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परिसीमन से बदलेगा जम्मू-कश्मीर का चेहरा

07/06/2019

प्रमोद भार्गव

जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के जरिए राजनीतिक भूगोल बदलने की कोशिश समस्या के हल की दिशा में उल्लेखनीय पहल है। चूंकि यह संविधान में दर्ज प्रावधानों के तहत होगी, इसलिए इसे केंद्र सरकार की मनमानी के रूप में भी नहीं देखा जा सकता है। इस लक्ष्य पूर्ति के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पद का दायित्व संभालने के साथ ही सक्रिय हो गए हैं। शाह ने तीन दशक से चली आ रही जम्मू-कश्मीर समस्या के हल के नजरिए से एक उच्चस्तरीय बैठक आहूत कर इस राज्य में विधानसभा क्षेत्रों का नए सिरे से सीमा-निर्धारण के लिए परिसीमन पर गंभीरता से विचार शुरू किया है। इसके लिए परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा? यह आयोग जम्मू, कश्मीर और लद्दाख संभाग के वर्तमान राजनीतिक भूगोल का अध्ययन कर रिपोर्ट देगा। आयोग राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में मौजूदा आबादी और उसका विधानसभा व लोकसभा क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का आकलन करेगा। साथ ही राज्य में अनुसूचित व अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों को सुरक्षित करने का भी अहम निर्णय लेगा। परिसीमन के नए परिणामों से जो भौगोलिक, सांप्रदायिक और जातिगत असमानताएं हैं, वे दूर होंगी। 

जम्मू-कश्मीर में अंतिम बार 1995 में परिसीमन हुआ था। राज्य का संविधान कहता है कि हर 10 साल में परिसीमन जारी रखते हुए जनसंख्या के घनत्व के आधार पर विधानसभा व लोकसभा क्षेत्रों का निर्धारण होना चाहिए। परिसीमन का यही समावेशी नजरिया है। जिससे बीते 10 साल में यदि जनसंख्यात्मक घनत्व की दृष्टि से कोई विसंगति उभर आई है तो वह दूर हो जाए और समरसता पेश आए। इसी आधार पर राज्य में 2005 में परिसीमन होना था, लेकिन 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने राज्य संविधान में संशोधन कर 2026 तक इसपर रोक लगा दी थी। इसके लिए बहाना बनाया कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े आने तक परिसीमन नहीं होगा। अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने 2002 में कुलदीप सिंह आयोग गठित कर परिसीमन प्रक्रिया शुरू की थी। दरअसल, अब्दुल्ला और सईद घरानों की यह मिलीभगत आजादी के बाद से ही रही है कि इस राज्य में इन दो परिवारों के अलावा अन्य कोई व्यक्ति शासन न कर पाए। हालांकि अब यह मिथक बना रहना मुश्किल है। दरअसल, कानूनी विषेशज्ञों का मानना है कि इस संशोधन को राज्यपाल सत्यपाल मलिक अध्यादेश के जरिए खारिज कर सकते हैं लेकिन अध्यादेश लागू होने के बाद छह माह के भीतर चुनाव कराना बाध्यकारी होगा।

फिलहाल जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की कुल 111 सीटें हैं। इनमें से 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर क्षेत्र में आती हैं। इस उम्मीद के चलते ये सीटें खाली रहती हैं कि एक न एक दिन पीओके भारत के कब्जे में आ जाएगा। फिलहाल बाकी 87 सीटों पर चुनाव होता है। इस समय कश्मीर यानी घाटी में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में 4 विधानसभा सीटें हैं। 2011 की जनगणना के आधार पर राज्य में जम्मू संभाग की जनसंख्या 53 लाख 78 हजार 538 है। यह प्रांत की 42.89 प्रतिशत आबादी है। राज्य का 25.93 फीसदी क्षेत्र जम्मू संभाग में आता है। इस क्षेत्र में विधानसभा की 37 सीटें आती हैं। दूसरी तरफ कश्मीर घाटी की आबादी 68 लाख 88 हजार 475 है। प्रदेश की आबादी का यह 54.93 प्रतिशत भाग है। कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल राज्य के क्षेत्रफल का 15.73 प्रतिशत है। यहां से कुल 46 विधायक चुने जाते हैं। इसके अलावा राज्य के 58.33 प्रतिशत वाले भू-भाग वाले लद्दाख संभाग में महज 4 विधानसभा सीटें हैं। साफ है, जनसंख्यात्मक घनत्व और संभागवार भौगोलिक अनुपात में बड़ी असमानता है, जनहित में इसे दूर किया जाना, एक जिम्मेदार सरकार की जवाबदेही बनती है। केंद्र सरकार परिसीमन पर इसलिए भी जोर दे रही है, जिससे अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए भी सीटों के आरक्षण की नई व्यवस्था लागू की जा सके। फिलहाल कश्मीर में एक भी सीट पर जातिगत आरक्षण की सुविधा नहीं है, जबकि इस क्षेत्र में 11 प्रतिशत गुर्जर बकरवाल और गद्दी जनजाति समुदायों की बड़ी आबादी निवास करती है। जम्मू क्षेत्र में सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं लेकिन इनमें आजादी से लेकर अबतक क्षेत्र का बदलाव नहीं किया गया है। इस राज्य की विधानसभा में प्रतिनिधत्व की इसी असमानता को दूर करने के लिए परिसीमन आयोग का गठन जरूरी है।

