युगवार्ता

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फिर सत्ता के लिए मुफ्त का सहारा

24/09/2019

फिर सत्ता के लिए मुफ्त का सहारा

 एम के मिश्र

आप के संयोजक और सीएम केजरीवाल को मुफ्त की घोषणाओं में ही फिर एक बार सत्ता की चाभी दिख रही है। इसलिए वो मुμत की घोषणाओं का शतक भी लगा दें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

दिल्ली की सत्ता फिर से पाने के लिए मुफ्त का सहारा लेने वाले आम आदमी पार्टी(आप) के मुखिया और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से भारी झटका लगा है। अदालत ने दिल्ली मेट्रो परियोजना के चौथे चरण के निर्माण को लेकर दिल्ली सरकार को दिल्ली मेट्रो में महिलाओं को फ्री यात्रा करवाने के फैसला पर डांट लगाई और कहा कि वह जनता के पैसे का दुरूपयोग होने पर दर्शक बना नहीं रह सकता है।
पिछली घोषणाओं से आगे जाकर केजरीवाल ने बिजली-पानी में पहले से ज्यादा फ्री करने, अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने के साथ-साथ उनमें रजिस्ट्री शुरू करवाने, पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड आदि के मूल निवासियों) के प्रवासियों को अपने पक्ष में स्थाई करने के लिए दिल्ली के स्कूलों में मैथिली की पढ़ाई शुरू करवाने और भोजपुरी को संविधान की आठवी अनुसूचि में शामिल करवाने के प्रयास आदि अनेक घोषणाओं की श्रृंखला खड़ी कर दी है। कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी न बन पाए इसलिए हमला भाजपा पर करना तय कर लिया है। कांग्रेस के वोटों पर राज कर रही आप के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव शर्मिंदगी के कारण बने।
कई सीटों पर हाशिए पर पहुंच गई कांग्रेस से चुनाव में पिछड़ने से उसकी परेशानी बढ़ी। आप के कई विधायक पार्टी से अलग हो चुके हैं और कई अलग होने के कगार पर हैं। लोक सभा चुनाव के बाद दिल्ली कांग्रेस की अध्यक्षा शीला दीक्षित के निधन के बाद कांग्रेस में विवाद और बढ़ गया और दो महीने से प्रदेश अध्यक्ष तय नहीं हो पा रहा है। इसका सीधा लाभ आप को मिल रहा है। आप के नेता अपने गिरेबां में नहीं झांक रहे हैं लेकिन वे लगातार भाजपा पर मुख्यमंत्री उम्मीदवार तय करने का दबाव बना रहे हैं।
इस बात का जबाब देने से आप नेता कतरा रहे हैं कि आखिर आप से अलग होने वाला हर नेता पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल पर तानाशाही का आरोप क्यों लगा रहा है। तीन विधायक भाजपा में, एक-एक कांग्रेस और बसपा में शामिल हो चुके हैं और करीब आधे दर्जन किसी भी दिन आप छोड़ सकते हैं। केजरीवाल की रणनीति शुरू से ही आक्रामक और अपनी गलत बात पर भी अड़ कर सही ठहराने की रही है। उन्हें पता है कि अगर वे विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाए तो पंजाब की तरह दिल्ली में भी पार्टी गायब हो जाएगी। भाजपा की मुसीबत है कि पांच बार मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ने के बावजूद दिल्ली की सत्ता से बाहर रही। इसलिए भाजपा इस बार दिल्ली में केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम आगे करके चुनाव लड़ने की तैयारी में है।
पार्टी का एक वर्ग मानता है कि किसी नेता को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने पर उस नेता के विरोधी नेता या तो घर बैठ जाते हैं या पूरे मन से सहयोग नहीं करते। अन्यथा यह कैसे संभव था कि 2015 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री की उम्मीदवार किरण बेदी भाजपा के गढ़ माने जाने वाली कृष्णा नगर सीट से खुद अपना चुनाव भी नहीं जीत पाईं। दिल्ली में भाजपा 1998 में सत्त नहीं प्राप्त कर सकीं। तब से वह कभी इसका एक बड़ा कारण भाजपा का वोट समीकरण भी है। भाजपा खास वर्ग की पार्टी मानी जाती है। गैर भाजपा मतों का ठीक से विभाजन होने पर ही भाजपा विधानसभा या नगर निगम चुनाव जीत पाती है।
1993 में दिल्ली विधान सभा के चुनाव में उसे करीब 43 फीसद वोट मिले तब वह सत्ता में आई। उसके बाद उसका वोट औसत लोकसभा चुनावों के अलावा कभी भी 36-37 फीसद से बढ़ा ही नहीं। इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा को रिकॉर्ड 56.6 फीसद वोट मिले हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी वह दिल्ली की सभी सातों सीटें जीती थी और उसे 46.4 फीसद वोट मिले थे। 2015 के विधान सभा चुनाव में उसे 32 फीसद वोट तो मिले लेकिन सीटें तीन ही मिल पाईं। आम आदमी पार्टी ने 54 फीसद वोट के साथ 67 सीटें जीत ली। माना जाता है कि उस चुनाव में आप के पानी माफ और बिजली बिल हाफ के नारे का भारी असर हुआ और कांग्रेस के माने जाने वाले वोटरों के साथ-साथ भाजपा का भी निम्न मध्यमवर्ग समर्थक आप के साथ चला गया।
भाजपा ने वोट में विस्तार के लिए नवंबर 2016 में बिहार मूल के लोकप्रिय कलाकार मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बना कर पूर्वांचल के प्रवासियों को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया और वह 2017 के नगर निगमों के चुनाव में दिखा भी। तिवारी ने 32 बिहार मूल के उम्मीदवारों को टिकट दिलवाया। जिसमें 20 चुनाव जीत गए। 36 फीसद वोट लाकर भाजपा लगातार तीसरी बार निगमों की सत्ता में काबिज हुई। अस्सी के दशक से दिल्ली के राजनीतिक समीकरण में बदलाव की शुरुआत हुई। उसके तीन दशक बाद दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 50 में पूर्वांचल के प्रवासी 20 से 60 फीसद तक हो गए। दिल्ली का हर चौथा या पांचवा मतदाता पूर्वांचल का प्रवासी है। ऐसे में मनोज तिवारी अगर मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाए जाएं तो भाजपा को लाभ हो सकता है।
लेकिन मनोज तिवारी को दिल्ली भाजपा के एक वर्ग का लगातार विरोध झेलना पड़ा रहा है। दिल्ली में लंबे समय तक जनसंघ (अब भाजपा) का नेतृत्व पंजाबी नेता करते थे केदार नाथ साहनी, मदन लाल खुराना और विजय कुमार मल्होत्रा के बाद तो भाजपा में पंजाबी नेताओं का अकाल पड़ गया। जो नए नेता सक्रिय भी हुए उनको पार्टी में वैसा स्थान मिला नहीं। वैश्य नेताओं में ही दावेदारी ज्यादा दिख रही है। डा. हर्षवर्धन के दूसरी बार केन्द्र में मंत्री बनने के बाद विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेन्द्र गुप्ता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल ही मनोज तिवारी के अलावा प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं। फिलहाल प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी के कंधो पर दिल्ली विधानसभा के चुनाव फतह की जिम्मेवारी है।


 
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