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घुंघरू की तरह बिखर गई पायल

01/08/2019

घुंघरू की तरह बिखर गई पायल

 नीलम गुप्ता

जातिगत जलीलता से आजिज आकर डॉ. पायल ने मौत को गले लगाना ज्यादा श्रेयस्कर समझा। डॉक्टर के रूप में अगले 30 साल किसी अस्पताल में नौकरी करने पर जो पैसा पायल कमा पाती, कम से कम उतना पैसा तीनों डॉक्टरों व लापरवाह अधिकारियों से वसूल कर पायल के मातापिता को दिया जाना चाहिए।

तू छोटी जात की होकर हमारी बराबरी करेगी। छब्बीस साल की डा. पायल तडवी अपने प्रति ऐसे आपराधिक भेदभावपूर्ण व्यवहार को भी शायद बर्दाश्त कर लेती बशर्ते कि उसे अपना काम करने दिया जाता। पर उसकी तीनों सीनियर सवर्ण डॉक्टरों ने तो तय ही यही किया था कि उसे डिलीवरी कक्ष में कदम तक नहीं रखने देना। वे उसे साफ साफ कहती थीं कि डिलीवरी करवाना तुम्हारा काम नहीं है। उन्होंने उसे वार्ड में रजिस्टर भरने जैसे काम सौंप रखे थे। एक बार जब वह वार्ड में महिला रोगियों की जांच कर रही थी तो डॉ. हेमा आहूजा और भक्ति मेहारे राउंड पर आई।
पायल को रोगियों की जांच करते देख एकदम गुस्से से तमतमाती हुई बोलीं- ऐ आदिवासी! तू इधर क्यों आई है। तू डिलीवरी कराने लायक नहीं है। तू हमारी बराबरी करती है! महाराष्ट्र के जलगांव के आदिवासी परिवार की तडवी और उसके परिवार ने डॉ. बनने के लिए कड़ी मशक्कत की थी। मुंबई के बीवाइएल नायर अस्पताल में बतौर जूनियर रेजीडेंट डॉ. उसकी नियुक्ति हुई थी। पिछले एक साल से वह यहां काम कर रही थी। पर पहले दिन से ही विभाग की उसकी तीन सहयोगी महिला डाक्टरों ने उसको अपने से निम्न जाति का मानते हुए न केवल उसके साथ दुर्व्यवहार किया, हर वक्त जलील किया बल्कि उसे अपने असली काम रोगियों की जांच व गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी से भी वंचित कर दिया। आत्महत्या करने से पहले माता-पिता को लिखे अपने पत्र में उनसे माफी मांगते हुए पायल ने यही कहा है कि एक साल मैं कोशिशें करती रही पर मैंने देखा कि मेडिकल विभाग में मेरे साथ खड़ा होने वाला कोई भी नहीं है।
मैं हमेशा एक महिला रोगी विशेषज्ञ बनना चाहती थी। इसीलिए मैंने इस विभाग को चुना था। पर सहयोगी डॉ. नहीं चाहती थीं कि मैं अपना काम सीख कर आगे बढ़ूं। जिन तीन डॉक्टरों के पायल ने अपने सुसाइड नोट में नाम लिए हैं उनमें आहूजा व महारे के अलावा तीसरा नाम अंकिता खंडेलवाल है। इन तीनों डॉक्टरों के दुष्ट व्यवहार और अस्पताल के उच्च अधिकारियों द्वारा शिकायतों को अनदेखा कर दिए जाने से हताश व निराश पायल ने इसी साल 22 मई को अपने हॉस्टल के कमरे में गला में फंदा लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली थी।
पायल के साथ दुर्व्यवहार की पुष्टि उसके साथ रह रही उसकी सहेली और अस्पताल के कर्मचारियों ने भी की है। इस मामले में पुलिस ने तीनों डाक्टरों को हिरासत में ले लिया है। पर अस्पताल के अधिकारियों पर अभी तक हाथ नहीं डाला गया है। डा. पायल ने जब चारों तरफ से पूर्ण-निराश होकर आत्महत्या का फैसला किया तो निराशा का ज्यादा बड़ा कारण तो अस्पताल का प्रशासन ही था जिसने उसकी शिकायतों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया। अगर प्रशासन ने समय पर विभाग की तीनों डॉक्टरों के खिलाफ उचित कदम उठा लिया होता तो नौबत यहां तक न पहुंचती। इसलिए सजा केवल तीनों आरोपी डॉक्टरों को ही नहीं उन अधिकारियों को भी उतनी ही मिलनी चाहिए जिन्होंने अपने काम के प्रति लापरवाही बरतते हुए पायल को हर तरफ से निराश हो आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर किया। किसी भी एक मेडिकल छात्र को अपनी पढ़ाई पूरी कर डॉ. बनने तक पचास साठ लाख का खर्च आज की तारीख में करना ही पड़ता है। सरकारी मदद हो तो यह खर्च कुछ कम हो जाता है।
पायल की अभी तक की पढ़ाई के खर्च के अलावा आगे के करीब 30 साल अगर वह किसी अस्पताल में नौकरी करती तो जो पैसा वह कमाती, कम से कम उतना पैसा इन तीनों डॉक्टरों व अस्पताल के जिम्मेदार लापरवाह अधिकारियों से वसूल कर पायल के माता- पिता को दिया जाना चाहिए। जातिगत जलीलता के अपराध के भागीदार भी वे सभी हैं। वैसे तो पुलिस ने करीब 1200 पेज का आरोपपत्र तैयार किया है। तीनों डॉक्टरों ने जो समझ लिया था कि सुसाइड नोट वे नष्ट कर चुकी हैं तो वह भी पायल के मोबाइल से मिल गया है।
ऐसे में इस मामले में उनका पूरी तरह छूट जाना तो संभव नहीं दिखता। पर जरूरी है कि तीनों को कड़ी से कड़ी सजा मिले। कारण अनुसूचित जाति या जनजाति परिवारों से निकलकर यहां तक पहुंचकर आत्महत्या करने वाली पायल कोई पहली रेजिडेंट डॉ. नहीं है। इससे पहले भी कई रेजिडेंट डॉ. ऐसे रहे जो समाज के तमाम थपेड़ों को सहते हुए यहां तक पहुंचे और दिल्ली के एम्स या मुंबई के अस्पतालों में सहयोगी सवर्ण डॉक्टरों के जातिगत अहंकार का शिकार हो अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।


 
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