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सामाजिक पुनर्निर्माण की मार्गदर्शिका है हिन्द स्वराज

04/11/2019

डॉ. राकेश राणा
गांधी के विचार हमेशा प्रेरणादाई रहेंगे। गांधी दर्शन नैतिक और व्यावहारिक है। गांधी ऐसा पैन्डुलम है जो दो ध्रुवों को बीच झूलता नजर आता है। जिन्हें गांधी साध्य और साधन कहते हैं, समाज वैज्ञानिक उन्हें नैतिकता और व्यावहारिकता के दो आयाम मान सकते हैं। गांधीवादी वैचारिकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पुंजों की ऐसी समग्रता है जो विकासशील समाज के लिए पहले से ज्यादा प्रासंगिक है। लेकिन उस प्रासंगिकता की स्थापना हो कैसे? असली संकट यही है। गांधी निर्विवादित ढंग से पूरी दुनिया के लिए प्रकाश पुंज हैं। आज दुनिया के सामने जितने भी संकट हैं उन सब पर गांधी 1909 में 'हिन्द स्वराज' को लिखते समय चिंतित थे। गांधी इन सभी संकटों के समाधान सुझा रहे थे। आज समाज में जो भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समस्यायें हैं, उनके लिए गांधी-विचार मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में सहायक हैं। गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, असमानता, अन्याय, भेदभाव और शोषण ये सब सामाजिक प्रगति के अवरोध हैं। समाज के सामाजिक-आर्थिक विकास में गांधी के विचार अपनी उपादेयता उस दूरदृष्टि के साथ रखते हैं।
सन 1909 में गांधी ने 'हिन्द स्वराज' पुस्तक इंग्लैण्ड से अफ्रीका लौटते समय लिखी थी। संवाद शैली में लिखी यह पुस्तक बेहद रोचक है। यह मूल रूप से गुजराती में लिखी गयी पुस्तक है। जब गांधी ने अपने प्रमुख समाचार-पत्र में इसका प्रकाशन किया तो ये विचार चर्चाओं का केन्द्र बने। सबसे पहले सन 1909 में 'इंडियन ओपिनियन' में गुजराती भाषा में हिन्द स्वराज का केन्द्रीय विचार प्रकाशन में आया और 1910 में पहली बार यह पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। गांधी उस समय जिन बातों के लिए चिंतित थे, उनका सामना हम आज कर रहे हैं। वास्तव में यह पुस्तक आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता का पोस्टमार्टम करती है। इसी पुस्तक में गांधी ग्राम-स्वराज, सत्याग्रह, स्वदेशी और सर्वोदय की अवधारणा में भारतीय चिंतन परम्परा की मौलिकता में सहेजे जीवन मूल्यों को रेखांकित करते हैं। भारत और भारतीयता के आधारभूत तत्व आध्यात्मिकता में संजोये जीवन-दर्शन को हिन्द स्वराज्य के जरिये प्रस्तुत करते हैं। गांधी की यह मौलिक दृष्टि ही उन्हें तमाम विचारकों से बहुत आगे ले जाती है। यही वजह गांधी को वैचारिक फ्रेमों में फिट करना बौद्धिक जमात के बस की बात कभी नहीं रही। 'हिन्द स्वराज' की प्रस्तावना में गांधी लिखते हैं- 'इस पुस्तक में रखे गये विचार मेरे हैं और नहीं भी हैं। वे मेरे हैं, क्योंकि उनके अनुसार आचरण करने की मुझे स्वयं से आशा है। वे मेरे अंतस में बस गए हैं और वे मेरे इस दृष्टि से नहीं हैं क्योंकि, सिर्फ मैंने उन्हें सोचा हो, ऐसी बात नहीं। दिल के भीतर में जो महसूस किया, उसका इस पुस्तक के जरिए समर्थन किया है। इस पुस्तक का विचार देश की सेवा करने, सत्य की खोज करने तथा उसके मुताबिक आचरण करने का है। अगर मेरे विचार गलत साबित हुए तो उन्हें पकड़े रखने का मेरा आग्रह कतई नहीं है। अगर वे सत्य हैं तो दूसरे लोग भी उनके मुताबिक जियें। ऐसा देश के भले के लिए करना साधारण तौर पर मेरी भावना है।'
