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उत्तर प्रदेश से अरुणाचल तक

18/09/2019

उत्तर प्रदेश से अरुणाचल तक

जुगनू

जिम कॉरबेट नेशनल पार्क में आयोजन हुआ, 01अप्रैल 1973 को, जिसे तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नाम दिया-प्रोजेक्ट टाइगर! उसी के साथ हमने बचपन में पढ़ा था कि देश का राष्ट्रीय पशु बब्बर शेर की जगह बाघ (पैंथेरा टाइग्रिस टाइगिस) हो गया। इसका एक कारण बहुत साफ था कि बब्बर शेर केवल गुजरात के गीर अभयारण्य में दिखता था और बाघ अनेकों अरण्य में दहाड़ रहा था। ये अरण्य पूरे देश में फैले हुए हैं। जिन लोगों ने उन अरण्य की खोज की, उन्होंने काफी मेहनत की होगी। भारत सरकार के अनुदान पर कैलाश सांखला ने शोध कर एक किताब ही लिख डाली -टाइगर! देश का पहला नेशनल पार्क हेली नेशनल पार्क था। तब उत्तर प्रदेश संयुक्त प्रोविंस कहा जाता था।

देश का राष्ट्रीय पशु बब्बर शेर की जगह बाघ (पैंथेरा टाइग्रिस टाइगिस) हो गया। इसका एक कारण बहुत साफ था कि बब्बर शेर केवल गुजरात के गिर अभयारण्य में दिखता था और बाघ अनेकों अरण्य में दहाड़ रहा था। ये अरण्य पूरे देश में फैले हुए हैं। जिन लोगों ने उन अरण्य की खोज की, उन्होंने काफी मेहनत की होगी। भारत सरकार के अनुदान पर कैलाश सांखला ने शोध कर एक किताब ही लिख डाली -टाइगर! 

जिम कॉरबेट का भी यही का़र्य क्षेत्र था। वह अदभुत शिकारी भी थे और जंगल के बारे में लिखने वाले भी। बहुतों ने उनसे ही जंगल के बारे में जाना। आजादी के बाद जिस तरह से शिकार आरंभ हुआ कि दुखी होकर वह देश छोड़ कर ही चले गये। सुंदरबन आरंभ से ही एक विवादित अरण्य रहा है। इसको लेकर पश्चिम बंगाल में ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक बहस हो गयी। आंकड़ों में सबसे ज्यादा बाघ। कितने समझदार बाघ। उस धरती पर चलने वाले बाघ जो मैंग्रोव को आॅक्सीजन देने वाले नुकीले कांटों से बच कर चलने वाला बाघ जो छिप कर झपट्टा मार कर अपने शिकार-चाहे मनुष्य हो या चौपाया या मछली। इतना ही नहीं बिना पासपोर्ट-विजा के बांग्लादेश जाने-आने वाल बाघ। माना जाता था कि यहां 250 के आसपास बाघ है। सिमलीपाल ओडिसा के आदिवासी समुदाय के बाघ हैं। सरोजराय चौधरी की मानस पुत्री बाघिन खैरी का सिमलीपाल है। हाथी भी मिल जाते हैं यहां। सरोजराय चौधरी निकले तो भुवनेश्वर तक गये और बना डाला नंदनकानन।

महाराष्ट्र के अमरावती के पास के मेलघाट में सारे वन्य जीव हैं। पर एक विशेष प्रकार का उल्लू भी है, वह जंगल का उल्लू है, जो मेलघाट में दिखता है। यहां गांव और वन के बीच का संघर्ष भी खूब होता है। बाघ के साथ हाथी यहां की मुख्य विशेषता है।

