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गिरफ़्तारी पर सियासत

22/10/2019

गिरफ़्तारी पर सियासत

जितेन्द्र चतुर्वेदी

पी. चिदंबरम की गिरफ़्तारी राजनीतिक है। यह सुनने में अजीब लगेगा। लेकिन माहौल यही बनाया जा रहा है। उनका परिवार तो इस मुहिम में लगा ही है। जो स्वभाविक है। पर उसके अलावा कांग्रेस भी इसी में लगी है। वह गिरμतारी को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह का चिदंबरम से मिलना, इसका संकेत है। पूर्व प्रधानमंत्री ने जो बयान दिया, उसने संकेत को पुख्ता कर दिया। वे कहते हैं, ‘आईएनएक्स मीडिया मामले में चिदंबरम ने अकेले निर्णय नहीं लिया था। दर्जन भर अधिकारियों ने उस फाइल पर हस्ताक्षर किया था। उनमें छह तो सचिव थे। अगर उनकी कोई गलती नहीं है तो फिर चिदंबरम की गलती कैसे हो सकती है।’ उन्होंने आगे कहा कि हमारे यहां निर्णय सामूहिक होते हैं। इसलिए किसी भी गलती के लिए किसी एक व्यक्ति को नहीं घेरा जा सकता। जाहिर है डॉ. मनमोहन सिंह गिरμतारी पर सवाल खड़ा कर रहे हैं।

चिदंबरम इन दिनों तिहाड़ जेल में हैं। आरोप हवाला का है और मामला आईएनएक्स मीडिया से जुड़ा है। ईडी को अभी पूछताछ करनी है। इसलिए उन्हें न्यायित हिरासत में रखा गया है। लेकिन कांग्रेस का दावा है कि उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध के कारण हिरासत में रखा गया है। उनके खिलाफ कोई मामला नहीं बनता। सोशल मीडिया पर तो बाकायदा अभियान चल रहा है। कांग्रेस उसे आगे बढ़ा रही है। उसमें कहा गया है कि चिदंबरम का मौलिक अधिकार खतरे में हैं। उन्हें जेल में जो जरूरत की चीजें है, वह भी मुहैया नहीं कराई जा रही है।

कांग्रेस उसे सही मान रही है और उसका समर्थन कर रही है। वह तो पहले दिन से ही इसको राजनीतिक रंग देने की फिराक में है। 21 अगस्त की तारीख याद ही होगी। इसी दिन पी. चिदंबरम को सीबीआई ने हिरासत में लिया था। उसके पहले जो हुआ था, वह राजनीति ही था। चिदंबरम 36 घंटे से लापता थे। जांच एजेंसी उन्हें खोज रही थी। उनकी खोज 21 अगस्त को रात 8 बजे तब खत्म हुई, जब वे कांग्रेस मुख्यालय में दिखे। वहां वे प्रेस कांफ्रेंस करने आए थे। कायदे से उन्हें सीबीआई मुख्यालय जाना चाहिए था। एक जिम्मेदार नागरिक का परिचय देना चाहिए था। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। जाहिर है उनका इरादा राजनीति करने था। इसलिए वे कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड गए। वहां पहले से सारे दिग्गज कांग्रेसी मौजूद थे। प्रेस वार्ता का समय रात्रि 8.15 का रखा गया था। मीडिया को बाकायदे सूचना दी गई थी। उसमें कहीं पी.चिदंबरम का नाम नहीं था। लेकिन पत्रकारों को खबर थी कि मजमा उनके लिए ही लगा है। उनकी खबर सही निकली। चिदंबरम प्रकट हुए। मीडिया के सामने अपना पक्ष रखा और बताया कि वे राजनीतिक प्रतिशोध के शिकार हैं। उन्हें और आलाकमान को लगा था कि इसकी तीखी प्रतिक्रिया होगी। कार्यकर्ता सड़क पर उतर आएंगे और चिदंबरम को गिरμतार करना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के समर्थन के बाद भी कार्यकर्ता बाहर नहीं आए और सीबीआई उन्हें ले गई। इन दिनों वे तिहाड़ में हैं। आरोप हवाला का है और मामला आईएनएक्स मीडिया से जुड़ा है। ईडी को अभी पूछताछ करनी है। इसलिए उन्हें न्यायित हिरासत में रखा गया है। लेकिन कांग्रेस का दावा है कि उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध के कारण हिरासत में रखा गया है। उनके खिलाफ कोई मामला नहीं बनता।

