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ई-कॉमर्स कंपनि‍यों से बिगड़ता बाजार

30/10/2019

ई-कॉमर्स कंपनि‍यों से बिगड़ता बाजार 
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
इस दीपावली जितनी बाजार में रोनक दिखी , उससे कहीं अधिक रोशनी देशभर में ई-कॉमर्स के माध्‍यम से व्‍यापार कर रहीं कंपनियों के दफ्तरों में है, जहां काम पर लगे लोग कार्य की अधिकता को देखते हुए बहुत कम नजर आ रहे हैं। ऑफर पर ऑफर कहीं त्‍योहारी तो कहीं सीजनेबल के नाम से दिया जा रहा यह लालच उपभोक्‍ताओं पर हावी दिख रहा है । जिन वस्‍तुओं की उन्‍हें आवश्‍यकता नहीं, वह भी खरीदने के लिए प्रेरित कर रहा है। किंतु क्‍या इससे देश के अधिकांश व्‍यापारियों का लाभ हो रहा है, क्‍या इससे भारत सरकार को लाभ हो रहा है, जितना कि बिक रहे सामान के अनुपात में होना चाहिए? सिर्फ यह दो प्रश्‍न ही पर्याप्‍त हैं, देश में हो रहे संपूर्ण ई-कॉमर्स व्‍यापार की हकीकत जानने के लिए ।
सरकार कुछ भी कहे लेकिन जमीनी सच्‍चाई यही है कि जैसे-जैसे ई-कॉमर्स कंपनियों का संजाल देश में बढ़ता जा रहा है। वैसे-वैसे छोटे व्‍यापारियों में त्‍यौहारी सीजन होते हुए भी खाली हाथ बैठे दिखाई देने वालों की संख्‍या में इजाफा हो रहा है। स्‍थ‍िति यहां तक देखी जा रही है कि ई-कॉमर्स कंपनियों का ऑनलाइन बाज़ार हर तरह के प्रोडक्ट की क़ीमतों पर 30-40 से लेकर 80 फ़ीसदी तक छूट दे रहा है।
अभी कुछ दिन पहले की ही बात है, केंद्रीय वाणिज्‍य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि केन्‍द्र सरकार ने ई-कॉमर्स में गाइड-लाइन्‍स बनाई है, अब यदि मल्‍टी ब्रैण्‍ड रिटेल का साधन कोई ई-कॉमर्स को बनाएगा तो सख्‍त से सख्‍त कार्रवाई होगी। ई-कॉमर्स एक मार्किट प्‍लेस है और इस प्‍लेटफार्म पर जो बेचना चाहे सामान वो आकर बेच सकता है, जो खरीदना चाहे वो खरीद सकता है लेकिन ई-कॉमर्स कंपनी को कोई अधिकार नहीं, वह उसके प्रोडक्‍ट्स को सस्‍ते में बेच कर हमारी रिटेल की व्‍यवस्‍था को नुकसान पहुंचाए।
उन्होंने यहां तक कहा था कि सरकार को पूरा ख्याल है कि छोटे दुकानदारों को नुकसान न हो। सरकार विदेशी स्‍वामित्‍व वाली कंपनियों फ्लिपकार्ट, एमाजॉन सहित ऐेसी अन्य कंपनियों की कथित रूप से नुकसान पहुंचाने वाले रियायती मूल्यों की जांच कर रही है। लेकिन सरकार की जांच में अब तक क्‍या निकला यह किसी को पता नहीं चला है। दूसरी ओर इन कंपनियों के बढ़ता व्‍यापार है, जिसमें कि इन ई-कॉमर्स कंपनियों ने पिछले एक पखवाड़े में लगभग पांच अरब डॉलर का सामान बेचा है।
