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दिल्ली में चुनावी शंखनाद

24/01/2020

दिल्ली में चुनावी शंखनाद'

बद्रीनाथ वर्मा

रियाणा, महाराष्ट्र और झारखण्ड का चुनावी दंगल खत्म हो चुका है। हरियाणा में जहां किसी तरह से नये सहयोगी बनाकर भारतीय जनता पार्टी दोबारा सरकार बनाने में सफल रही, वहीं महाराष्ट्र में अपनी सहयोगी शिवसेना को साध न पाने की वजह से सत्ता गंवा बैठी। सूबे में सत्ता गंवाने की टीस अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि झारखंड में मिली करारी शिकस्त ने दर्द को दोगुना कर दिया। खैर, चुनाव आयोग ने अब दिल्ली दंगल की तारीख घोषित कर दिया है। आठ फरवरी को मतदान और 11 को नतीजे आएंगे। 2014 में मोदी के विजय रथ ने केंद्र के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखण्ड में फर्राटे भरा था। मगर दिल्ली में आकर उनके विजय रथ को आम आदमी पार्टी झारखण्ड दोनों ही राज्य हाथ से निकल चुके हैं। बहरहाल, दिल् ली विधानसभा चुनावों की रणभेरी बज चुकी है। सेनाएं सजनी शुरू हो गई हैं। भाजपा जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मैजिक पर चुनाव मैदान में उतरने जा रही है, वहीं सत् ताधारी आप अरविंद केजरीवाल के करिश् मे के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की उम्मीद लगाये हुए है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी जहां दोबारा सत्ता में आने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है, वहीं भाजपा पीएम मोदी के नाम व काम के बलबूते चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में है। लोकसभा चुनाव के दौरान मत प्रतिशत में हुई वृद्धि से उत्साहित कांग्रेस भी पूरे दमखम के साथ मैदान में है। सभी के अपने अपने जीत के दावे हैं लेकिन दिल्ली के दिल में आखिर क्या है? दिल्ली पर केजरीवाल का करिश्मा चलेगा या पीएम मोदी का मैजिक? इन्हीं सवालों के ईर्दगिर्द इस बार की आवरण कथा।

लोकसभा चुनाव में वोट शेयर के मामले में केजरीवाल की पार्टी से बढ़त लेने वाली कांग्रेस भी पूरे जोशोखरोस के साथ मैदान में आ डटी है। फिलहाल इस पार्टी के पास खोने के लिए तो कुछ भी नहीं है लेकिन हां, पाने के लिए बहुत कुछ है। ऐसा इसलिए क्योंकि शीला दीक्षित के नेतृत्व में लगातार 15 साल तक दिल्ली पर शासन करने वाली कांग्रेस का एक भी विधायक पिछले चुनाव में नहीं जीत पाया था। खुद ब्रांड मोदी के बावजूद आप की आंधी में भाजपा तक उड़ गई थी। आप को 67 जबकि भाजपा को केवल तीन सीटें ही मिली थीं। कांग्रेस का हाथ पूरा का पूरा खाली रह गया था। दिल्ली फतह करना सभी का उद्देश्य है, हालांकि दिल्ली के दिल में क्या है यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। 2013 और 2015 के विधानसभा चुनावों में अपने वोट शेयर को कमोबेश बरकरार रखने के साथ भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2014 में जबर्दस्त कामयाबी हासिल की थी। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भले ही वह अपनी कामयाबी दोहरा नहीं पाई लेकिन 2017 के एमसीडी चुनावों में अपना दबदबा बरकरार रखते हुए आप के मंसूबे को धूल धुसरित कर दिया था।

दिल्ली विधानसभा की दलगत स्थिति
कुल सीटें  70
आम आदमी पार्टी  66
बीजेपी  03
शिरोमणि अकाली दल  01

यही नहीं 2019 के लोकसभा चुनावों में उसने अपने वोट शेयर में लगभग 10 फीसदी का इजाफा भी कर लिया। दूसरी तरफ आश्चर्यजनक रूप से केजरीवाल की पार्टी कांग्रेस से भी पिछड़कर तीसरे स्थान पर पहुंच गई। बहरहाल, दिल्ली का यह दंगल भाजपा, कांग्रेस और आप, तीनों ही दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। झारखंड व महाराष्ट्र में पटखनी खाने के बाद भाजपा के लिए दिल्ली फतह करना जहां नाक का सवाल है, वहीं केजरीवाल के लिए अस्तित्व का। हां, कांग्रेस की स्थिति इन दोनों से इस मामले में थोड़ी अलग इसलिए है कि उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। यदि आम आदमी पार्टी के लिहाज से बात की जाए तो दिल् ली में अरविंद केजरीवाल के भरोसे पार्टी दोबारा सत्ता में आने की जद्दोजहद कर रही है। राजनीतिक विश् लेषकों के मुताबिक हालिया वर्षों में आप की मध् यम वर्ग पर यदि पकड़ फिसली है तो बिजली, पानी के दामों में कटौती करने के कारण उसकी जनोन् मुखी सरकार की छवि भी बनी है। इस पृष् ठभूमि में सीधा मुकाबला आप और भाजपा के बीच दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर आप के पास जहां अरविंद केजरीवाल हैं, वहीं भाजपा और कांग्रेस इस मामले में बेहद दरिद्र।