वर्तमान स्थितियों में जम्मू क्षेत्र से ज्यादा विधायक, कश्मीर क्षेत्र से चुनकर आते हैं। जबकि जम्मू क्षेत्र कश्मीर से बड़ा है। इसे लक्ष्य करते हुए तुलनात्मक दृष्टि से जम्मू संभाग में ज्यादा सीटें चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में यह भी विडंबना है कि राज्य में जो भी परिसीमन हुए हैं, उनमें भूगोल और जनसंख्या को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। नतीजतन, राज्य की विधानसभा में जम्मू और लद्दाख संभागों से न्यायसंगत प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा है। भाजपा और जम्मू संभाग का नागरिक समाज इस असमानता को दूर करने की मांग 2008 से निरंतर कर रहा है लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। जबकि कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद जब इस राज्य के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने स्वयं परिसीमन आयोग गठित करने की पहल की थी लेकिन पीडीपी व नेशनल कॉन्फ्रेंस के विरोध के चलते आयोग का गठन संभव नहीं हुआ। इसीलिए अब जब आयोग के गठन का मुद्दा जोर पकड़ रहा है तो पीडीपी अध्यक्ष व राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने तो यहां तक कह दिया कि ‘यदि विधानसभा सीटों का पुनर्गठन जबरन किया गया तो सांप्रदायिक आधार पर एक और भावनात्मक विभाजन थोपना तय है। सरकार पुराने जख्मों को भरने की बजाय नया दर्द दे रही है।‘ दूसरी तरफ विस्थापितों के लिए संघर्षरत नेशनल पेंथर पार्टी के अध्यक्ष भीम सिंह ने आयोग के गठन का स्वागत किया है। उनका तो यहां तक कहना है कि ‘कांग्रेस ने फारुख अब्दुल्ला के साथ मिलकर जम्मू क्षेत्र के साथ पक्षपात किया है।‘ भीम सिंह या भाजपा ही नहीं यदि परिसीमन होता है तो इसका समूचा देश स्वागत करेगा। परिसीमन को लेकर महबूबा का जो बयान आया है, वह अलगाववाद की पैरवी करता है। जबकि अलगाववाद और आतंकग्रस्त घाटी को पटरी पर लाने के लिए परिसीमन एक संवैधानिक व्यवस्था है। 

आतंकवाद के चलते यह राज्य ऐसी दुर्दशा और अवसाद का शिकार हो गया है कि यहां बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय को छोड़ अन्य सभी समुदायों के लोग निराशा के भंवर में डूब रहे हैं। उनकी आबादी का प्रतिशत अच्छा-खासा है, बावजूद उन्हें अपनी ही मातृभमि पर शरणार्थियों का जीवन जीना पड़ रहा है। 2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार जम्मू में हिंदू आबादी 65.23, कश्मीर में 1.84 और लद्दाख में 6.22 प्रतिशत है। इसी तरह बौद्ध आबादी जम्मू में 0.51, कश्मीर में 0.11 और लद्दाख में 45.87 प्रतिशत है। सिख आबादी जम्मू में 3.57, कश्मीर में 0.88 और लद्दाख में शून्य प्रतिशत है। जम्मू को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी अधिक है। जम्मू में यह 30.69, कश्मीर में 97.16 और लद्दाख में 47.40 प्रतिशत है।

कश्मीर में जब कभी समानता का प्रयास किया जाता है तो अब्दुल्ला और महबूबा अलगाववाद की भाषा बोलने लगते हैं। जबकि उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि लाॅर्ड एवबरी की अध्यक्षता में ब्रिटेन स्थित संस्था ‘फ्रेंडस ऑफ कश्मीर‘ ने एमओआरआई संगठन से 2002 में एक सर्वेक्षण कराया था, जिसमें दो विकल्प दिए गए थे। 61 प्रतिशत लोगों ने भारत के साथ रहने का विकल्प चुना था, जबकि मात्र छह प्रतिशत लोग पाकिस्तान के पक्षधर थे। यह सर्वे अलगाववादियों के मुंह पर करारे तमाचे की तरह था लेकिन नरेंद्र मोदी से पहले की केंद्र सरकारें अलगाववादियों की ही पक्षधर बनी रहकर उनकी हित-साधक बनी रहीं, नतीजतन अलगाववादियों के हौसले बुलंद होते रहे, जो कश्मीर की बद्हाली का कारण बने। आयोग का गठन राज्यपाल का संवैधानिक अधिकार है न कि कोई जबरिया कोशिश? कश्मीर के परिप्रेक्ष्य में धारा 370 को भी संविधान सभा ने अस्थाई माना है। यही प्रावधान वर्तमान में भी लागू है। 1952 के बाद कश्मीर में जो कानून लागू किए गए हैं, उनकी समीक्षा के लिए भी संवैधानिक आयोग बनाने का प्रावधान है लेकिन जब केंद्र व राज्य सरकारें यथास्थिति बनी रहने में ही जम्मू-कश्मीर के हित के मुगालते में रहे हों तो संवैधानिक प्रावधान खुद ही लागू होने से हो रहे। बहरहाल जम्मू-कश्मीर राज्य के हित में गृहमंत्री अमित शाह ने जो संवैधानिक इन्छा शक्ति जताई है, उसके स्वागत के साथ क्रियान्वयन जरूरी है। 

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं)


 
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