नवोत्थान

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यहां गूंजती है गांधीजी की आवाज

02/07/2019

यहां
गूंजती है गांधीजी की आवाज



एक साधारण आदमी के महात्मा बनने की कहानी देखनी हो तो आपको प्रवासी भारतीय केन्द्रआना
होगा। यह केंद्र दिल्ली के चाणक्यपुरी में स्थित है। यहां अत्याधुनिक प्रवासी डिजिटल
संग्रहालय तैयार किया गया है। इसमें गांधीजी के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं को
जीवंतता के साथ दर्शाया गया है।



दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए मोहनदास करमचंद गांधी जिस राह चलकर जन-नायक के
रूप में उभरे, उसका डिजिटल संस्करण के जरिए सुंदर प्रस्तुतिकरण संग्रहालय में किया
गया है। संग्रहालय की दीवारों पर गांधीजी से जुड़े कई दुर्लभ चित्र दिखाई देते
हैं, जिससे हमलोग अबतक अज्ञात ही रहे हैं। यह तो ध्यान ही होगा कि महात्मा गांधी
दक्षिण अफ्रीका में 21 वर्षों तक रहे। इस लंबी अवधि में उन्हें कई मुश्किल
परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। उन कठिन परिस्थितियों के बीच रहते हुए महात्मा गांधी
संभावनाओं की तलाश करते थे और लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए। छाया-चित्रों
में कैद उन्हीं लम्हों को डिजिटल माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इसके
प्रस्तुतिकरण में ऑडियो-वीडियो माध्यम का सुंदर उपयोग किया गया है, जिससे
संग्रहालय जीवंत प्रतीत होता है।



दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी पत्र-पत्रिकाओं को निकालने के लिए जिस छपाई
मशीन का इस्तेमाल करते थे, उस मशीन का प्रतिरूप संग्रहालय में रखा है। वह मशील
यहां आने वालों को अपनी तरफ आकर्षित करती है। महात्मा गांधीजी में रुचि रखने वालों
के लिए यह डिजिटल संग्रहालय आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। देश-दुनिया से लोग यहां
आ रहे हैं। अब तक 120 देशों के लिए इस संग्रहालय को देखने आ चुके हैं। स्कूली
बच्चों का यहां तांता लगा रहता है। प्रवासी डिजिटल संग्रहालय के सूत्रधार विरद
राजाराम याज्ञनिक हैं। 2 अक्टूबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका
उद्घाटन किया था।
संग्रहालय में
गांधीजी के पसंदीदा भजन के साथ-साथ उनकी आवाज भी सुनाई देती है। एक सेल्फी प्वाइंट
भी है, जहां नई पीढ़ी गांधीजी के साथ सेल्फी लेने का लुत्फ उठा सकती है। एक अच्छी
बात यह है कि संग्रहालय में आने वाले अपने सुझाव डिजिटल माध्यम के जरिए दे सकते
हैं। यहां मोहनदास से महात्मा बनने की कहानी एक फिल्म के जरिए भी दिखाई जाती है।
वह फिल्म 1.30 घंटे की है। फिलहाल
संग्रहालय की देख-भाल विदेश
मंत्रालय कर रहा है।



वैसे तो यह संग्रहालय
प्रवासी भारतीयों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, लेकिन यह हर किसी के लिए
दिलचस्पी का केंद्र बना हुआ है। प्रवासी डिजिटल
संग्रहालय के सूत्रधार विरद राजाराम याज्ञनिक कहते हैं कि महात्मा गांधी के
विचारों को डिजिटल माध्यमों के जरिए युवाओं को जोड़ने का काम किया गया है। इस
संग्रहालय को दुनिया के ज्यादातर देशों तक पहुंचाने की कोशिश हो रही है ताकि युवा प्रवासी
भारतीय गांधीजी के विचारों को अधिक से अधिक जान-समझ सकें।