प्रोजेक्ट टाइगर बनने के बाद देहरादून का फारेस्ट इंस्टिट्यूट में वन्य जीवन में पढ़ाते भर थे। बाघ परियोजना के साथ सिमलीपाल के निदेशक होकर रह गये। खैरी मरी और उसके कुछ माह के बाद वह भी चल बसे। कितना अच्छा होता कि उनकी डायरी का हिंदी और भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो पाता। जैसे टाइगर जिंदा है तो उसी तरह खैरी भी अनेक विज्ञापन फिल्मों और अनेक पत्र-पत्रिकाओं के आवरण पर जिंदा है। राजस्थान का रणथंभौर। अरावली और विंध्य के बीच का जंगल। अपनी धरती पर तरह-तरह के वन्य जीव को एक दूसरे से अपने बचाव के लिए लड़ते हुए। वह भी क्या अदभुत दृश्य रहा होगा कि बाघ से बचने के लिए चीतल जोगी महल के झील में कुद गया और वहां मगरमच्छ के जबड़े में फंस गया। रणथंभौर के जोगी महल और बाघों को मशहूर करने में जितना वाल्मिकी थापर का योगदान है, उतना ही बाघ परियोजना के वनरखाओं का है। महाराष्ट्र के अमरावती के पास का मेलघाट में सारे वन्य जीव हैं। पर एक विशेष प्रकार का उल्लू भी है, वह है जंगल का उल्लू, जो मेलघाट में दिखता है। यहां गांव और वन के बीच का संघर्ष भी खूब होता है। पहले यानी जब बिहार एक था तब पलामू बिहार में था।

कान्हा का बारहसिंघा

कान्हा नेशनल पार्क को बनाने का श्रेय विजयनगरम के राजा को मिला। अपने लिए वह बनारस से गंगा जल मंगाते थे और शुद्ध मन से बाघ का शिकार करते थे। साथ-साथ बैंडेरी बारासिंघा का भी शिकार करते थे। डनवार बैंडर ने इस बारासिंघा की पहचान की, इसलिए मानना पड़ा बैंडेरी बारासिंघा बाघ के बचाव के पहले 1969 से बैंडेरी बारासिंघा की आबादी जब 60 के आसपास रह गयी तो उनका संरक्षण शुरू हो गया था। बैंडेरी बारासिंघा घासखोर किस्म का हिरण है। केवल तीन चार प्रकार के घास ही खाता है। उसके बाद जब बाघ परियोजना आया तो पद्मभूषण शरद पवार के नेतृत्व में कान्हा जगत बैंडेरी बारासिंघा प्रसिद्ध हो गया क्योंकि यह दुनिया में उसका आखरी बसाहट। अब तक उनकी आबादी लगभग हजार के आसपास हो गयी होगी। बैंडेरी बारासिंघा पर ही शोध कर डॉ. राजेश गोपाल कान्हा से लेकर प्रोजेक्ट टाइगर से होकर आगे ही बढ़ते चले गये। बंदीपुर मायसुर के राजा को वन्य जीव से लगाव था। उनके राज्य में बाघ, हाथी और गौर की बहुतायत थी। गौर को लोग भैंस समझते थे। यह भैंस नहीं, उसकी सरल पहचान है कि इसके पैर में सफेद रंग का घुटनों तक सफेद मोजा चढ़ा होता था।

बंटवारे के बाद यह झारखंड में हो गया। बाघ के साथ हाथी यहां की मुख्य विशेष है और विशेषता है। दो व्यक्ति-पी के सेन और प्रियरंजन सिन्हा। प्रियरंजन सिन्हा केंद्रीय चिड़िया घर प्राधिकरण के सदस्य सचिव, वन्य जीव संस्थान के निदेशक भी हुए। पी के सेन पहले पलामू बाघ परियोजना के निदेशक थे, फिर दिल्ली में बाघ परियोजना के निदेशक हुए। बाघ परियोजना का 25वां साल भी इनके नेतृत्व में ही आयोजित हुआ। इस आयोजन में ब्रिटेन के उपप्रधान मंत्री भी थे। यहां एक बहस भी हो गयी कि बाघ की गिनती कैसे हो। उल्हास कारंत फोटो तकनीक के समर्थक थे और राजेश गोपाल परंपरागत पग मार्क प्रणाली के पैरवीकार थे। इस बहस में भी जीता टाइगर जिंदा है! असम का मनास असम का ही नहीं भूटान का भी है। इस पार हमारा मनास बीच में ब्रह्मपुत्र, नहीं मनास ही है। हर प्रकार के जंगली जानवर। एक खास पशु जंगली जल भैंसा। यूं तो यह काजीरंगा में भी दिखता है और एक सींग वाला गैंडा भी। ये सारे वन्य जीव एक-दूसरे पर आधारित हैं। पर 29 जुलाई को विश्व बाघ दिवस मनाया गया तो हमने भी मना लिया। इस सच के बावजूद कि पलामू, बक्सा और डंपा में बाघों की संख्या लगभग शून्य हो चुकी है। शायद और बाघ आरक्षित अरण्य में भी संख्या रही है। जैसे सरिस्का में हुई ।


 
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