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बड़ा दिल दिखाने पर जोर

30/10/2019

बड़ा दिल दिखाने पर जोर

एम. ओवैस

मुस्लिम बुद्धिजीवियों और उलेमाओं का एक दल चाहता है कि राम जन्मभूमि विवाद का सौहार्द्रपूर्ण तरीके से हल हो। वहीं, मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और जमीअत उलेमा हिंद का कहना है कि इसका हल केवल अदालत के जरिए ही संभव है।

पिछले दिनों लखनऊ में मुसलमानों की दो बड़ी बैठकें आयोजित हुर्इं। एक बैठक का नेतृत्व विश्व प्रसिद्ध बरेली दरगाह के मौलाना तौकीर रजा खान ने किया जबकि दूसरी बैठक मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने आयोजित की थी। इसमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति लेμिटनेंट जर्नल जमीरउद्दीन शाह सहित कई रिटायर्ड आईएएस और पीसीएस के अलावा सेना के पूर्व अधिकारी मौजूद थे। मौलाना तौकीर रजा ने अपनी बैठक में जो दावा किया था कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अदालत में एक हलफनामा सुनवाई के अंतिम दिन दाखिल करेगा वह सच साबित हो गया है। मौलाना तौकीर रजा खान का मानना है कि अदालत के जरिए अगर मुसलमानों के हक में फैसला आ भी जाता है तो भी वहां पर दोबारा मस्जिद की तामीर संभव नहीं है।
इसलिए समझदारी इसी में है कि मुसलमानों को अदालत से बाहर इस जटिल विवाद का सर्वमान्य हल निकालने के लिए प्रयास करना चाहिए। मौलाना का सोचना कुछ हद तक सही भी है क्योंकि यह सत्य है कि अगर बाबरी मस्जिद के हक में अदालत फैसला सुनाती है तो भी वहां पर मस्जिद का पुनर्निर्माण कराना टेढ़ी खीर है। क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय की तरफ से किसी भी सूरत में वहां मस्जिद निर्माण की इजाजत नहीं दी जाएगी। ऐसी स्थिति में एक बार फिर से देश में सांप्रदायिक दंगे भड़कने का पूरा पूरा अंदेशा है।
इसलिए मुसलमानों को ठंडे दिमाग से विवाद को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए हिन्दू पक्ष के साथ बात करनी चाहिए। इस बीच सुप्रीम कोर्ट में अंतिम दिन मध्यस्थता कमेटी ने बंद लिफाफे में एक पत्र अदालत को सौंपा है। हालांकि इस पत्र में क्या लिखा गया हैं इस बारे में अदालत ने कुछ भी नहीं बताया है। लेकिन इधर उधर से जो बात छन कर सामने आ रही है उसमें दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति होने की बात कही जा रही है। इस में मुसलमानों की तरफ से बाबरी मस्जिद पर दावा छोड़ने की बात है।
इसके बदले मुसलमानों की तरफ से भविष्य में किसी अन्य मस्जिद या धार्मिक स्थलों पर बहुसंख्यक समाज की तरफ से दावा नहीं करने का पुख्ता वादा लेने की बात कही जा रही है। साथ ही सरकारी मदद से मस्जिद बनाने की भी बात की गई है। इसी तरह मुस्लिम बुद्धिजीवियों के एक ग्रुप की तरफ से लखनऊ में आयोजित एक बैठक में भी इस बात पर संदेह किया गया कि अगर अदालत का फैसला मुसलमानों के पक्ष में आता है तो इसके परिणाम काफी खतरनाक होंगे। बुद्धिजीवियों के मुताबिक इस तरह के फैसले से देशभर में दंगा फसाद भड़केगा और इससे दोनों पक्षों का जान-माली की नुकसान होगा।
मुस्लिम बुद्धिजीवियों का कहना है कि अगर मुसलमान बातचीत के जरिए इस जटिल समस्या का समाधान करते हैं तो इससे उन्हें फायदा होने की ज्यादा उम्मीद है। मुस्लिम बुद्धिजीवियों की तरफ से जो सुझाव सामने आए हैं उसमें विवादित भूमि बाबर के समय की है यह मानते हुए इसको सरकार के हवाले कर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने और उन्हें सख्त सजा दिलाने की मांग के अलावा सांप्रदायिक दंगों की एसआईटी जांच कर उसमें दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग करनी चाहिए। वर्ष 1991 के धार्मिक स्थल विधेयक का सख्ती से पालन करने तथा 3 माह की सजा को बढ़ाकर कम से कम 3 साल या उम्र कैद में बदलने के लिए सरकार से बात करनी चाहिए।
इसके अलावा पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान के अंतर्गत आने वाली मस्जिदों को मुसलमानों के सुपुर्द करने और वहां पर नमाज पढ़ने की इजाजत दिए जाने के साथ तमाम पुरानी मस्जिदों व धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण व मरम्मत आदि की इजाजत देने की बात भी सरकार के सामने रखनी चाहिए। इस सिलसिले में लेμिटनेंट जर्नल जमीरउद्दीन शाह का कहना है कि अगर मुसलमान अयोध्या से अपना दावा वापस लेते हैं और हुकूमत की तरफ से उनकी मांगें मान ली जाये तो मुसलमानों को इस पर गौर करना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि अगर मुसलमान इस तरह के किसी फैसले के करीब पहुंचते हैं तो इसका फायदा आने वाले दिनों में मुसलमानों को जरूर मिलेगा। लेकिन यह भी बात सच है कि हिन्दू पक्ष मुसलमानों की इस मांग को कितना तवज्जो देता है सारा दारोमदार इसी पर निर्भर करेगा।


 
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