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धारा 370 को हटाने से ही सम्भव है कश्मीर समस्या का समाधान

01/07/2019

मनोज ज्वाला
न दिनों संसद में जम्मू कश्मीर व धारा 370 को लेकर जोरदार बहस हो रही है। बहस के बीच केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा को खरी-खरी सुना दी कि कश्मीर समस्या जवाहर लाल नेहरू की देन है और इसका समाधान धारा- 370 को हटाने से ही सम्भव है। अमित शाह का यह वक्तव्य इस वजह से खास है कि अब तक के किसी भी गृहमंत्री ने इस 'कटु सत्य' को आधिकारिक रुप से संसदीय पटल पर व्यक्त करने का साहस नहीं किया था। भाजपा-सरकार की इस दूसरी पारी में गृहमंत्री बने शाह के इस वक्तव्य से उनकी दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति परिलक्षित होती है। दूसरी ओर, संविधान की दुहाई देते हुए इस धारा का समर्थन करने वाले तमाम तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी समूहों-नेताओं की सीनाजोरी को तार-तार कर देने वाली उनकी तार्किकता भी झलकती है।
सत्य से मुंह फेरकर झूठे तथ्यों को संविधान में जैसे-तैसे घुसा देने, फिर उसके आधार पर अपना राजनीतिक स्वार्थ साधते रहने तथा इस हेतु संविधान की दुहाई देते रहने वाले नेताओं को उनके कुकृत्यों का आईना दिखाया जाना जरूरी है। नि:संदेह अमित शाह ने यह कर दिखाया है। उन्हें बधाई उन्होंने सदन में जो कुछ भी कहा, बिल्कुल सही कहा है। लेकिन इतना ही कहना-बताना पर्याप्त नहीं है। उन्हें तो यह भी बता देना चाहिए था कि इस अस्थाई प्रावधान को संविधान में जोड़ा ही गया अनुचित कारणों से और अवैध तरीके से। संविधान सभा और यहां तक कि कांग्रेस के भी अधिकतर लोग इसका विरोध कर चुके थे। और तो और, तत्कालीन अंतरिम सरकार के विधि मंत्री और संविधान-प्रारुपण समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी न केवल इसका विरोध किया था, बल्कि संविधान सभा (तत्कालीन संसद) में होने वाले इस पर चर्चा से स्वयं को अलग कर लिया था। जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताने की बजाय उसे भारत से अलग-थलग करने वाली धारा 370 को भारतीय संविधान की अविच्छिन्न धारा बताने और इस कारण उसे बनाये रखने का राग आलापते रहने वाले जो लोग डॉ. भीमराव अंबेडकर को संविधान का निर्माता कहते-मानते हैं, उन्हें यह भी मालूम होना चाहिए कि धारा 370 के सर्वाधिक प्रखर विरोधी डॉ. अंबेडकर ही थे। उन्होंने इसे भारत-राष्ट्र के प्रति विश्वासघात बताया था और इसके समर्थन को देशद्रोह कहा था।
मालूम हो कि जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तानी कबायलियों का हमला हो जाने के पश्चात वहां के महाराजा हरि सिंह द्वारा जम्मू-कश्मीर का भारतीय संघ में विधिवत विलय ठीक उसी तरह से कर दिया गया था, जिस तरह से अन्य सैकड़ों रियासतों का विलय हुआ था। किन्तु  महाराजा से अपनी व्यक्तिगत खुन्नस के कारण उन्हें नीचा दिखाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नेहरू तो अपने पुराने कम्युनिस्ट मित्र शेख अब्दुल्ला के साथ परदे के पीछे दूसरी खिचड़ी पका रहे थे। वे उक्त विलय की बाबत महाराजा को पहले शेख अब्दुल्ला के हाथों रियासत की सत्ता सौंपने की शर्त लगा दिए। तब तक कश्मीर का एक तिहाई भू-भाग उन पाकिस्तानी हमलावरों के कब्जे में जा चुका था, जो आगे बढ़ते