वस्‍तुत: यहां कहना यही है कि पांच अरब का नहीं वे 50 अरब का सामान बेचें, लेकिन क्‍या इसमें सरकार की कोई पारदर्शी व्‍यवस्‍था है जोकि इन कंपनियों के बिक रहे माल की सच्‍चाई पर पूरी तरह से नजर रखे है ? सरकार ने रिटेल और थोक व्‍यापारियों पर इतना अधिक शिकंजा कसा है कि यदि कोई कहीं इंकम टैक्‍स की चोरी या अन्‍य किसी प्रकार का भ्रष्‍टाचार करना भी चाहे तो वर्तमान की पारदर्शी व्‍यवस्‍था में यह कर पाना सहज संभव नहीं।  किेंतु, ई-कॉमर्स कंपनियों के मामले में ऐसा दिखाई नहीं देता है।
कंपनियों के हिसाब रखने की प्रणाली इतनी जटिल और कंप्यूटर आधारित है कि वे करोड़ों का माल बाजार में बेचकर बहुत सफाई से अपने कंप्यूटर को शुन्‍य दिखा सकती हैं। बहुत सस्‍ते दाम पर सामान बेचती हैं और इससे गुड्स एवं सर्विस (टैक्‍स) जीएसटी का कई हजार करोड़ का सीधा नुकसान भारत सरकार को देती हैं। यही कारण है कि आज कन्‍फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ई-कॉमर्स कंपनियों अमेजन, फ्लि‍पकार्ट और अन्‍य द्वारा ऑनलाइन बिक्री में गुड्स एवं सर्विस (टैक्‍स) जीएसटी के नुकसान होने के आरोप लगा रहा है।
कन्‍फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स तो यहां तक दावा कर रही है कि अमेजन, फ्लि‍पकार्ट यह दोनों ई-कॉमर्स कंपनियां लागत से भी कम मूल्य पर माल बेचते हुए भारी छूट दे रही हैं, जो सरकार की एफडीआई नीति के खिलाफ है। इसमें भी सबसे बड़ा आश्‍चर्य जिसकी ओर कन्‍फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने ध्‍यान दिलाया है वह है कि ये छूट सामान्य और ऑफलाइन बाजार में उपलब्ध नहीं है। जबकि ई-कॉमर्स कंपनियां उत्पाद के वास्तविक बाजार मूल्य पर जीएसटी चार्ज करने के लिए बाध्य हैं, लेकिन ये कंपनिया ठीक इसका उलटा कर रही है। इससे सरकार को गत तीन वर्षों से जीएसटी का बड़ा नुकसान हो रहा है।  आप चाहें तो किसी भी माल की ऑनलाईन कीमत और ऑफलाईन कीमत देख सकते हैं । 10 हजार रुपए की वस्‍तु पर 2 से तीन हजार तक की छूट मिलना सामान्‍य बात है।
वस्‍तुत: ऐसे में लालच के चलते धीरे-धीरे बाजार का आम ग्राहक डिजिटल पर जा रहा है। वह ई कॉमर्स कंपनियों के जाल में फंस रहा है। हो यह रहा है कि लगातार बाजार में मंदी का दौर शुरू हो गया है। कई छोटे व्‍यापारियों की दीपावली भी इस साल इस कारण से फीकी नजर आई है। जबकि होना यह चाहिए कि कोई उपभोक्‍ता किसी कंपनी के माल को ऑनलाईन खरीदे या ऑफलाइन दोनों में यदि कीमत का अंतर रखना भी हो तो वह इतना कम हो कि ग्राहक अपनी सुविधानुसार किसी एक का चुनाव कर सके। न कि किसी लालच में बड़े ऑफर के चक्‍कर में ऑनलाइन सेवा के लिए भागे । आज चुनौती यह भी है कि कॉमर्स से ई-कॉमर्स में यह संक्रमण व्यवस्थित ढंग से कैसे तबदील किया जाए, जिससे कि राजकोष को नुकसान न हो, बल्‍कि यह ऑफ या ऑन लाइन दोनों ही रूप में सरकार और आम उपभोक्‍ता के लिए फायदेमंद साबित हो। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबंद्ध हैं)


 
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