वोट शेयर: एक हकीकत यह भी
2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 54.3 प्रतिशत वोट हासिल किए। भाजपा
को 32.3 प्रतिशत और कांग्रेस को 9.7 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में
भाजपा ने दिल्ली की सभी 7 सीटों पर जीत का परचम लहराया था। दिल्ली में भाजपा को 56.58
प्रतिशत वोट मिले थे जबकि कांग्रेस 22.46 प्रतिशत वोट लेने में कामयाब रही। आप वोट शेयर
के मामले में तीसरे पायदान पर थी और उसे सिर्फ 18 प्रतिशत वोट मिले। जबकि साल 2014
के लोकसभा चुनाव में पार्टी को करीब 33 फीसदी वोट मिला था। ऐसे में यदि पार्टी अपना वोट
प्रतिशत नहीं बढ़ाती है तो उसे मुश्किल होने वाला है। इसके अलावा पार्टी का प्रदर्शन कांग्रेस की
मजबूती और कमजोरी पर भी निर्भर करता है। 2015 में आप को 67 सीट मिलने में सबसे बड़ा
कारक कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन रहा था। लेकिन इस बार वह पूरे दम खम के साथ चुनावी
मैदान में ताल ठोक रही है। लोकसभा चुनाव 2014 की तुलना में 2019 में भाजपा के वोट शेयर
में आये 10 फीसदी के उछाल में पार्टी नेताओं को उम्मीद की किरणें दिखाई दे रही हैं।

भाजपा पिछला विधानसभा चुनाव किरण बेदी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर लड़ी थी लेकिन केजरीवाल के सामने वह तिनके की तरह उड़ गई थीं। यही कारण है कि भाजपा इस बार पीएम मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर चल रही है। उसकी निगाह इस बात पर भी टिकी है कि कांग्रेस अगर मजबूती से लड़ी तो इसका नुकसान आप को और फायदा भाजपा को होगा। खैर, पांच साल तक दिल्ली का शासन चलाने के बाद केजरीवाल की पार्टी व अन्य पार्टियों के बीच की जो झीनी रेखा थी, वह कबकी खत्म हो चुकी है। आप नेताओं पर बलात्कार से लेकर भ्रष्टाचार तक के दर्जनों मामले मीडिया की सुर्खियां बने। पार्टी को दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने वाले तमाम कार्यकर्ताओं का इससे मोहभंग भी हुआ। योगेंद्र यादव से लेकर कुमार विश्वास तक संघर्ष के सैकड़ों साथियों को केजरीवाल ने सत्ता मिलने के बाद दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका।

चुनावी चक्र
नोटिफिकेशन 14 जनवरी
नामांकन की आखिरी तारीख 21 जनवरी
नाम वापसी की अंतिम तारीख 24 जनवरी
मतदान 8 फरवरी
नतीजे 11 फरवरी

राज्यसभा चुनाव के दौरान केजरीवाल पर पैसे लेकर टिकट बेचने तक के आरोप लग चुके हैं। ऐसे में लोकसभा चुनाव में जबरदस्त पटखनी खाने के बाद केजरीवाल के लिए यह चुनाव अपना अस्तित्व बचाने वाला है। अरविंद केजरीवाल तीसरी बार मुख्यमंत्री पद के लिए दिल्ली के मतदाताओं के बीच हैं। वे अपने कामों पर वोट मांगने की बात कर रहे हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि मतदाता उनके काम से खुश हैं। इसीलिए तो दावा कर रहे हैं, मैं पहला मुख्यमंत्री हूं, जो अपने कामों पर वोट मांग रहा है। बेशक मीडिया या जनता के सामने केजरीवाल यह दावा करें मगर अंदरखाने वे डरे हुए भी हैं। पार्टी के एक उच्च पदाधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया, पार्टी ने कांग्रेस और बीजेपी के कुछ बड़े नेताओं को पार्टी में शामिल कराया है। कुछ और को शामिल कराया जाएगा।