सोशल मीडिया पर तो बाकायदा अभियान चल रहा है। कांग्रेस उसे आगे बढ़ा रही है। उसमें कहा गया है कि चिदंबरम का मौलिक अधिकार खतरे में हैं। उन्हें जेल में जो जरूरत की चीजें हैं, वह भी मुहैया नहीं कराया जा रहा है। याचिका में आगे लिखा है कि जिस मामले में उन्हें गिरμतार किया गया है, वह दस साल पुराना है। सीबीआई ने उसमें अभी तक कोई चार्जशीट दाखिल नहीं किया। जाहिर है पूरा मामला ही बोगस है। लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे चंद लोगों को खुश करने के लिए, चिदंबरम को गिरμतार किया गया है। कमोवेश यही भाषा मीडिया दिग्गज एन राम की है। वे राफेल की ही तरह चिदंबरम के लिए भी अभियान चला रहे हैं। उनका कहना है कि चिदंबरम के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता। उन्हें जिस केस में गिरμतार किया गया है, उसका कोई प्रमाण एजेंसी के पास नहीं है। वे आगे कहते हैं कि अगर सबूत के तौर पर कुछ है तो वह हत्या के आरोपी का बयान। एन राम यह बात तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी में बोल रहे थे। वे जो कह रहे हैं, वह कांग्रेस कह रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वकाई में यह राजनीतिक प्रतिशोध है? इस सवाल का जवाब चिदंबरम को भी पता है और कांग्रेस को भी। दोनों ही जानते हैं कि सप्रंग सरकार के दौरान क्या हुआ है। उस समय हेराफेरी का जो दौर चला था, वह भारतीय इतिहास का काला अध्याय है। उसी को जांच एजेंसियां खोल रही है। उसका स्वागत होना चाहिए। पर कांग्रेस उसके विरोध में खड़ी है। यह उसका स्वभाव है।

वह सौदा शीशे की तरह साफ था। पर कांग्रेस ने उस पर भी राजनीति की। अब यही चिदंबरम की गिरμतारी पर भी हो रहा है। पूरा देश चिदंबरम की हेराफेरी से वाकिफ है।

सच के साथ खड़ा रहना कांग्रेस ने कभी सीखा ही नहीं। झूठ उसका हथियार है। राफेल इसकी मिसाल है। वह सौदा शीशे की तरह साफ था। पर कांग्रेस ने उस पर बी राजनीति की। अब यही चिदंबरम की गिरμतारी पर भी हो रहा है। पूरा देश चिदंबरम की हेराफेरी से वाकिफ है। उसे यह भी पता है कि आईएनएक्स मीडिया वाले मामले की कहानी क्या है। यह उनकी हेराफेरी का अकेला किस्सा नहीं है। आयकर अधिकारियों की माने तो पी.चिदंबरम भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। कांग्रेस इससे परिचित है। लेकिन फिर भी वह चिदंबरम के साथ खड़ी है। उसमें कोई बुराई नहीं है। वे पार्टी कार्यकर्ता है। कहा जाता है कि फंड का प्रबंधन भी उनके हाथ में है। इसलिए पार्टी का उनके साथ खड़े रहना समझ में आता है। लेकिन उन पर लगे आरोप को खारिज करना, जनमत के खिलाफ जाना है। इसे कांग्रेस समझने को तैयार नहीं है। उसे लगता है कि चिदंबरम पर लगे आरोप को वह राजनीतिक रंग दे सकती है। जो एक छलावे से ज्यादा कुछ नहीं है। हां, कुछ लोग कांग्रेस की इस मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन उनकी जनमत में कोई विशेष भूमिका नहीं है। उस याचिका को ही लें, जो 21 सितंबर से सोशल मीडिया पर टहल रही है। खबर लिखे जाने तक एक सप्ताह बीत चुका था। इतने दिनों में चिदंबरम के समर्थन में महज 8000 लोग ही खड़े हुए।