गांधी 'हिन्द स्वराज' को प्रश्नोत्तर शैली में लिखते हैं। स्वयं के अंदर जो सवाल उपजते हैं गांधी उनके उत्तरों को समाधानात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। यही इस छोटी-सी पुस्तक का सौन्दर्य है। गांधी आत्मसंयम और सन्तुलन की कठिन दिव्य प्रकिया से गुजर रहे हैं। गांधी कहते हैं कि हिंसा आत्मबल से जाएगी। सच्ची भावना से अहिंसा का वरण करें तो एक ही दिन में स्वराज मिल जाएगा। प्रेम भाव धर्म के रूप में स्वीकार करें तो राजनीति रामराज्य ले आएगी।
गांधी 'हिन्द स्वराज' के बहाने अर्थव्यवस्था की नैतिक नियमावली निर्मित करते हैं। अहिंसा के अमोघ अस्त्र से देशों की सैन्य कमजोरी को शक्ति स्फुरण में तब्दील करने की कला सिखाते हैं। अहिंसा को शक्ति, सत्याग्रह को अस्त्र और सहनशीलता को सक्रियता में स्थापित करने का पूरा दर्शन सौंपते हैं। गांधी का राष्ट्र-निर्माण स्वराज्य शैली में शुरु होता है। सर्वोदय के साथ नए हिन्दुस्तान की नई सुबह में उसका दीदार होता है। 'हिन्द स्वराज' का पाठ प्रबल आग्रहों के साथ मशीनी सभ्यता के पर्यावरण और मानव विरोधी रवैये को समझाने की हर संभव कोशिश करता है। आर्थिक साम्राज्यवाद किस तरह गैर-बराबरी को हिंसा की छत्रछाया में पालता-पोसता है, दुनिया के अनुभव सबके सामने हैं। 'हिन्द स्वराज' दुनिया के सामने एक प्रभावी विकल्प प्रस्तुत करती है। गांधी बार-बार यह समझाते हैं कि किस प्रकार उपनिवेशी मानसिकता मानवता के लिए खतरनाक है। 'हिन्द स्वराज' का गांधी एक भविष्य-द्रष्टा की तरह पश्चिमी सभ्यता में निहित अमानवीय प्रवृतियों का पटाक्षेप करता है। वह पश्चिमी सभ्यता के अवगुणों के प्रति बार-बार सचेत करते हैं। उसे शैतानी सभ्यता कहकर उसका विरोध करते हैं। विश्व मानवता को यथार्थ को पहचानने का मार्ग सुझाते हैं। गांधी समाज के पुनर्निर्माण की मार्गदर्शिका के रुप में 'हिन्द स्वराज' का आख्यान प्रस्तुत करते हैं। ग्राम-स्वराज उनके लिए विकास का केन्द्रीय मॉडल है। गांधी वैकल्पिक टेक्नोलॉजी के साथ-साथ स्वदेशी और सर्वोदय को समाज के सशक्तीकरण का आधार बताते हैं। गांधी की समझ बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि विकास के इस मानवीय मॉडल का सही-सही अनुसरण किया जाएगा तो निश्चित एक नैतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक रुप से सक्षम तथा शक्तिशाली भारत का निर्माण संभव है। यह नया हिन्दुस्तान दुनिया को नई राह दिखाएगा। समकालीन समाज को असमानता, गरीबी, बेकारी, हिंसा, आतंक, पर्यावरणीय संकटों और विकास के मौजूदा मॉडल के परिप्रेक्ष्य में गांधी के विचार को व्यावहारिक रूप प्रदान किये जाने की जरूरत है। उसके नैतिक पुट को आदर्श लोक से सामाजिक धरातल पर सिद्ध करने की जरूरत है। जैसे जीवनभर गांधी ने स्वयं किया। समाज गांधी-विचार की प्रासंगिकता से साक्षात होना चाहता है। बौद्धिक बहसों से बाहर आकर गांधी-दर्शन के दर्शन कराने होंगे, तब बात बनेगी। उसमें समाज-वैज्ञानिकों की महती भूमिका बनती है। गांधी के विचार को अकादमिक प्रतिष्ठानों के जरिये प्रचलित ज्ञान धाराओं में प्रवाहित करने का काम अभी अधूरा पड़ा है। सामाजिक महत्त्व के इस दायित्व को समाज-विज्ञानों को उठाना ही होगा। गांधी-विचार के सैद्धांतिकीय निरुपण की कोशिश समाज के साथ मिलकर करनी होगी। तभी यह अपनी सार्थकता साबित करने की दिशा में बढ़ पाएगा।
(लेखक समाजशास्त्री हैं।)


 
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