उनमें से कइयों को टिकट मिलना तय है। ऐसे में सवाल यही उठता है कि जब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपने कामों  पर भरोसा है तो उन्हें अपने सभी विधायकों को टिकट देना चाहिए। पर ऐसा नहीं होने वाला है। दरअसल, इस विधानसभा चुनाव में आप के लिए टिकट बंटवारा चुनौतीपूर्ण होने वाला है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने एक अंदरूनी सर्वे करवाया है। इसमें कई विधायकों से क्षेत्र की जनता की नाराजगी सामने आई है। ऐसे विधायकों का टिकट कटना तय है। दूसरे दलों से पार्टी में शामिल होने वाले बड़े नामों में मटिया महल से पूर्व विधायक एवं विधानसभा के डिप्टी स्पीकर रहे शोएब इकबाल हैं। वे लगातार पांच बार विधायक रहे हैं। इनके बाद दूसरा बड़ा नाम चांदनी चौक से चार बार विधायक रहे प्रहलाद सिंह साहनी हैं। दोनों नेता कांग्रेस से आप में शामिल हुए हैं। पार्टी सूत्र इनका टिकट पक्का मानकर चल रहे हैं। इनके अलावा गोकुलपुर के मजबूत नेता सुरेंद्र कुमार हैं। इनके बाद राजौरी गार्डन से तीन बार कांग्रेस पार्षद रही धनवती चंदेला को आप ने अपना झाड़ू पकड़ाया है। 2015 में पार्टी ने दिल्ली में 67 सीटें जीती थीं। दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट देने पर पार्टी को किसी सीटिंग विधायक का टिकट काटना पड़ेगा। ऐसे में पार्टी को बागियों का भी सामना करना पड़ सकता है। दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा इस पर कहते हैं, केजरीवाल अपने कामों पर नहीं बल्कि प्रवासी नेताओं से जीतने की कोशिश में हैं।

मगर यह होगा नहीं। इससे इतर सच्चाई यह भी है कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल अभी भी अन्य नेताओं की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय हैं। अभी हाल ही में आये एक सर्वे के मुताबिक मुख्यमंत्री के तौर पर दिल्ली की 70 फीसदी जनता की पहली पसंद अरविंद केजरीवाल हैं जबकि मनोज तिवारी को महज एक प्रतिशत जनता का ही समर्थन मिला है। उनसे ज्यादा 12 प्रतिशत लोग मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. हर्षवर्धन को देखना चाहते हैं। खैर, अरविंद केजरीवाल को करिश्माई नेता माना जाता है। लोकसभा चुनाव में आप तीसरे नंबर पर खिसक गई थी। यहां तक कि पांच लोकसभा सीटों पर आप उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। बावजूद इसके उन्हें उनकी सरकार द्वारा किए गए काम जैसे पानी और बिजली पर सब्सिडी से फायदा होने की उम्मीद है। यहीं नहीं महिलाओं को डीटीसी बसों में फ्री सफर का भी अनुकूल असर पड़ने की उम्मीद है। हालांकि सच्चाई यह भी है कि अब आप भी अन्य दूसरी राजनीतिक पार्टियों की तरह कीचड़ में बुरी तरह से पैबस्त हो चुकी है। यानी अब वह केवल नाम की आम आदमी पार्टी रह गई है।

चलती खास लोगों की ही है। बहरहाल, भाजपा इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे के बल पर चुनावी ताल ठोंक रही है। पूरी दिल्ली में सिर्फ प्रधानमंत्री के चेहरे वाले होर्डिंग्स लगे हुए हैं। इसमें पार्टी ने दावा किया है कि अब नहीं कोई दिल्ली में अनाधिकृत कॉलोनी, सभी को दिया मालिकाना हक। यह है, मोदी सरकार। पार्टी इस नारे के बल पर दिल्ली के 1767 कॉलोनियों में रहने वाले 40 लाख लोगों को साधने में जुटी है। पार्टी को इसका पूरा लाभ मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा 2013 और 2015 के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा का वोट शेयर खिसका नहीं था। पार्टी को सिर्फ उस वोट शेयर में थोड़ा और इजाफा करना है। यदि पार्टी ऐसा करने में कामयाब होती है तो उसे करिश्मा करने से कोई नहीं रोक सकता। पार्टी इस बार ट्रिपल इंजन वाली सरकार बनाने के लिए दिल्ली वालों को कह रही है। ताकि दिल्ली और तेजी से विकास करे। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है, केजरीवाल के सामने कोई धाकड़ प्रदेश नेता का चेहरा न होना।

पार्टी के प्रदेश नेताओं में गुटबाजी भी बड़ी समस्या है। कई बड़े नेता दिल्ली अध्यक्ष मनोज तिवारी को पचा नहीं पा रहे हैं। कांग्रेस का वर्तमान में एक भी विधायक नहीं हैं। इसलिए कांग्रेस के पास यहां खोने के लिए कुछ भी नहीं है। बस पाना ही है। पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव से उत्साहित है। इसलिए वह पूरी ताकत यहां झोक रही है। लोकसभा चुनाव में पार्टी ने अपना प्रदर्शन सुधारते हुए 15 फीसदी से करीब 23 फीसदी वोट शेयर कर लिया था। इसके अलावा पार्टी हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखण्ड के नतीजों से भी उत्साहित है। लेकिन पार्टी के सामने सबसे बड़ी समस्या करिश्माई चेहरे का न होना है। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के निधन से उसे काफी नुकसान हुआ है। प्रदेश कांग्रेस में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जिसे सबका समर्थन हासिल हो।


 
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