कहने का मतलब यह है कि आठ दिन में सिर्फ 8000 लोग चिदंबरम को बेगुनाह मानने वाले मिले। बाकी लोग को उनकी बेगुनाही पर भरोसा नहीं है और न ही याचिका में लिखे शब्दों पर। उन्हें अगर किसी पर भरोसा है तो वह जांच एजेंसियों पर है। वे जानते हैं कि एजेंसियां सही कर रही है और कांग्रेस राजनीति। यह बात खुल कर सामने आने लगी है। कारण, चिदंबरम पर लगने वाले आरोपों का सिलसिला थम नहीं रहा है। उन पर एक के बाद एक आरोप लगते जा रहे हैं। पिछले दिनों जिग्नेश शाह ने भी चिदंबरम पर आरोप लगाया है। एक दौर में वे शेयर बाजार के बादशाह हुआ करते थे। कॉमोडेटी स्टॉक एक्सचेंज की शुरूआत उन्होंने ही की थी। इससे बाजार में क्रांति में आ गई थी। छोटे-छोटे व्यापारी भी इससे जुड़ गए। उन लोगों को एक ही झटके में राष्ट्रीय बाजार मिल गया था। उनकी आमदनी भी अच्छी होने लगी थी। यह अपनी तरह का नया प्रयोग था। इसमें खाद्य पदार्थों को खरीदा और बेचा जाता था। इसे शेयर के तर्ज पर विकसित किया गया था। वहां पर विभिन्न कंपनियों के शेयर खरीदे और बेचे जाते हैं। उसके उलट कॉमोडेटी स्टाक एक्सचेंज में दलहन, तिलहन, आलू, टमाटर, प्याज जैसे उत्पाद को खरीदा-बेचा जाता था। जिग्नेश शाह ने यह मॉडल विकसित किया था। 2004 में उसने इस पर काम शुरू कर दिया था। उसका यह धंधा चल पड़ा।

कांग्रेस उनके लिए अभियान चला रही है। उन्हें निर्दोष कह रही है। यह किसी की निजी राय हो सकती है। उसमें कोई हर्ज भी नहीं है। लेकिन कांग्रेस तो उसी राय पर जनमत बनाने में लगी है। उसे लगता है कि इसी के सहारे कांग्रेस और चिदंबरम की नैया पार होगी।

जिग्नेश शाह की मानें तो यह बात चिदंबरम को खटने लगे। उनको कॉमोडेटी स्टॉक एक्सचेंज का धंधा फूटी आंख नहीं भा रहा था। वह इसलिए क्योंकि जिग्नेश शाह उसे चला रहे थे। उनका पूरा बाजार पर एक तरह से कब्जा हो चुका था। इससे चिदंबरम के औद्योगिक दोस्तों को नुकसान होने लगा था। यह बात उन्हें नगावार गुजरी। तो वे जिग्नेश शाह की दुकान बंद करने पर उतारू हो गए। रोजगार के नजरिए से यह आत्मघाती कदम था। कारण, तकरीबन दस लाख लोग इस क्षेत्र से लाभ ले रहे थे। इस पर किसी तरह की कार्यवाही करने का मतलब था दस लाख लोगों के पेट पर लात मारना। लेकिन इसकी चिंता न तो चिदंबरम को थी और न ही कांग्रेस सरकार को। वह तो सत्ता के नशे में चूर थी। उसका खामियाजा उन दस लाख लोगों को भुगतना पड़ा, जो कॉमोडेटी स्टॉक एक्सचेंज पर पूरी तरह से निर्भर थे। उन्हें चिदंबरम ने एक झटके में सड़क पर ला कर खड़ा कर दिया। किया कैसे? उसका किस्सा जिग्नेश शाह खुद बयान करते हैं। वे कहते हैं कि स्टॉक एक्सचेंज का काम चल पड़ा। यह बात बहुत लोगों को पसंद नहीं आई। वे हमारा काम बंद करना चाहते थे। उन्हें इसके लिए बस वित्तमंत्री तक बात पहुंचानी थी। यह उनके लिए कोई मुश्किल काम नहीं था। उनकी जान पहचान पुरानी जो थी। वे वित्तमंत्री के खास थे। इसलिए मंत्रालय में गुहार लगाई। वह सुनी भी गई। आयकर विभाग को हमारे पीछे लगा दिया गया। उसके बाद छापेमारी का सिलसिला चल पड़ा। जिग्नेश शाह की मानें तो उनका कोई दμतर छोड़ा नहीं गया। हर जगह छापा पड़ा। रकम भी तय की गई थी कि वहां कितना मिलेगा। कहा गया था कि जिग्नेश के दμतर में 300 करोड़ रु मिलेगा। पर मिला कुछ नहीं। लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ा।

