहों में से एक है धूम्रपान। 2016-17 की ग्लोबल एडल्ट तम्बाकू सर्वेक्षण रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसमें कहा गया है कि भारत में 42.4 प्रतिशत पुरुष, 14.2 प्रतिशत महिलाएं और 28.8 प्रतिशत वयस्क धूम्रपान करते हैं। 29 करोड़ 90 लाख लोग धुआं रहित तम्बाकू का सेवन करते हैं। देखा जाए तो इनकी संख्या सिगरेट या बीड़ी पीने वालों से कहीं अधिक है। मध्यप्रदेश के गेट्स-2 के सर्वे 2016-17 में कहा गया है कि मध्यप्रदेश की  50.2 प्रतिशत लोग धूम्रपान के जरिये तम्बाकू का इस्तेमाल करते हैं। इनमें 17.3 प्रतिशत महिलाएं और 34.2 प्रतिशत पुरुष हैं।  
सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद तम्बाकू उत्पाद कम्पनियों ने भले ही अपने रैपर पर बहुत ही आनाकानी के बाद 'तम्बाकू हानिकारक है, इससे कैंसर हो सकता है' लिखना शुरु किया है। लेकिन लोग इसे मानने को तैयार नहीं हैं। तीन दिन पहले उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिले में जहरीली शराब के सेवन से 23 लोगों की मौत हो गयी। अभी कुछ लोग अस्पताल में इलाजरत हैं। पिछले एक दशक में हजारों लोग जहरीली शराब की चपेट में आकर जान गंवा चुके हैं। अकेले उत्तरप्रदेश में 2009 में 53, वर्ष 2010 में 62, वर्ष 2011 में 13, वर्ष 2012 में 18, वर्ष 2013 में 52, वर्ष 2014 में 5 और 2015 में 59 लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 2016 में 41, वर्ष 2017 में 18, वर्ष 2018 में 17 लोगों की मौत हुई थी। 2015 में मुंबई में 100, पश्चिम बंगाल में 2011 में 172, गुजरात में 2009 में 136, कर्नाटक और तमिलनाडु में 2008 में 180, मुम्बई में 2004 में 87 और ओडिशा में 1952 में 200 लोग जहरीली शराब का सेवन कर काल के ग्रास बने थे। इसके बाद भी देश के केवल चार राज्यों में ही शराब पर पूर्ण प्रतिबन्ध है। बिहार में शराबबंदी के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खैनी के प्रयोग पर भी प्रतिबंध लगाने की बात कही है। हालांकि प्रतिबन्ध के बावजूद चारों राज्यों में चोरी-छिपे शराब की बिक्री जारी है। राज्य सरकारें शराबबंदी को लेकर इसलिए गंभीर नहीं हो पातीं क्योंकि उन्हें सर्वाधिक आबकारी राजस्व प्राप्त होता है। बीड़ी और सिगरेट उद्योग, गुटका उद्योग से भी सरकार को बड़ी कमाई होती है। लेकिन यह एक पक्ष है। एक और बड़ा पक्ष है कि बीड़ी-सिगरेट, गुटका, तम्बाकू के प्रयोग से होने वाले हृदय रोग, कैंसर, दमा ,टीबी और दंतरोग से निजात दिलाने के लिए सरकार को हर साल अरबों रुपये खर्च करने पड़ते हैं जो आबकारी राजस्व प्राप्ति से कहीं अधिक होते हैं। शराब और तंबाकू उत्पादों पर एक साथ रोक लगाकर हम देश के आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं। 
धूम्रपान की बुराई 5000-3000 ई. पूर्व के आरंभ काल में शुरू हुई थी। पहली बार जर्मन के वैज्ञानिकों ने 1920 में पाया था कि फेफड़े के कैंसर का कारक धूम्रपान है। इसके वैज्ञानिक प्रमाण 1980 के दशक में मिले। 1920 से लेकर आज तक धूम्रपान के विरोध में चर्चा ही हो रही। विकसित देशों में भले ही तम्बाकू उत्पादों की खपत में गिरावट आई हो लेकिन विकासशील देश और खास कर वहां का गरीब तबका आज भी तम्बाकू से निजात नहीं पा सका है। आदिवासी इलाकों में तो बाकायदा तेंदू पत्ते के कारोबार के पट्टे दिए जाते हैं। कई राज्यों में तम्बाकू की खेती होती है। तर्क दिया जाता है कि अगर इस खेती पर रोक लगाई गई तो लाखों किसान सड़क पर आ जाएंगे। तंबाकू उत्पादों की फैक्ट्री बंद की गई तो लाखों मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे। उनके सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो जाएगा। कुछ हद तक यह तर्क सही भी हो सकता है। लेकिन जिस तरीके से युवा पीढ़ी खासतौर पर बच्चे तम्बाकू उत्पादों की ओर आकृष्ट हो रहे हैं, उसे देखते हुए भारत सरकार और राज्य सरकारों को यह तो तय करना ही होगा कि उन्हें देश को विकास की ओर ले जाना है या नशे के दलदल में झोंकना है। वह आमदनी किस काम की जो देश को मानसिक रूप से विक्षिप्त और शारीरिक रूप से रुग्ण बनाती हो। काश, इस देश की सरकारें इस युग सत्य पर विचार कर पातीं।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध है।)


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