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बस पर राजनीति और मजदूरों की विवशता

20/05/2020

सियाराम पांडेय शांत
सेवा करना और सेवा का दिखावा करना, दो पृथक संदर्भ हैं। उन्हें जोड़कर देखा नहीं जा सकता। प्रवासी मजदूरों की सेवा व मदद का दम्भ भरने वालों की कलई खुलना इसका प्रमाण है। जिस तरह कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, उसमें विवेकपूर्ण मदद की जरूरत है। केवल उत्साही मदद प्रवासी मजदूरों और उनके संपर्क में आनेवालों की जिंदगी में जहर घोल सकती है।
हजारों की तादाद में प्रवासी मजदूर पैदल चल रहे हैं। उन्हें तत्काल मदद की दरकार है और राजनीतिक दल बसों पर राजनीति कर रहे हैं। किसके पास कितनी बसें हैं, यह बता रहे हैं। बसों को लेकर सरकार के अपने दावे हैं और विपक्ष के अपने। सब गरीबों की मदद करना चाहते हैं, उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचाना चाहते हैं लेकिन इसका भरपूर श्रेय भी लेना चाहते हैं। श्रेय ही न मिले तो राजनीति का क्या मतलब। राजनीति से जुड़े लोग काम कम करते हैं, दिखावा ज्यादा करते हैं। प्रवासी मजदूरों की समस्या विकट है। हजारों किलोमीटर की दूरी को नजरंदाज करते हुए उन्होंने पैदल ही चलना आरम्भ कर दिया है। इस पैदल यात्रा में छोटे बच्चे भी शामिल हैं। इस क्रम में कई प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई। देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस पिछले कई दिनों से सरकार पर आरोप लगा रही थी कि अगर वह मजदूरों को बाहर के राज्यों से नहीं ला पा रही है तो कांग्रेस अपने खर्च, अपने साधन पर उन्हें उनके घर पहुंचाने को तत्पर है। वह तो प्रवासी श्रमिकों का रेल भाड़ा भी देने के दावे कर रही थी। यह और बात है कि वह कभी दावे से आगे नहीं बढ़ी।
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को घेरने के लिए भी उसने कुछ इसी तरह की गुगली फेंकी लेकिन उसे पता नहीं था कि योगी उन्हें इतनी जल्दी प्रवासी मजदूरों की सेवा का मौका दे देंगे। उन्होंने कांग्रेस के सेवाभाव को न केवल स्वीकार कर लिया बल्कि उसे मय चालक-परिचालक, वैध कागजात के एक हजार बसें नियत समय पर लखनऊ के जिलाधिकारी को उपलब्ध कराने का निर्देश दे दिया। इसपर कांग्रेस ने आपत्ति जताई कि प्रवासी मजदूर तो नोएडा और गाजियाबाद में है, बसें लखनऊ क्यों मांगी जा रही है। यह तो अमानवीयता है। इससे साफ जाहिर है कि कांग्रेस की चिंता के केंद्र में पैदल चल रहे मजदूर नहीं। गाजियाबाद और नोएडा में फंसे मजदूर हैं। खैर, कांग्रेस ने जो एक हजार बसों की सूची सौंपी, उसमें भी स्कूटर, टेम्पो, एम्बुलेंस के नंबर निकल गए। यह इस बात का संकेत है कि कांग्रेस अपने दावों को लेकर तैयार नहीं थी।
वैसे योगी सरकार के मंत्रियों ने जिस तरह कांग्रेस को घेरा, उसे अनुचित भी नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस योगी सरकार पर प्रवासी मजदूरों की वापसी में रोड़ा अटकाने का आरोप लगा रही है। कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष हाइवोल्टेज ड्रामे के बाद समर्थकों समेत गिरफ्तार कर लिए गए। प्रियंका गांधी वाड्रा कह रही हैं कि जितनी बसें ठीक हैं, उतनी तो चलाइए। चाहे तो भाजपा का बैनर लगा लीजिए। मुख्यमंत्री का तर्क है कि उनके पास देश का सबसे बड़ा बस बेड़ा है। जरूरत पड़ी तो निजी बसें भी लगाएंगे। सभी प्रवासी मजदूरों को सुरक्षित ले आएंगे। सपा प्रमुख अखिलेश यादव अलग ही राग अलाप रहे हैं। एकदिन पहले तक वे निजी स्कूलों की बसों के इस्तेमाल की बात कर रहे थे। अब वे कांग्रेस प्रदत्त बसों की फिटनेस की तरह योगी सरकार के फिटनेस पर सवाल उठा रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस्तीफा मांग रहे हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती भी बस पॉलिटिक्स मामले में सुरक्षित खेल रही हैं। उनका तर्क है कि अगर कांग्रेस के पास निर्धारित संख्या में बस हैं तो उसे लखनऊ ले आएं। हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा होय। अखाड़े के बाहर से दांव बताना आसान है। जो लड़ता है, उसे सोचना है कि उसका कौन-सा दांव कारगर होगा, कौन-सा नहीं।
कांग्रेस, भाजपा बस-बस खेल रही है और इसके चक्कर मे पिस रहे हैं बेबस मजदूर। कांग्रेस योगी सरकार पर बदनाम करने के आरोप लगा रही है बल्कि उसपर मानहानि के दावे करने की बात कह रही है। बसों के गलत नंबर देकर कांग्रेस फंस गई है। वैसे योगी सरकार को बदनाम करने में कांग्रेस भी कुछ कम नहीं है। बसों के गलत नंबर ने बिहार में हुए चारा घोटाले की याद दिला दी है। चारा घोटाले में पंजाब से भैसें स्कूटर से लाई गई थीं।
इस घटना से इतना तो साफ हो गया है कि राजनीतिक दलों के लिए प्रवासी मजदूर हॉट केक भर हैं। सरकार पहले ही मजदूरों को सुरक्षित अपने घर पहुंचा रही है। राजनीतिक दलों को इसमें मदद करनी चाहिए, न कि राजनीति। सरकार को भी चाहिए था कि जो भी बसें उपलब्ध हैं, उनका वह सदुपयोग करती। इस अवधि में जो भी, जिस किसी स्वरूप में मददगार है, उसकी मदद स्वीकार की जानी चाहिए। यह समय किसी को नीचा दिखाने का नहीं बल्कि मजदूरों को सुरक्षित उनके घर पहुंचाने का है। काश, ऐसा कुछ हो पाता लेकिन जिस तरीके से सोनिया गांधी के नेतृत्व में विपक्ष केंद्र और योगी सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है, उससे तो नहीं लगता कि वह श्रमिक समस्याओं को लेकर तनिक गंभीर भी है। कोरोना काल में सभी की जिम्मेदारी है कि वह अपना ही नहीं, हर जरूरतमंद के हितों का ध्यान रखे लेकिन राजनीति में अपने हित सर्वोपरि होते हैं। जनहित गौण होता है, यह बात अनेक मोर्चों पर देखने में आ चुकी है। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप सामान्य बात है लेकिन नैतिक स्तर पर गिरावट और छिद्रान्वेषण ठीक नहीं। इससे बचने में ही देश का कल्याण है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


 
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