हुए श्रीनगर की ओर चले आ रहे थे। वैसी नाजुक परिस्थिति में राज्य को बचाने के लिए महाराजा ने उस अनुचित व अनावश्यक शर्त को स्वीकारते हुए अन्ततः शेख अब्दुल्ला को वहां के शासन का प्रधान बना दिया। तब नेहरुजी ने उस विलय के आधार पर कश्मीर की रक्षा के लिए भारतीय सेना को श्रीनगर कूच करने की अनुमति तो दे दी, किन्तु उसे पाकिस्तान के कब्जे में जा चुकी भूमि को मुक्त करने हेतु आगे बढ़ने से रोकते हुए 31 दिसम्बर 1947 को पूरा मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाकर युद्ध-विराम की घोषणा कर दी। साथ ही यह प्रस्ताव भी दे दिया कि विलय-मामले का निष्पादन 'जनमत-संग्रह' के आधार होगा कि कश्मीरी जनता भारत के साथ रहना चाहती है या पाकिस्तान के साथ या बिल्कुल आजाद। ऐसा करने से पहले नेहरू ने न तो रियासती मामलों के मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से परामर्श किया, न मंत्रिमण्डल से।
उधर, उक्त रियासत के शासन का प्रधान बन चुके शेख अब्दुल्ला जनमत को अपने पक्ष करने के लिए जनता को विशेषाधिकार दिलाने की जुगत भिड़ाने लगे और यह राग अलापने लगे कि जम्मू-कश्मीर तभी बनेगा जब कश्मीरी जनता भारत के पक्ष में मतदान करेगी। इसके लिए जरूरी है कि भारत सरकार कश्मीरियों को विशेष मान-पहचान और विशेष विधि-विधान दे। नेहरूजी तो शेख पर फिदा ही थे। इसलिए उन्होंने जम्मू-कश्मीर को विशेष मान-पहचान व विशेष विधि-विधान प्रदान करने की बाबत उसे एक खास मसौदा (जो धारा 370 में है) तैयार करने और उस मसौदे को केन्द्रीय कानून मंत्री भीमराव अंबेडकर, जो उस वक्त भारतीय संविधान सभा की प्रारुपण समिति के अध्यक्ष भी थे, के द्वारा संविधान में जोड़ देने को प्रेरित किया। जैसा कि प्रोफेसर बलराज मधोक ने अपनी पुस्तक में डॉ.अंबेडकर के हवाले से लिखा है- '...तो आप चाहते हैं कि कश्मीर को सारी सहायता भारत सरकार दे। हर साल करोड़ों रुपये भारत ही दे। सारे विकास कार्य अपने खर्चे पर भारत ही उठाये। कोई भी हमला होने पर कश्मीर की रक्षा भारत करे तथा सारे भारत में कश्मीरियों को बराबरी के अधिकार मिलें। लेकिन उसी भारत और भारतीयों को कश्मीर में बराबरी का कोई हक ना हो? मैं भारत का कानून मंत्री हूं। इस नाते आपके इस भारत-विरोधी प्रस्ताव को भारत के संविधान में शामिल करने की मंजूरी देकर कम से कम मैं तो अपने देश से गद्दारी नहीं कर सकता। आप नेहरू से जाकर कह दीजिए कि एक देशद्रोही ही ऐसा कोई प्रावधान भारत के संविधान में डालने की मंजूरी दे सकता है और मैं वह देशद्रोही नहीं हूं।'
फिर नेहरूजी ने शेख अब्दुल्ला को संविधान निर्मात्री समिति के सदस्य व रेल मंत्री गोपाल स्वामी आयंगर के पास भेजा। तब 17 अक्टूबर 1949 को आयंगर ने उक्त मसौदे को धारा  306 ए के नाम से संविधान सभा (तत्कालीन संसद) में प्रस्तुत किया, जो बाद में धारा 370 बन गई। सदस्यों ने जब इस धारा को संविधान में जोड़े जाने का भारी विरोध किया तब उन्हें नेहरूजी के हवाले से बताया गया कि यह अस्थाई प्रावधान है, जिसे बाद में कभी भी हटाया जा सकता है। इसी कारण इसे संविधान के परिशिष्ट में जोड़ा गया है और इसके शीर्ष पर ही लिखा हुआ है- 'टेम्परेरी प्रोविजन फॉर द स्टेट ऑफ द जम्मू और कश्मीर'। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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