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रावण-दहन से ज्यादा जरूरी है मैकाले-मर्दन

07/10/2019

मनोज ज्वाला

रावण के हाथों भारत की संस्कृति-सुता सीता का अपहरण जरूर हुआ था, किन्तु हमारी संस्कृति का प्रदूषण कतई नहीं हुआ था। भारतीय संस्कृति की पवित्रता-प्रखरता अक्षुण्ण ही कायम रही थी। वेदों-पुराणों-शास्त्रों में न किसी तरह का कोई आसुरी प्रक्षेपण हुआ था, न ही उनके अनुवाद के नाम पर उनका अभारतीयकरण और न ही किसी भारतीय का धर्मान्तरण। जबकि असुराधिपति रावण-विरचित 'शिव-ताण्डव' और 'लाल किताब' नामक दो ऐसे ग्रन्थ हमारे प्राचीन वाङ्ममय में शामिल हो गए जो शिवोपासना और ज्योतिषीय विवेचना के क्षेत्र में आज भी सर्वस्वीकार्य हैं। बावजूद इसके स्वर्णिम लंका की असुर (अ)सभ्यता के विस्तारवाद का संवाहक होने के कारण वह उद्भट्ट शिवोपासक रावण कभी भी हमारे समाज का आदर्श नहीं बन सका। सदैव निन्दनीय ही बना रहा। इतना और इस कदर कि आज भी हर वर्ष विजयादशमी के अवसर पर पुतला-दहन का शिकार होता रहा है।
किन्तु, कालान्तर बाद सात-समन्दर पश्चिम पार यूरोप की नस्लभेदी यांत्रिक (अ) सभ्यता-जनित औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के संवाहक मैकाले-मैक्समूलर ने हमारी किसी सीता का अपहरण किये बगैर ऐसा अनर्थ बरपा रखा है जैसा रावण व महिषासुर ने भी नहीं बरपाया था। थॉमस मैकाले ने ईसाई-विस्तारवाद की षड्यंत्रकारी औपनिवेशिक योजना के तहत हमारे देश पर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति थोपकर हमारी पीढ़ियों के मन-मानस का ऐसा अंग्रेजीकरण कर दिया कि हमारी संस्कृति प्रदूषित होती जा रही है। उधर, मैक्समूलर ने हमारे धर्मशास्त्रों-ग्रन्थों को विकृत कर आर्य बनाम द्रविड़ का बौद्धिक वितण्डा खड़ा करते हुए सामाजिक विखण्डन की दरारें खोदकर उनमें धर्मान्तरण का सदाबहार बीज बो दिया। नतीजा यह हुआ कि हमारे सनातन धर्मधारी समाज के तथाकथित सुशिक्षित लोग धर्म के प्रति निरपेक्ष व मजहब के प्रति सापेक्ष होते जा रहे हैं।
रावण व महिषासुर ने वेद-विरूद्ध आचरण जरूर किया, यज्ञ-विरोधी विध्वंस भी किया और साधु -संतों-ऋषि-मुनियों को पीड़ित-प्रताड़ित भी; किन्तु हमारे वेद-शास्त्रों-ग्रन्थों को प्रदूषित नहीं किया था। कपोल-कल्पित मन्त्रों का प्रक्षेपण कर कभी यह मिथ्या प्रचार नहीं किया-कराया कि हमारे पूर्वज ऋषि-महर्षि गोमांस खाते थे अथवा वैदिक यज्ञों में गोमांस की आहूतियां डाली जाती थी। सदियों पुरानी ऋषि-प्रणीत हमारी शिक्षा-पद्धति को जड़ों से उखाड़कर अपनी कोई आसुरी शिक्षा-पद्धति थोपने और उसके सहारे हमारे बच्चों-पीढ़ियों को असुर बनाने, धर्मान्तरित करने, हमें लंकापेक्षी बनाने और हमारी भाषा को पंगु बनाने व हम पर अपनी भाषा थोपने का काम रावण के द्वारा नहीं किया गया। किन्तु यूरोपीय औपनिवेशिक साम्राज्यवाद और उसकी पीठ पर सवार ईसाई विस्तारवाद ने भारत में अपनी जड़ें जमाने के लिए एक तरफ हमारे शास्त्रों-ग्रन्थों के अनुवाद के नाम पर भारतीय वैदिक सनातन ज्ञान-विज्ञान के मूल स्रोतों में प्रक्षेपण कर हमारी अनेक बौद्धिक सम्पदओं का अपहरण कर लिया। दूसरी तरफ ऋषि-प्रणीत हमारी प्राचीन समग्र शिक्षण -पद्धति को उखाड़ फेंक उसके स्थान पर अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति स्थापित कर हमारे परम्परागत ज्ञान-विज्ञान चिन्तन-मंथन शोध-अनुसंधान के मूल स्रोत- संस्कृत भाषा को पंगु बनाते हुए हमारे ऊपर अंग्रेजी भाषा थोपकर हमारी चिन्तना-विचारणा को हमारी जड़ों से काटकर हमें पूरी तरह से यूरोपाश्रित बना दिया। इन दोनों तरह के अनर्थकारी विनाशकारी भारत-विरोधी, वेद-विरोधी कार्यों को अंजाम देनेवाले मैकाले-मैक्समूलर तो रावण-महिषासुर से भी ज्यादा खतरनाक असुर प्रतीत होते हैं।