छापेमारी बंद नहीं हुई। एक बार तो अधिकारियों ने चिदंबरम को बताया भी कि कुछ नहीं मिल रहा। पर उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ा। वे तो एनएसई को फायदा पहुचाने में लगे थे। वहीं उनके खास लोगों का बसेरा था, जो कमोडिटी स्टॉक एक्सचेंज की वजह से उजड़ने की कगार पर खड़ा था। इससे वित्तमंत्री के कई राजदार दिक्कत में आ जाते। जो मंत्री को मंजूर नहीं था। इसलिए तय हुआ कि कॉमोडिटी स्टॉक एक्सचेंज को खत्म कर देना है। उसी के तहत विदेश निवेश को कॉमोडिटी स्टॉक एक्सचेंज में आने से रोक दिया गया। जिग्नेश शाह कहते हैं कि बात यही खत्म नहीं हुई। एलआईसी और नाबार्ड से कहा गया कि वह एनएसई के शेयर खरीदें। उन्होंने खरीदा। यह सब इसलिए हो रहा था ताकि लोगों का भरोसा एनएसई में बढ़े। तभी वे कॉमोडिटी स्टॉक एक्सचेंज के बजाए वहां निवेश करते। जब निवेश नहीं रोक पाए तो कानूनी दांव पेंच शुरू हो गया। सरकार में वे थे, इस वजह से मनमाने तरीके से काम करने लगे। मसलन कॉमोडिटी स्टॉक एक्सचेंज कृषि मंत्रालय में आता है। लेकिन उसके लिए कानून वित्त मंत्रालय ने बनाया। यह साधारण बात नहीं थी। पर चिदंबरम कुछ भी कर सकते थे। उन्होंने किया भी। मुद्रा व्यापार का मामला उसकी मिसाल है। कॉमोडेटी स्टॉक एक्सचेंज को मुद्रा व्यापार की अनुमति नहीं दी गई। उसके लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। सेबी ने भी साथ नहीं दिया। चार साल मुकदमा चला। तब जाकर मुद्रा व्यापार करने की अनुमति मिली। लेकिन फिर भी चिदंबरम ने धंधा नहीं करने दिया। यह चिदंबरम की कई कारनामों में से बस एक है। कांग्रेस भी इसे जानती है। लेकिन राजनीति है कि आरोपी को आरोपी कहने से रोक रही है। यही कांग्रेस का स्वभाव बन गया है। इसमें उसकी भी कोई गलती है नहीं।

सरकार जिस तरह से काम कर रही है, उससे कांग्रेस को कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है। लिहाजा जो मुद्दा नहीं, उस पर भी कांग्रेस राजनीति करने लगी है। चिदंबरम का मामला वैसा ही है। इसमें राजनीति जैसा कुछ है नहीं। उन पर हेराफेरी का सीधा आरोप है। आरोप वह लगा रहा है, जिसने उन्हें रिश्वत दी है। उसने सीबीआई के सामने जो बयान दिया है, वह बस रिश्वत तक सीमित नहीं है। इसके बाद भी कांग्रेस उनके लिए अभियान चला रही है। उन्हें निर्दोष कह रही है। यह किसी की निजी राय हो सकती है। उसमें कोई हर्ज भी नहीं है। लेकिन कांग्रेस तो उसी राय पर जनमत बनाने में लगी है। उसे लगता है कि इसी के सहारे कांग्रेस और चिदंबरम की नैया पार होगी।


 
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