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तानाशाह के सुधरने का इंतजार

13/06/2019

डॉ. प्रभात ओझा 
ड़ा अजीब है उत्तर कोरिया का यह शासक। वहां हर पांच साल बाद चुनाव होते हैं। इस बार अभी मार्च में ही हुए हैं। यह 2011 के बाद से ही हो रहा है, जब किम जोंग उन ने अपने को शासक घोषित कर लिया था। इस बार भी सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी के नेता किम जोंग उन की एकतरफा जीत की घोषणा कर दी गई। सुप्रीम पीपुल्स असेंबली वहां रबर की विधायिका मानी जाती है। हर बार 100 फीसद मतदान किम के पक्ष में ही होता रहा है। बहरहाल, किम की ताजा चर्चा कई कारणों से की जा रही है। अपने परमाणु हथियारों के निर्माण को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा में रहने वाले इस तानाशाह शासक के बारे में एक साथ कई खबरें आई हैं। कहा जाता है कि तख्ता-पलट की साजिश के आरोप में किम ने अपने एक जनरल को पिरान्हा मछलियों से भरे टैंक में फेंकवा दिया। ये मछलियां बड़ी डरावनी होती हैं और उनके दांत बेहद नुकीले होते हैं। शैतान मानी जाने वाली ये मछलियां अपने शिकार को पल भर में फाड़ डालती हैं। उत्तर कोरियाई शासक ने उन्हें ब्राजील से मंगाया था। दूसरी खबर किम जोंग उन के सौतेले भाई किम जोंग नम के बारे में है। नम की 2017 में मलेशिया में हत्या कर दी गई थी। एक विदेशी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक किम जोंग नम सीआईए (अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी) का मुखबिर था। वह चीन के भी संपर्क में रहता था। उसे कुआलालंपुर हवाई अड्डे पर एक प्रतिबंधित रसायनिक हथियार से मारा गया था। इस आरोप में दो महिलाओं को चिह्नित करने का दावा भी किया गया। हालांकि वे बाद में रिहा कर दी गईं। शक तब भी किया गया था कि उत्तर कोरिया के तानाशाह ने ही अपने सौतेले भाई की हत्या करवा दी। दक्षिण कोरियाई और अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि उत्तर कोरियाई शासक ने किम जोंग नम की हत्या अपने वंशवादी शासन को मजबूत करने के लिए कराई।  
यह जानना भी जरूरी है कि इस शासक ने इसके पहले अपने अमेरिकी राजदूत को भी मरवा दिया था। ऐसा उसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ बातचीत विफल होने के कारण किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ उन की दो बार बातचीत हो चुकी है। ट्रम्प और किम की पहली मुलाकात पिछले साल जून में हुई थी। दूसरी मुलाकात इस साल फरवरी में वियतनाम में हुई। दोनों बार बातचीत असफल होने के बावजूद, अमेरिकी राष्ट्रपति ने किम से तीसरी मुलाकात की इच्छा जताई है। पहले की दोनों बातचीत में परमाणु हथियारों पर रोक लगाए जाने पर सहमति नहीं बन पाई थी। अब ट्रंप ने यह उम्मीद जताई है कि अमेरिका के साथ उत्तर कोरिया समझौता करना चाहता है। आश्चर्य है कि ट्रंप का यह बयान उत्तर कोरिया की चेतावनी के बाद आया है। उत्तर कोरिया ने चेताया है कि उसका धैर्य टूटने से पहले अमेरिका बातचीत के अपने तरीके को बदल ले। स्पष्ट है कि उत्तर कोरिया का तानाशाह शासक अपनी शर्तों पर ही समझौता करना चाहता है। पिछली बार फरवरी में वार्ता विफल होने पर उत्तर कोरिया ने अमेरिका के सख्त रुख को ही जिम्मेदार ठहराया था। तब उत्तर कोरिया ने अपने पुराने ढर्रे पर लौटते हुए कई मिसाइल परीक्षण भी किए थे। 
असल में उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार ही मुसीबत के कारण हैं। उत्तर कोरिया सिर्फ इनका जखीरा ही नहीं एकत्र कर रहा, बल्कि उत्तर कोरिया के शासक किम जोन उन हर वक्त पूरी दुनिया को परमाणु हथियारों की धमकी देता है। इस तानाशाह की हरकत से डरने के कारण भी हैं। अपने को शक्तिवान बनाने के उसके दुराग्रह ने ही शक के दायरे में आने वाले अपने करीबियों तक को मरवाने में देर नहीं की। पूरी दुनिया से अधिक शक्तिशाली बनने के उसके हठ ने देश की हालत बेहद खराब कर ली है। किम से उसके देश के लोग बेहद डरते हैं। उसके खतरनाक हथियार रखने के पीछे देश की माली हालत पर कोई आवाज तक नहीं उठाता। हाल में जारी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर कोरिया की 43 प्रतिशत से अधिक आबादी कुपोषित है। देश के एक करोड़ 10 लाख लोगों के पास सामान्य भोजन तक की कमी है। वहां आनेवाली पीढ़ियों पर स्वास्थ्य का संकट है। अत्यंत सीमित स्वास्थ्य सुविधा और स्वच्छ पेयजल तक के अभाव के कारण ऐसी बीमारियां भी खतरनाक होती जा रही हैं, जिनका इलाज मुमकिन हो सकता है। 
देश के बहुतायत संसाधनों को हथियार पर खर्च कर देने वाले उत्तर कोरिया के तानाशाह शासक को रह-रहकर देश की बदहाली का ख्याल आता है। कभी-कभी शायद उसके अंदर का मानव भी जागता होगा। इसीलिए अमेरिका और चीन तक को परमाणु हथियारों की चेतावनी देने वाले किम जोंग उन ने दुनिया से मदद की उम्मीदें भी जताईं। देश से बाहर निकलने में बहुत कम भरोसा रखने वाले किम जोंग उन ने बहुत अधिक सुरक्षित और रहस्यमयी अपनी स्पेशल ट्रेन से चीन तक की यात्रा की। अमेरिका के दबाव में उसने बातचीत के लिए सीमा पर आकर दक्षिण कोरिया के अंदर कदम भी रखे। इन सबके बावजूद किम जोंग उन का मूल स्वभाव नहीं बदल रहा। वह मदद तो चाहता है, पर अपने हथियारों को सीमित करने की शर्त सामने आते ही बातचीत की टेबल छोड़ देता है। चीन की चार बार और रूस की यात्रा के साथ वह दो बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ भी बैठा। किम अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों में ढील चाहता है, पर हथियारों के मामले में झुकने को तैयार नहीं होता। ट्रंप जैसे शासक ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। बहुत कुछ अब दोनों की तीसरी मुलाकात पर निर्भर करेगा। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)    


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