उल्लेखनीय है कि सन 1794 में मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद करनेवाले विलियम जोन्स ने गोरी चमड़ीवालों की स्वघोषित श्रेष्ठता और ईसाइयत की लेशमात्र आध्यात्मिकता को पुष्ट करने के उद्देश्य से हिन्दुत्व और ईसाइयत के बीच समानता स्थापित करने हेतु हिन्दू-धर्म-ग्रन्थों (संस्कृत-ग्रन्थों) का उपयोग ईसाइयत के समर्थन में तर्क गढ़ने के लिए किया। उसने शब्दों की ध्वनियों से संयोगवश प्रकट होने वाली समानता के बाहरी आवरण के सहारे रामायण के 'राम' को बाइबिल के 'रामा' से जोड़ दिया और राम के पुत्र 'कुश' को बाइबिल की 'कुशा' से। इसी तरह की कई संगतियों को खींच-तानकर उसने यह प्रतिपादित किया कि बाइबिल-वर्णित 'नूह' के जल-प्लावन के बाद राम (रामा) ने भारतीय समाज का पुनर्गठन किया। इसलिए भारत बाइबिल से जुड़ी सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। उसने बाइबिल में वर्णित बातों को सत्य प्रमाणित करने के लिए संस्कृत-ग्रन्थों से उसकी पुष्टि करने के हिसाब से उनका अनुवाद किया। इस क्रम में उसने 'मनु' को 'एडम' घोषित कर दिया और विष्णु के प्रथम तीन अवतारों को नूह के जल-प्लावन की कहानी में प्रक्षेपित कर दिया। इस धूर्ततापूर्ण वर्णन में उसने बाइबिल-वर्णित- 'नाव पर सवार आठ मनुष्यों' को मनुस्मृति के 'सप्त-ऋषि' घोषित कर दिया।
विलियम जोन्स के बाद भारतीय शास्त्रों-ग्रन्थों के अनुवाद से उसके मिशन को आगे बढ़ानेवालों में फ्रेडरिक मैक्समूलर का नाम सर्वाधिक कुख्यात रहा है, जिसने वेदों का भी अनुवाद किया। आर्यों के यूरोपीय मूल के होने सम्बन्धी पूर्व कल्पित-प्रायोजित पश्चिमी कुतर्कों की स्थापना को मजबूती प्रदान करने के लिए भारत पर आर्यों के आक्रमण की तिथि भी घोषितकर देनेवाले मैक्समूलर का काम कितना षड्यंत्रकारी है, यह जानने के लिए उसके दो निजी पत्रों पर गौर करना पर्याप्त है। 16 दिसम्बर 1868 को ओर्गोइल के ड्यूक, जो ब्रिटेन में एक मंत्री थे को लिखे पत्र में मैक्समूलर कहता है- 'मेरे कार्यों से भारत का प्राचीन धर्म पूरी तरह ध्वस्त होता जा रहा है। ऐसे समय में अगर ईसाइयत यहां पैर नहीं जमाती तो यह किसकी गलती होगी?' उसी वर्ष अपनी पत्नी को लिखे पत्र में उसने लिखा- '...मैं उम्मीद करता हूं कि मैं इस कार्य को सम्पन्न करूंगा, और आश्वस्त हूं कि मैं वह दिन देखने के लिए जीवित नहीं रहूंगा। फिर भी मेरा यह संस्करण और वेदों का अनुवाद आज के बाद भारत के भविष्य और इस देश में मनुष्यों के विकास को बहुत सीमा तक प्रभावित करेगा। वेद उनके धर्म का मूल है और वह मूल क्या है, इसे उन्हें दिखाने के लिए मैं कटिबद्ध हूं; जिसका सिर्फ एक रास्ता है कि पिछले तीन हजार वर्षों में जो कुछ भी इससे निकला है उसे उखाड़ दिया जाए।' पश्चिम के इन बौद्धिक षड्यंत्रकारियों ने यह भी प्रतिपादित-प्रचारित कर रखा है कि अंग्रेज सबसे शुद्ध आर्य हैं और भारत में साफ चमड़ी के उतर-भारतीय लोग अशुद्ध आर्य हैं; जबकि दक्षिण भारतीय लोग द्रविड़ हैं, जो उतर भारतीय आर्यों से शोषित-प्रताड़ित होते रहे हैं। राम को आक्रमणकारी आर्य और रावण को भोले-भाले द्रविड़ों का राजा बताने वाले इन पश्चिमी बौद्धिक असुरों का दावा है कि संस्कृत भाषा लैटिन व ग्रीक से निकली हुई भाषा है जिसे उत्तर भारतीय ब्राह्मणों ने गैर-सवर्णों व द्रविड़ों का शोषण करने के लिए हथिया लिया।
अपने औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की जड़ें जमाने हेतु भारत के प्राचीन शास्त्रों-ग्रन्थों, भाषा व समाज-व्यवस्था और इतिहास को इस तरह से विकृत कर उन्हें शैक्षिक पाठ्य-पुस्तकों के माध्यम से पढ़ाने के लिए थामस विलिंगटन मैकाले की कुटिल योजनानुसार ईजाद की गई अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति अपने देश में आज भी कायम है, जिसके दुष्परिणाम हमारे सामने हैं। यह अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा पद्धति ही है, जिसके कारण एक ओर हमारी भाषा-संस्कृति–संस्कार-परम्पराएं सब के सब विलुप्त होती जा रही हैं और समाज में बड़ी तेजी से नैतिकता व राष्ट्रीयता का क्षरण तथा पारिवारिक-सामाजिक विघटन और भ्रष्टाचार व बलात्कार जैसी आसुरी प्रवृतियों का उन्नयन हो रहा है। ऐसे में रावण का पुतला-दहन किये जाने की बजाय अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति के उन्मूलन से मैकाले-मर्दन किया जाना अब ज्यादा जरूरी है। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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