गांधीजी को जानने-समझने के मसले पर विरद याज्ञनिक यह स्पष्ट
करना चाहते हैं की उनकी पीढ़ी को गांधीजी को देखने
, पढ़ने
और सुनने के अवसर मिलते रहे
, लेकिन उस गांधी से साक्षात्कार
कभी नहीं हुआ, जिन मूल्यों के लिए गांधीजी ने अपना जीवन समर्पित किया। सच तो यही
है कि गांधीजी हमारे सामने रुपए, पोस्टल स्टाम्प और अखबारों के विज्ञापन में दिखे।
उनकी पीढ़ी न ही खादी से जुड़ी हुई रही, न ही गांधीजी के अहिंसा से। उनकी पीढ़ी ने
देश में राजनीति और भ्रष्टाचार को देखा है। जिस चरखा का प्रयोग सत्य के रूप में गांधी
ने किया था, उसे हमने एक शोभा की वास्तु के रूप में देखा है। सच तो यह है कि हमारी
पीढ़ी में गांधी के
सत्य के प्रयोग से
सीखने की क्षमता ही नही हैं। हम उनके बारे में सतही जानकारी तक सीमित हो गए हैं। हमने
गांधीजी को पूर्णतया में समझने का प्रयास नहीं किया है। हमेशा अधूरी चीजों में
फंसे रहते हैं।



विरद याज्ञनिक मानते हैं कि समय बदल चुका है। समय इस बात का
है कि गांधीजी के सिद्धांतों को समझते हुए उनके द्वारा मानवता के लिए किए गए
कार्यों के आधार पर भविष्य का रास्ता तैयार किया जाए। हमें इस बात को स्पष्ट रूप
से समझना होगा की गांधी मानव मूल्यों के असाधारण वैज्ञानिक थे, इसीलिए उनके द्वारा
किए गए प्रयोगों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।



विरद राजाराम याज्ञनिक



विरद राजाराम याज्ञनिक
लेखक और क्यूरेटर हैं। उनकी पहचान एक प्रखर वक्ता की भी है।
महात्मा
गांधी को जानने में इसकी गहरी दिलचस्पी रही है। गांधीजी के अनछुए पहलू को खंगालकर
सामने लाना और इस क्रम में मिलने वाली संग्रहणीय वस्तु को इकट्ठा करने में पूरा
समय लगा रहे हैं। इनकी रुचि संग्रहालय में भी है। यही वजह है कि गांधीजी के
प्रवासी जीवन पर एक डिजिटल संग्रहालय का निर्माण कर रहे हैं।



2010 में विरद याज्ञनिक की अंग्रेजी में एक
पुस्तक आई थी, जिसका नाम है- एमकेजी- पीस ट्रस्ट अहिंसा। इस पुस्तक का लोकार्पण
संयुक्त राष्ट्र अध्यक्ष ने
विश्व अहिंसा दिवस पर किया था। इस पुस्तक में शोध कार्य के जरिए उन्होंने पूरी दुनिया को
अपने लेखन का लोहा मनवाया। इस पुस्तक का नौ भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। वे
दुनिया के कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में समय-समय पर अपने विचार रख चुके हैं। मई
2013 की बात है, डरबन यूनिवर्सिटी ने उन्हें 21वीं सदी में महात्मा गांधी विषय पर
बोलने के लिए आमंत्रित किया था। उसी वर्ष अक्टूबर में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अपनी
बात रखी और गांधी वॉल की स्थापना की। याज्ञनिक ने विश्व स्तर का
21वीं सदी में गांधी पर शांति अहिंसा संवाद डिजिटल म्यूजियम तैयार किया है।



एक स्थान पर उन्होंने लिखा है- मेरा जन्म गांधीजी के जन्म से ठीक सौ साल बाद और मृत्यु के बीस वर्ष बाद
हुआ है। हालांकि मुझे न तो गांधीजी को सुनने का मौका मिला, न ही देखने का। लेकिन
अपनी दादी निवेदिताजी के जरिए गांधीजी को सुनता आ रहा हूं। दादी की बहन तरुनिका की
चरखा और स्कूल के पाठ्य पुस्तक ने मुझे गांधी का अर्थ बचपन में ही कराया।
आगे वे कहते हैं कि इन बातों के अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष दो अक्टूबर को
देश में गांधी जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश और 30 जनवरी पर उनको दी जाने वाली मौन
श्रद्धांजलि भी हमें हमेशा गांधी को स्मृति में बनाए हुए है। 1982 में जब रिचर्ड
एडनबरो की फिल्म गांधी प्रदर्शित हुई थी तो विरद महज 14 साल के थे। उस फिल्म के
बाद अगले 20 वर्षों तक गांधीजी को जानने और समझने के कई अवसर विरद याज्ञनिक के
जीवन में आए।


 
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